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अंतर्मन से परिचय

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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मैंने स्वयं को
शब्दों की भीड़ में नही
मौन की गहराइयों में
पहचाना है
जहाँ हर प्रश्न
उत्तर नहीं माँगता
और हर उत्तर
सच नहीं होता।

समय ने मुझे
तोड़ा नही बस
परत-दर-परत
खोल दिया-
जो दिखा
वो मेरा नहीं था
और जो मेरा था
उसे देखने की दृष्टि
सबके पास नहीं होती।

रिश्तों की भाषा
अब सरल नहीं रही
यहाँ सम्मान भी
शर्तों पर मिलता है।
जो समझ सका
वही ठहरा बाक़ी सबने
भीड़ को अपनाया
और मुझे फालतू
कह दिया।

मैंने शिकायतों को
शब्द नहीं बनाया
क्योंकि मौन में भी
मेरी अस्मिता
बोलती है
अब न सफ़ाई देने
की आदत है
न हर चोट का हिसाब
रखने का धैर्य।

जो चला गया वो
ग़लत नहीं था
बस मेरी गहराई के
योग्य नहीं था
और जो ठहर गया
वो कोई वादा
नही एक अनुभूति है।

अब मैं स्वयं से
भागता नही
ना ही किसी को
पकड़ कर रखता हूँ
अनुपस्थिति ही
मेरी सबसे सशक्त
उपस्थिति बन
चुकी है क्योंकि
मैंने सीख लिया है
हर किसी को
सब कुछ समझा देना
आत्म-अपमान
का ही एक रूप होता है।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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