
कमल किशोर नीमा
उज्जैन (मध्य प्रदेश)
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याद आते हैं बचपन के वो दिन जब हम विद्या अध्यन के लिए स्कूल जाते थे। विद्यालय मे वर्ष मे एक दो बार विद्यार्थियों मे बोलने की कला सीखने के लिए वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी। एक निश्चित विषय के ऊपर स्कूल के होनहार छात्र पक्ष अथवा विपक्ष मे बोलने के लिये भाग लेते थे। हम केवल श्रोता की श्रेणी मे आते थे, प्रतियोगिता मे भाग लेने की योग्यता नहीं थी, लेकिन इस प्रतियोगिता से कभी कोई मन मे कड़वाहट नहीं आती थी।
संयोग से ग्यारहवीं कक्षा पास होते ही स्थानीय शासकीय विभाग मे नौकरी प्राप्त हो गई। जहाँ हमें विभाग के एक उच्च अधिकारी महोदय के स्थानान्तरित होने पर अपने विचार व्यक्त करने के लिये कहा गया। संकोच वश न चाहते हुए भी जीवन में पहली बार हमने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, हमारे साहब हमसे बिदा होकर जा रहे है, आप बहुत अच्छे व्यक्ति थे, आप कभी भी हमारे देरी से आफिस मे आने व समय से पूर्व जल्दी घर चले जाने या थकान होने पर आफिस के कोने मे आराम करने पर भी आप किसी को कुछ नहीं कहते थे। आफिस के काम समय पर पूरा नहीं होने पर भी आप किसी पर नाराज़ नहीं होते थे। आज आप बिदा होकर हमसे दूर जा रहे है, इसका हमें बहुत दुख है। जो भी यहाँ आया है उसे एक दिन जाना ही पड़ता है। आप जहां भी रहे ईश्वर आपको शांति प्रदान करे। इतना कहकर हम अपने स्थान पर लौट आये। वातावरण में एक दम शांति थी, कुछ लोग मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। हम इसका कारण समझ नहीं पा रहें थे।
आज वही प्रतियोगिता आधुनिक रूप मे टीवी चैनलों के माध्यम से आयोजित की जा रही है। जहां किसी घटना को बढ़ा चढ़ा कर (जब तक कोई नई घटना सामने नहीं आती) कई दिनों तक टीवी पर दिखा कर अपने यहाँ पक्ष-विपक्ष मे बोलने के लिये कुछ चुनिंदा लोगों को नौकरी पर रखा हुआ है, उनके माध्यम से प्रति दिन धर्म विशेष पर पक्ष विपक्ष में बहस करवा कर लोगों की आस्था को आहत कर अपना व्यवसाय चला रहे है। दुख तो तब और अधिक होता है जब अपने ही धर्म के लोग अपने ही धर्म के विरुध्द अनर्गल टिप्पणी करते है। क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ मे कोई षड्यंत्र तो नहीं चल रहा है जिसका उद्देश्य समाज मे कटुता पैदा कर लोगों को गुमराह करना व अराजकता फैलाना है?
परिचय :- कमल किशोर नीमा
पिता : मोतीलाल जी नीमा
जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६
शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी.
निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश)
रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन रूचि रही है।
व्यवसाय सेवा : आप सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग. सन् १९६४ से सन् १९७० तक एवं सन् १९७१ से सन् २००६ तक के उद्योग जगत के साथ काम करते रहे। सेवा निवृत्ति के बाद ईश्वर की प्रेरणा से पिछले पांच वर्षों से भगवान का भजन आरंभ हुआ है। वर्तमान में लगभग २० भजन लिखे गए हैं, जिनमें १६ भजन यू ट्यूब पर संगीतकार द्वारा संगीतबद्ध करवा कर प्रसारित किए गए हैं जिन्हें यू ट्यूब सनातनम भक्ति २एम स्टूडियो सर्च कर पृथक किया जा सकता है। अयोध्या में श्री राम मंदिर में श्री राम जी की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर टॉवर चौक पर भजन संध्या के अवसर पर आपके द्वारा लिखित भजनों की प्रस्तुति दी गई।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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