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लिखता रहूंगा

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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जब से मैंने होश संभाला,
मां-बाप ने विद्यालय में डाला,
गुरुजनों और साथियों ने
साथ निभाया,
शब्दों को कैसे गढ़ना है-
यह हुनर सिखाया।

तभी से लिखता
चला जा रहा हूँ,
कभी अपनी उलझनें,
कभी दिल के फ़साने,
कभी प्रेरणा देने वालों से
मुलाक़ातों के तराने।

कभी प्रेम, कभी पीड़ा,
कभी जीवन की टीस,
तकनीक की दौड़ में भी
ढूंढता रहा
अपनी ही किसी चीज़।
अपनों के रंग, उनके
वार और प्रतिघात,
भरोसेमंद हाथों से भी
खाई दिल पर चोट की घात।

भले ही मैं कवि या
लेखक न दिखता हूँ,
पर शब्दों के संग
निरंतर चलता हूँ।
परिवार को मुस्कान
देने की कोशिश में लगा,
कभी अपने ही खून से
भी मिला धोखा जगा।

जिसे सबसे अधिक
विश्वसनीय माना,
उसी से जीवन का सबसे
गहरा घाव पाया,
तभी तो खुद की
पहचान का आईना भी
कभी-कभी मुझे मेरी
औकात दिखा पाया।

कोशिश रही समाज
के लिए कुछ लिखने की,
खुद को एक सजग
इंसान दिखने की।
इस राह में मिले
जो साथी और मित्र,
मेरे जीवन में वे
बसेंगे सदा बनकर इत्र।

कभी समाज को कुछ
लौटाने की चाह रही,
तो कभी सच को उसकी
असली जगह
दिखाने की राह रही।
जब तक अंतिम सफर
की आहट पास आएगी,
तब तक हर ठोकर
मुझे कुछ नया सिखाएगी।

निःसंदेह, सीखता रहूंगा
हर पल, हर दफा,
और अपने जज़्बातों को
शब्दों में ढालकर-
मैं यूँ ही लिखता रहूंगा सदा।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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