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खिड़की पर ठहरी धूप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।

खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है।
खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।।
खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।

खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है।
खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।।
खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।

खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है।
खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।।
खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।

परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास)
सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फुचकर रचनाएं प्रकाशित
प्रसारण : रेडियो, भोपाल दूरदर्शन, ज़ी-स्माइल, ज़ी टी.वी., स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से प्रसारण।
संपादन : ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं/विशेषांकों का सम्पादन। एम.ए.इतिहास की पुस्तकों का लेखन
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र : देश के लगभग सभी राज्यों में ७०० से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन। म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड (५१०००/ रु.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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