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बसंत पंचमी

सुषमा शुक्ला
इंदौर (मध्य प्रदेश)

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पीताम्बर ओढ़े धरा आज मुस्काई है,
आँगन-आँगन में बसंत की छवि छाई है।
कोपलों की हँसी, पत्तों की हरियाली,
ऋतुओं की रानी बन आई खुशहाली।

वीणा की झंकार में सरस्वती आईं,
ज्ञान, कला, वाणी को संग लाईं।
अक्षर-अक्षर में दीपक सा उजियारा,
अज्ञान तमस से जग को उबारा।

सरसों के खेतों में सोना लहराए,
भौंरे, तितलियाँ राग नए गुनगुनाएँ।
मंद पवन की चंचल-सी तान,
जीवन में भर दे नव आशा, नव प्राण।

मन के आकाश में रंग घुले पीले,
स्वप्न नए हों, संकल्प हों नुकीले।
सृजन की धारा बहे अविराम,
हर हृदय गाए बसंत का गान।

बसंत पंचमी, नव आरंभ की बेला,
श्रद्धा, सौंदर्य का मधुर मेला।
ज्ञान-पथ पर बढ़ें, लेकर उजास,
जीवन बने सुरभित, सार्थक, उल्लास।

परिचय :- सुषमा शुक्ला
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)


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