
मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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थरथर धरती काँपतीं, काँपे हैं हर लाल।
ठिठुर रहे सब ठंड से, द्वारे आया काल।।
मौसम सर्दी आ गया, हुआ ठंड का जोर।
काँप रहे हैं हाथ भी, त्रास दे रही भोर।।
ठंड ये पूस मास की, लेती सबकी जान।
मार्गशीर्ष थी शीत कम, अब सो कंबल तान।।
भगती कहाँ अलाव से, पूस मास की शीत।
नाम धूप का है नहीं, कुहरा छाया मीत।।
दुबक रजाई में रहे, बच्चे वृद्ध जवान।
ठंड कड़ाके की पड़ी, खोले कौन दुकान।।
मफलर बाँधा कान में, दस्ताने हैं हाथ।
मौजे पहने पाँव में, चलें ठिठुर कर पाथ।।
घर आजा मनमीत अब, आया मौसम शीत।
नित्य विरहा में डूबती, रहती प्रिय भयभीत।।
पूस मास दे त्राण है, नित्य चलाता वाण।
सर्दी बड़ी प्रचंड है, कर प्रभु अब कल्याण।।
यौवन पर तो शीत है, वयोवृद्ध हैं मौन।
सिर पर सबके नाचती, पीर हरे अब कौन।।
स्वेटर भी शरमा रहे, ठिठुरे कबंल आज।
घूँघट बैठी धूप भी, भूल गये सब काज।।
अदरक वाली चाय की, चुस्की लेते लोग।
कहाँ शीत पर कम हुई, योगी भूले योग।।
परिचय :- मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश)
पति : पुरुषोत्तम भट्ट
माता : स्व. सुमित्रा पाठक
पिता : स्व. हरि मोहन पाठक
पुत्र : सौरभ भट्ट
पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट
पौत्री : निहिरा, नैनिका
सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन।
प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, काव्यमेध, आहुति, सवैया संग्रह, पंख पसारे पंछी
सम्मान : विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा, विद्या सागर और साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन द्वारा, महिला रत्न अलंकरण, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “उत्कृष्ट न्यायसेवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित तथा कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित
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