
भारमल गर्ग “विलक्षण”
जालोर (राजस्थान)
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विरह वेदना शीतल समान,
सूर्य तपे तप्त मृगतृष्णा।
दुख में सुख की छाया पाई,
ज्यों दावानल में शीकर वृष्णा॥
तव स्मृति चंदन चर्चित सी,
हृदय तप्त पर लेप समान।
विरह हिमगिरि शिखर सा ऊँचा,
श्वास पवन बन बहत शीतलान।
प्रेम अग्नि दहन करे मन को,
विरह बादल बरसे जलधार।
जलकर भी न भस्म हुआ मन,
कमल सा खिला प्रेम अपार॥
तव अधरामृत सुधा सरीखा,
पिपासित स्मृति पान करे।
वियोग रात्रि चाँदनी भरी,
तारक सम तव नयन चमके॥
दूर तुम पर निकट तुम्हारी,
छाया साथ चलती मानो।
विरह वेदना शीतल करे,
ज्यों सिन्धु लहर तट छू जानो॥
विरह सरिता जल शीतल बहै,
प्रेम कमल खिलावत तीर।
स्मृति मञ्जरी गुनगुन भौंरे,
भाव भ्रमर मधु पीवत नीर।
तप्त दिवस में विरह वटवृक्ष,
शान्ति छाया देता सघन।
वियोग दुख नहीं, प्रेम सिंचन,
ज्यों वर्षा करे धरा तरन॥
तव मुखचंद्र चकोर नयन,
प्यास बुझावत दूर बैठे।
विरह वायु शीतल समीरण,
प्रेम अंगार ठंडे कर लेठे॥
यादें पुष्प खिले मन वाटिका,
सुगन्ध बिखेरत मन्द पवन।
विरहण तपस्या बन गई है,
प्रेम देवता का अर्चन॥
विरह हिमांशु किरण सुहावनी,
प्रेम सरोवर तरंग मिलावे।
तव स्वर सरस्वती वीणा सा,
शून्य में भी मधुर तान सुनावे॥
दुख सागर पार लगे प्यारे,
विरह नौका बन जाए शान्त।
प्रेम की ज्योत जलती रहेगी,
दीप सा अखण्ड अमर महान्त॥
परिचय :- भारमल गर्ग “विलक्षण”
निवासी : सांचौर जालोर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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