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बेखबरी का आलम

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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ये मेरी बेखबरी ही है कि
लुटता जा रहा है मेरा सब कुछ,
बढ़ता जा रहा मेरा दुख पर दुख,
पर्दे डाले गए मेरे सुनहरे इतिहास पर,
विरोधी इतना घातक है कि
तुला हुआ है करने मेरे सत्यानाश पर,
है उनके पास अजीब हथियार
जो है रासायनिक अस्त्रों से भी घातक,
जिससे हो जाते हैं मदहोश सब
देख उनके निश दिन का नाटक,
गिरवी पड़ा है मेरे अपनों का मष्तिष्क
किसी नापाक इरादों वाले के चरणों में,
हम पूरी तरह फंसे हुए हैं
उन्हीं विरोधियों के विभिन्न धारणों में,
ऊपर से हमारी पेट की आग,
दिन भर इसी में उलझे रहते हैं
और अपनों के प्रति कर्तव्य नहीं पाता जाग,
अपने कर्तव्यों के प्रति मेरी सोच व समझ
आखिर बेखबरी ही कहा जाएगा,
मेरा यह रुख आगामी पीढ़ी से नहीं सहा जाएगा,
मेरे जैसे लाखों करोड़ों लोग कब जाग पाएंगे,
जोश, जुनून, जज्बे की कब आग जलाएंगे।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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