
कीर्ति मेहता “कोमल”
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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देख शिकारी आदमी, बिना लिए हथियार।
तन पर उजला चैल है, मन में काली धार।।
मन में काली धार, चले हैं वो व्यापारी।
बिना लगाए दाँत, डसे है ये विषधारी।।
कोमल होती दंग, फँसे जनता बेचारी।
नेता करते घात, धूर्त हैं देख शिकारी।।बैठ शिकारी राह में, घात लगाए एक।
सरल लक्ष्य को ताकता, आँख वहीं पर टेक।।
आँख वहीं पर टेक, बालिका सुंदर प्यारी।
जाल बिछाता देख, कलुष देखो व्यभिचारी।।
कोमल करती क्रोध, पाप की ये बीमारी।
हरो दुष्ट के प्राण, राह में बैठ शिकारी।।बनो शिकारी साधकों, शब्द बिछाओ जाल।
रचो काव्य की योजना, छंद सोरठा माल।।
छंद सोरठा माल, नाथ को करना अर्पण।।
सुनो ध्वनि करताल, दमकना फिर तुम दर्पण।।
कोमल बड़ी प्रसन्न, महालय है हितकारी।
श्रोता से पा मान, शब्द के बनो शिकारी।।बनी शिकारी आज मैं, देखूँ कर की ताल।
टेढ़ी-मेढ़ी रेख हैं, बैठ बिछाई जाल।।
बैठ बिछाई जाल, देखती भागित रेखा।
चुभे यातना शूल, पढ़ूँ मैं विधना लेखा।।
विचलित कोमल चित्त, दुखों की कैसी क्यारी।
सुनो मोहना नाथ, सेविका बनी शिकारी।।
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : बीए संस्कृत, एम ए हिंदी साहित्य
लेखन विधा : गद्य और पद्य की सभी विधाओं में समान रूप से लेखन
रचना प्रकाशन : साहित्यिक पत्रिकाओं में, कविता, कहानी, लघुकथा, गीत, ग़ज़ल आदि का प्रकाशन, आकाशवाणी से प्रसारण।
प्राप्त सम्मान : अभिव्यक्ति विचार मंच नागदा से अभियक्ति गौरव सम्मान तथा शब्दप्रवाह उज्जैन द्वारा प्राप्त
लेखनी का उद्देश्य : जानकारी से ज्ञान प्राप्त करना।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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