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माता के नवरूप

उषाकिरण निर्मलकर
करेली, धमतरी (छत्तीसगढ़)

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प्रथम दिवस नवरात्र का, सजा मातु दरबार।
शैलसुता माता सदा, करती है उपकार।।१।।

दूजे दिन आराधना, ब्रम्हचारिणी रूप।
संयम तप वैराग्य की, देवी छटा अनूप।।२।।

माँ के मस्तक पर सजा, चंद्र घंट आकार।
मात चंद्र घंटा करे, असुरों का संहार।।३।।

आलोकित ब्रह्मांड है, जिनके तेज प्रताप।
माँ कुष्मांडा जाप से, मिटे शोक सब पाप।। ४।।

स्कन्दमात सुमिरन करो, पंचम दिन नवरात।
शुभ्र वर्ण पद्मासना, शुभता की सौगात।।५।।

षष्टम माँ कात्यायनी, सिंह पर है आरूढ़।
माँ महिषासुर मर्दिनी, महिमा जिनकी गूढ़।।६।।

कालरात्रि माता भजो, शुभंकरी शुभ नाम।
रक्तबीज आतंक को, जिनसे मिला विराम।।७।।

महाशक्ति फलदायिनी, करे सदा कल्याण।
अष्टम दिन गौरी भजो, माँ भक्तों की त्राण।।८।।

मात सिद्धिदात्री तुम्हें, बारम्बार प्रणाम।
नवम रूप में मातु को, पूजो आठो याम।।९।।

परिचय :- उषाकिरण निर्मलकर
निवासी : करेली जिला- धमतरी (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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