
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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सुलग रहे मोरे अंग अंग सजना
तड़पूं अकेली मनवा चैन न पाये
बसंत बयार बहे, मौसम रंगीला
तरसे जिया, काहे न पिया आये
कूके कोयली, बोले पपीहा
विरह-अगन मोरा जिया जराये
विरह-अगन से जियरा धधके
ननदिया जब शृंगार सजाये
फूलवा महके, पाखी चहके
देवरानी, जेठानी छेडछाड़ जाये
मन ही मन मैं तरसूं घनी जो
लहक लहक भाभी रंग उड़ाये
देवर होले होले करे इशारे
कैसे बचूँ, मोहे समझ न आये
आय पिया मोहे उर से लगाओ
रातें सर्दी की खाली न जाये
चैन मिले जो दीदार करूँ मैं
लंबी रतिया मोहे खूब सताये
टेर उठे जो माधव मुरलिया की
चीर, चीर जाये करजेवा मोरा
झंकार उठे पग की पायलिया
नयन तन्हा, छलक-छलक जाये
सातों सुर हँस सजाये पवनिया
इंद्रधनुष रंग नभ में सरसाये
इंतज़ार में गौरी पूछे दरवजे से
मनवा सरसे,कब पिया आये
आँच अहसास की भर-भर भड़के
हारी पिया, अब और न सहा जाये
तृप्ति मिले, अंग लगूँ जो पिया
नाचूँ मगन तन थिरक थिरक जाये
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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