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पर्वत जैसा अडिग रहो

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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अडिग रहो तुम,
भीड़ की दिशा नहीं
विचारों की दिशा चुनो,
जहाँ सच कठिन हो,
वहीं अपने कदमों
का संकल्प बुनो,
क्यों भटकते हो नारों में,
जब मार्ग तुम्हारे
पास लिखा है,
भारतीय संविधान
की रोशनी में
हर उत्तर सुस्पष्ट दिखा है,
याद करो वो कर्मपथ,
जहाँ शब्द नहीं,
संघर्ष बोलता था,
भीमराव अंबेडकर
का हर एक विचार
अन्याय के विरुद्ध
डोलता था,
और चेतना की
मशाल लिए
चल पड़ा एक
और पथिक महान,
कांशीराम ने सिखाया
जागृत समाज ही
होता है सच्चा बलवान,
समता का स्वर
केवल कहने से नहीं,
जीवन में उतारना पड़ता है,
समानता का
दीप जलाने को
अहंकार खुद ही
हारना पड़ता है,
बंधुत्व की बात
अगर करते हो,
तो भेदभाव से
रिश्ता तोड़ो,
अपने भीतर के
छोटेपन को
पहचानो, समझो
और छोड़ो,
युवा हो तुम
केवल उम्र से नहीं,
विचारों की ज्वाला से,
देश की दिशा बदलती है
तुम्हारी सजगता और
साहस की उजाला से,
राजनीति को समझो,
पर उसमें बहना नहीं,
उसे साधो,
जनहित की परिभाषा गढ़ो
और सच के साथ
ही आगे बढ़ो,
संचित रखो
मीठे पानी को
बेरूखी से न
छलक जाए,
कदर करो हर
मंशा विचार की
जर्रा जर्रा देश
के काम आए,
अडिग रहो हर
परिस्थिति में,
न्याय की राह से
मत हटना,
संविधान सम्मत
कदम बढ़ाकर
देश को प्रगति
पथ पर ही रखना,
क्योंकि इतिहास
वही लिखेगा
जो झुका नहीं,
जो रुका नहीं,
अडिग रहा अपने
सिद्धांतों पर
और समय के
आगे झुका नहीं।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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