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वो आ रहे हैं देखने के लिए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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“सुनो, आज शाम चार बजे दूसरी पार्टी आ रही है… देखने के लिए।”
“अच्छा…! फिर वही घबराहट शुरू हो गई। कहीं ये भी पहली पार्टियों की तरह…! देखो, ऑफिस से किसी को भेज दो, उन्हें रास्ते से ही ले आए। कहीं लोकेशन पूछते-पूछते पड़ोसियों के चंगुल में न फँस जाएँ। मुझे डर है कि वहाँ पहुँचकर कहीं आसपास पड़ोस से पूछताछ न कर लें, पहले की तरह… उन्हें बहका न दे… पड़ोसी बदनाम करने में सबसे आगे रहते हैं… पहले भी न जाने कितनी पार्टियों को बहकाया है।”
बात सही थी। कई पार्टियाँ पहले भी आईं। चाय पी, नाश्ता किया, मुस्कराईं, कागज़ देखे और जाते-जाते कह गईं, “मीडिएटर को बता देंगे।” मीडिएटर ने भी जाते-जाते ऐसा आश्वासन दिया, जैसे बारात बस दरवाज़े पर ही खड़ी है। पर चार दिन बीत गए, न हाँ आई, न ना। अब आदमी इंतज़ार करे या अगली जगह बात चलाए? दो जगह पसंद भी आया, पर पैसों पर बात अटक गई। हमने भी वही लगाया जो बाजार भाव था। आखिर खरा माल है हमारा। हमने भी काफी कोशिश की उनके हाव-भाव से जानने की… पसंद तो है ना? चाय-नाश्ते में भी कोई ना-नुकर नहीं की… बात भी बड़े हँस-हँसकर कर रहे थे… लेकिन चार दिन हो गए थे… कोई जवाब नहीं आया। कम से कम मीडिएटर को ही बता देते… भाई, पसंद है या नहीं? अब हम दूसरी जगह बात चलाएँ या आपके जवाब का इंतज़ार करें? दो जगह पसंद भी आया, तो पैसों के मामले में बात नहीं बनी। अब डिमांड जो बाज़ार भाव है, वही लगाएंगे ना? ये तो नहीं है कि हम बाज़ार को नहीं समझते। पहले भी तो हुए हैं हमारे पड़ोस में ही… देखो ना, चुपचाप कर लिया, पता ही नहीं चला। हमने तो जब जाना, जब पड़ोस की शर्मा आंटी सुबह-सुबह मिठाई का डिब्बा लेकर आईं।
हमने क्या छुपाना था? कोई पाप कर रहे हैं? जुआ खेल रहे हैं? पर जमाना ऐसा है कि आदमी अपनी चीज बेचे तो भी समाज पूछता है,“इतनी जल्दी क्या थी?”
आप शायद सोच रहे होंगे कि बात लड़की दिखाई की चल रही है। नहीं जी, आजकल लड़की दिखाई का जमाना कहाँ रहा! आज तो लड़की वाला होना भी कई जगह सामाजिक प्रतिष्ठा जैसा हो गया है। लड़का दिखाई? वहाँ भी आप चूक गए। असल में बात प्लॉट दिखाई की है। जी हाँ, एक प्लॉट है बिकाऊ। आज उसी को देखने पार्टी आ रही है। अब प्लॉट दिखाई ने पुराने जमाने की लड़की दिखाई और नए जमाने की लड़का दिखाई,दोनों को पीछे छोड़ दिया दिया है। पहले फोटो भेजे जाते हैं, फ्रंट व्यू, साइड व्यू, कॉर्नर व्यू, पोर्ट्रेट, लैंडस्केप। फिर कागजात भेजे जाते हैं, यानी प्लॉट का बायोडाटा। जैसे शादी-ब्यूरो होते हैं, वैसे ही प्रॉपर्टी-ब्यूरो हैं। ब्रोकर प्लॉट का रिश्ता लेकर घूमता है और कमीशन को वरमाला समझकर पहले ही सुरक्षित कर लेता है।
फिर प्लॉट की पढ़ाई-लिखाई जाँची जाती है,सोसाइटी पट्टा है या जेडीए पट्टा? जैसे पूछा जाता है, लड़की ग्रेजुएट है या पोस्टग्रेजुएट। फिर खानदान देखा जाता है, पिछली सात पीढ़ियों के कागजात। पहले किसके नाम था? किसने बेचा? किसने देखा? किसने छोड़ा? कहीं दो जगह बात तो नहीं चल रही? कहीं कब्ज़े का पुराना प्रेम-प्रसंग तो नहीं?

सबसे बड़ा चरण होता है, पड़ोसी सत्यापन। चाहे लड़का-लड़की हो या प्लॉट, कुंडली पंडित से पहले पड़ोसियों से मिलाई जाती है। और पड़ोसी उस क्षण आपकी पिछली सात पीढ़ियों की नोंकझोंक, लेन-देन, कूड़ा फेंकने की दिशा और नाली के प्रवाह तक याद कर लेते हैं। कई बार उनका अपना प्लॉट भी बिन ब्याहा पड़ा होता है, इसलिए वे आपकी पार्टी को धीरे से अपनी तरफ मोड़ देते हैं,“उधर क्यों देख रहे हो, हमारा भी एक है।” खाली प्लॉट पड़ोसियों के लिए सार्वजनिक संपत्ति होती है। कोई उसमें कूड़ा डालता है, कोई नाली निकालता है, कोई पार्किंग करता है, कोई शादी में टेंट गाड़ देता है, कोई सत्संग कर लेता है। बस चले तो कॉलोनी वाले उस पर सामुदायिक भवन बनाकर उद्घाटन भी करवा दें। और दलाल! वे प्लॉट के कागज़ ऐसे वायरल करते हैं जैसे रिश्ते की फोटो। निजता बाजार में चाट-पकौड़ी की तरह परोस दी जाती है,“प्लॉट ले लो, प्लॉट!” प्लॉट भी भीतर से कहता होगा,“मालिक, थोड़े जवान क्या हुए, बोझ लगने लगे हैं हम ?”
ब्रोकर पूछता है, “यही क्यों बेच रहे हो? आपके दो और प्लॉट हैं, उन्हें भी निकाल दें?”
मैंने कहा, “नहीं भाई, यही बड़ा बेटा है। पहले इसी की शादी करेंगे, छोटे की बाद में।”
वह बोला, “छोटे की डिमांड ज्यादा है।”
मैंने कहा, “दुनिया के लिए खोटा सिक्का होगा, हमारे लिए तो खरा सोना है।”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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