
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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दो पहाड़ एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी, की संतान, क़द-काठी में फर्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाए रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किए- तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी। छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है।
“बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है,”
छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है, दुख कम।
बड़का भैया गहरी साँस लेता है। “हाँ छुटके, पर तू खुश क्यों है? हजारों साल से हम संग-संग खड़े हैं धूल, आँधी, बर्फ़ सब झेली। यही सोचते रहे कि धरती माँ को नंगा होने से बचाएँ हैं हम। और अब… तुम्हें ले जाया जा रहा है।”
छुटका मुस्कुराता है। “भैया, पहली बार किसी ने मेरी सुध ली है। तुम्हारे पास खड़े-खड़े भी मेरी पूछ नहीं हुई।
मैं ऊब गया था भेड़-बकरियाँ मुँह पर चढ़तीं, पशु पक्षी जब चाहें मुंह उठाये आते और घर बना लेते। बदले में मिला धूल, बौछारें, लीद और बीट। अब इंसानों की दुनिया देखनी है। सुना है शहर चमकते हैं, फ्लैट ऊँचे होते हैं। क्या पता, मैं किसी बुलंद इमारत का हिस्सा बन जाऊँ किसी मंच का पत्थर, किसी माला का हीरा। शायद ‘बुलंद भारत’ की तस्वीर का फ़्रेम भी मेरी देह से बने।”
बड़का भैया सख़्त हो उठता है। “तुम्हें इसमें खुदाई दिख रही है वाह l इंसान अपनी ‘खुदाई ‘ भूल चुका है। ये जंगल काटकर खुद जंगली हो रहे हैं। सच ही तो है अब जब दरिंदे पशु शहरों में बस गए हैं, तो इन्हें पहाड़ों की ज़रूरत क्या?”
छुटका व्यंग्य से कहता है। “भैया, आदमी जितना छोटा होता जाता है, उतनी बड़ी हरकतें करता है। मुझे भी वही सीखनी है। हम पहाड़ उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के रास्ते में जड़ता बनकर खड़े रहे इसीलिए खटकते हैं।”
“पर तुम्हें ज़रा भी दुख नहीं?”
बड़का पूछता है।
“किस बात का?” छुटका पलटता है। “मुझे तो फ़ायदा दिखता है। ‘पहाड़’ नाम में जड़ता है। आज नाम बदलने का दौर है। कल हमें भूखंड, उभार, संसाधन, संपदा, खनिज-खान कहा जाएगा ताकि हटाए जाते वक़्त नाम का नशा हो और शहादत भी उत्सव लगे। सब शहर की ओर भाग रहे हैं, तो मैं क्यों न भागूँ? धरती रेगिस्तान हो जाए तो क्या? आदमी अपनी बरबादी का ठीकरा खुद उठाने को तैयार है।”
बड़का भैया बेचैन होकर याद दिलाता है कैसे उसने सदियों तक ढाल बनकर शहरों को धूल से बचाया; कैसे दुर्दिनों में महाराणा प्रताप को शरण दी; कैसे आदिवासी समाज की युद्धस्थली और शरणस्थली बना। बिना पुरस्कार, बिना प्रमाणपत्र बस खड़ा रहा। छुटका ठहाका लगाता है। “शहर तो वैसे भी गैस चैम्बर हैं। चिमनियाँ, पराली, वाहनों का धुआँ सबने हवा रौंद दी। तुम्हारे होने-न होने से अब क्या फर्क?”
बड़का फिर समझाता है। “देख छुटके, अब खुदाई इंसानों में नहीं, पहाड़ों में दिखती है। पेड़ नहीं कटते माँ के हिलते हाथ कटते हैं। जहाँ हमारा अस्तित्व मिटा, वहाँ ग्लेशियर पिघले, गंगोत्री की तपस्या भंग हुई।”
छुटका ठंडे व्यंग्य से कहता है। “अलंकारों से दुनिया नहीं चलती। दूध की नदियाँ कहाँ? नदियाँ बाँधों में कैद हैं। कहते हैं हाथ खून से रंगे हैं; सच होता तो रंगे हाथ पकड़े जाते। इंसानों के क़ानून तो इंसानों पर ही चलते हैं।
कण-कण में शंकर मानने वालों को पहाड़ों के कण-कण का खनन क्यों अखरता है? कण-कण में खनिज भी है। पेड़ पूजनीय हैं उन्हें एसी रूम के फ़र्नीचर में बदल दो, पूजा आसान हो जाती है।”
बड़का भैया बुदबुदाता है- “संभल… हथौड़ा चल रहा है।”
दूर कहीं हथौड़ों की गूँज है। दृश्य एक कटु सच्चाई पर टिकता है माँ के नाम पर खुशी कितनी देर? इंसानी दरिंदे इस धरती माता को किसी की माता नहीं रहने देंगे।
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
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