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पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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एक पिता अपने नन्हें से
पुत्र का पालन पोषण करते
उसे स्नान कराते, खाना
खिलाते कितना खुश हो रहा है
खिलखिलाहट से गूंज रहा है
उसका घर-आंगन-आशियाना!

नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते
कभी इधर तो कभी उधर इठलाते
अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति
समेटना चाहता है पिता इन
अनमोल लम्हों को अपने सीने में !

समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है,
पिता के बाजुओं में ताकत है,
नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है।
समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है।

वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है,
किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है
हाथों में कंपकंपाहट है,
आज वो पिता चलने से लाचार है,
पिता की नजरे झुकी है मानो
उनसे कोई गुनाह हुआ हो !

वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है
किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं,
कोई खुशी नहीं केवल
आँखों में नमी है पिता और पुत्र के।

बेटा सोचता है इन्हीं हाथो में
उसने स्वयं को बढ़ते- पलते देखा
इन्हीं कंधों पर उसे उठा कर उसके
पिता ने उसको पूरी दुनिया दिखाई थी,
आज वो पिता अपनी उम्र की
मजबूरी पर लाचार और शर्मसार है।

उस पिता का शरीर झुका हुआ सा है
किसी बोझ तले नहीं, अपनी लाचारी से।
पिता मौन हैं खुद को खुद मे छिपाए हुए
पिता की इस अवस्था पर पुत्र के
आँखों की नमी, उसके दर्द की कहानी कह रहे हैं!

प्रेम आज भी अद्भुत है पिता का
पुत्र के प्रति, पुत्र का पिता के प्रति
केवल समय ने करवट बदली है।।

एक दिन सभी मजबूत कंधे
किसी दूसरे कंधों का सहारा ढूंढते हैं
भाग्यशाली होते हैं वो जिन्हें
मजबूत कंधा मिल जाता है।।

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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