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बारूदी बस्ती

भीमराव ‘जीवन’
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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अरमानों की मौन अर्थियाँ, रोज निकलती हैं।
इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।।

हिंसा ने खुशियों को खाई, जब त्योहारों की।
अलगू जुम्मन पूजा करते, बस हथियारों की।।
समरसता से डरी पुस्तकें, आहें भरती हैं।।
इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।।

क्षुद्र स्वार्थ में इस माली ने, पूँजी कुछ जोड़ी।
हरे-भरे सम्पन्न बाग की, मेड़ें सब तोड़ी।।
कलियाँ बासंती मौसम को, देख सिहरती हैं।।
इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।।

डरी अल्पनाएँ आँगन से, अब मुँह मोड़ रही।
हँसिया लेकर बगिया विष की, फसलें गोड़ रही।।
गर्वित-गढ़ में न्याय-कुर्सियाँ, पल-पल मरती हैं।।
इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।।

परिचय :- भीमराव ‘जीवन’
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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