
डॉ. राम रतन श्रीवास
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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“राधे” को सुबह-सुबह आँगन में खड़ा वह आम का पेड़ आज कुछ अधिक ही अपना-सा लग रहा था।
उसकी शाखाओं पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं और पत्तियाँ हवा के साथ ऐसे झूम रही थीं, जैसे किसी उत्सव की तैयारी कर रही हों।
“राधे” पेड़ के तने पर हाथ फेरा और धीरे से बोला….
“तूने हमारे परिवार को वर्षों से छाया देते आ रहे हो!… सु स्वादिष्ट फल देते हो!… साँसों के लिए शुद्ध हवा दे रहे हो!… आज मैं तेरी भी रक्षा का वचन देता हूँ।”
“राधे” ने आम की कलाई पर (राखी) रक्षा सूत्र बाँधा और मन में एक अनोखा बंधन का अहसास….
पास खड़ा “आर्यन” बेटा आश्चर्य से पूछ बैठा!…
“पापा! राखी तो भाई की कलाई पर बाँधी जाती है, फिर पेड़ को क्यों?”
“राधे” मुस्कुराया!.. पेड़ की ओर देखते हुए बोला…
“बेटा!.. जो हमारी रक्षा करे, उसकी रक्षा करना भी तो हमारा धर्म है। बहन-भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधती है… और आज मैंने इस पेड़ से वादा किया है कि जब तक मैं हूँ, इसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा।”
बेटा! कुछ देर चुप रहा। फिर उसने पेड़ को प्रणाम किया और बोला….
“पापा!.. तब तो मैं भी राखी बाँधूँगा… और अपने दोस्तों से भी कहूँगा कि पेड़ काटना नहीं, पेड़ बचाना है।”
हवा चली… पत्तें हिली.. पेड़ की पत्तियाँ सरसराईं…
ऐसा लगा मानो आम का वृक्ष आशिष देते हुए कह रहा हो….
“आज पहली बार किसी ने मेरी कलाई पर नहीं, मेरे अस्तित्व पर राखी बाँधी है।”
आज वास्तव में घर में रक्षाबंधन मनाया गया,
लेकिन आज आँगन में एक नया रिश्ता जन्म ले चुका था….
मनुष्य और प्रकृति के बीच रक्षा का रिश्ता।
संदेश- वृक्षों को पूजना तभी सार्थक है, जब उनके संरक्षण का संकल्प भी लिया जाए। भारतीय परंपरा में वृक्षों के सम्मान और संरक्षण को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जोड़ा गया है।
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निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
साहित्य क्षेत्र : कन्नौजिया श्रीवास समाज साहित्यिक मंच छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष
सम्मान : कोरबा मितान सम्मान २०२१ (समाजिक चेतना एवं सद्भाव के क्षेत्र में)
शिक्षा : हिन्दी साहित्य (स्नातकोत्तर)
अतिरिक्त : रेल परिवहन एवं प्रबंधन में डिप्लोमा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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