
योगेश पंथी
भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश
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पड़ोसी सारे अपने है
और घर के है गैर
पड़ोसी सांथ है निभा रहे
घर को में बैरपड़ोसियों से हो रहा
अपनेपन का भान
घर में भाई रह रहे
जैसे हो अनजानआज घरो से मिट रहा
सारा शिष्टाचार
भाई भाई के बीच में
बनी रहे तकरारमांत पिता से कर रहे
बच्चे ऐसे बात
बात बात में मारते
जैसे जूते लातबाहर के सब लोग तो
देते है सम्मान
लेकिन घर के भीतर हीं
क्षीर्ण हुआ है ज्ञानभीतर भीतर ढूंढ़ते
है खुद का सम्मान
किसको आदर भाव कब
स्वयं नही है ज्ञानछोटो को तो क्षमां नही
बढ़ो को न सम्मान
आप ही नें बना लिया
केसा ये अभिमानबड़ा समझता है खुदको
तो झुक कर रहना सीख
अभिमानी को तो कभी
मांगे मिले न भीखछोटा बन कर देखले
हे छोटी सी बात
झुकजाने से न कभी
घटती अपनी जातपेड़ आम का देखलो
देखो पेड़ गुलाब
भरे हो फल और फूल से
झूटे जाते खुद आपझुक जान से ही सदा
बढ़ती सबकी शान
एक पल में मिट जाएगा
ये सारा अभिमानइंसानो की दुनिया में
इंसा बन कर देख
सबसे बड़ा हे धर्म ये
मानव बन कर देखतुच्छ समझते हो जिसको
वो भी है इंसान
शायद उसकी विनम्रता का
तुम्हे नही हो ज्ञानजिस दिन अपनी क्रूरता का
तुम को होगा आभास
कदमो में होगी जमी
और सर पर आकाशइसी लिए ये सीख लो
उड़ते जो आकाश
उनके मन में भी सदा
रहता है आभासअनगिन घाटों पर फिरो
भरकर मुख में नीर
चाहे गंगा घांट हो
चाहे सागर तीरटिकते कब आकाश में
पाँव कहीं घनश्याम
गिरते जो आकाश से
तो आते धरती धाम
परिचय :- योगेश पंथी
निवासी : टीलाजमालपुरा भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश
राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच से लेखन यात्रा प्रारंभ ….
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