
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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मेरा जन्मदिन अभी दूर है, लेकिन हमारे यहाँ जन्मदिन की तैयारियाँ किसी चुनाव से कम नहीं होतीं-घोषणापत्र पहले, कार्यक्रम बाद में। इस बार तय हुआ है कि गायों को चारा और गुड़ खिलाकर जन्मदिन मनाया जाएगा। शहर में इन दिनों गौ-प्रेम फैशन में है। हर मोहल्ले में गौ-आश्रम उग आए हैं-कुछ श्रद्धा से, कुछ फोटो से और कुछ फेसबुक प्रेमियों के सेवा सेल्फी प्रेम से। जब से हमारे योग-गुरु बाबा ने सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा-दारू तक में गाय का तड़का लगाया है, गाय पाँच सितारा शो-रूम की वस्तु बन चुकी है। देसी गाय अब श्रद्धा की नहीं, औकात की चीज़ हो गई है।
गाय से हमारा रिश्ता नया नहीं है। बचपन से पाठ्यक्रम में थी-“गाय हमारी माता है।” निबंध में, उपलों में, होली की बालुडियों में, और सुबह के मक्खन में गाय बराबर मौजूद थी। तब गाय को दरवाज़े पर नहीं बुलाया जाता था; हम बच्चे ही रोटी लेकर गाय के पास जाते थे। आज गायें स्वयं दरवाज़ा खटखटाती हैं। शहर ने परिवारों को आलसी और गायों को आत्मनिर्भर बना दिया है। पहले गौदान सबसे बड़ा दान था। अब पंडित जी ने यूपीआई स्वीकार कर लिया है। गायें आँगन से निकलकर आश्रमों में शिफ्ट हो चुकी हैं। जन्मदिन मनाने वाले हम जैसे लोग आश्रम पहुँचते हैं, गाय को चारा खिलाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और लौटकर फेसबुक पर पोस्ट डालते हैं-“आज कुछ अलग किया।” अलग बस इतना होता है कि
गाय पहले से खा चुकी होती है।
बचपन में हमें दो माताएँ बताई गईं-एक हमारी माँ और दूसरी गाय माता। पिताओं की संख्या भी दो थी-एक हमारे और दूसरे गांधी जी, जिन्हें मास्साब ने बेंत की सहायता से हमारे भीतर स्थापित किया। लेकिन गाय के इस महिमामंडन में उसके भाई-बाप-खसम-बैल और सांड-हमेशा छूट गए। “बनिया का बैल” सुनकर तब समझ नहीं आता था कि यह गाली है। आज समझ आता है-बैल होना ही इस देश में सबसे बड़ा अपराध है।
गाँव में बैल गाड़ी खींचता था, हल में जुता था, कोल्हू चलाता था। उसकी घंटियाँ सुबह-शाम गाँव की साँसें थीं। फिर मशीनें आईं, ट्रैक्टर आए और बैल बेरोज़गार हो गया। गाय पूज्य बनी रही, बैल अनुपयोगी। अगर गाय माता है, तो बैल क्या दूर का रिश्तेदार भी नहीं? इंसान गधे को बाप बना सकता है, बैल को नहीं। आज बैल शहर की गलियों में पड़े मिलते हैं-सड़क, नाली और किस्मत तीनों जाम किए हुए। गौ-आश्रम वाले गायों को चुन-चुनकर उठाते हैं। बैल की पहचान करने के लिए बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है। कोई उत्साही सदस्य गलती से बैल उठा लाए तो उसे वापस छोड़ने के साथ संस्था से भी बाहर कर दिया जाता है। यहाँ गौ-सेवा है, पशु-सेवा नहीं।
शेयर बाज़ार में बुल-बेयर रोज़ खबर बनते हैं, लेकिन असली बुल सड़क पर पड़ा रहे तो कोई कवरेज नहीं। स्कूल में बुलिंग पर चिंता है, सड़क पर बुलिंग झेलते बैल पर नहीं। कभी-कभी ये बैल कुंठा में सांड बन जाते हैं। तब लोग इन्हें गालियाँ देते हैं, जैसे इनके जीवन का यही उद्देश्य था-हमारी झुंझलाहट का साधन बनना। नगर पालिका नालियों की सुध लेती है, सांड की नहीं। अख़बार लिखते हैं-“सांड नाली में गिरा, शहर अस्त-व्यस्त।” कोई नहीं लिखता-“सांड भूखा था।” बजट गाय के लिए है, बैल के लिए नहीं। न इनके वोट हैं, न यूनियन। नेता रैली में घुस आएँ तो इसे सुरक्षा-चूक बताकर चुनावी मुद्दा बना लेते हैं।
बरसात में सांड सूखी सड़क पर लेट जाता है। लोग हॉर्न बजाते हैं, मालिक को कोसते हैं। मालिक कौन-यह प्रश्न कोई नहीं पूछता। कभी-कभी यही कुंठा उस हाथ पर निकलती है जो रोटी देने आया था। लोग कारण ढूँढते हैं- कोई डॉक्टरों पर आरोप लगाता है, कोई सब्ज़ी मंडी पर। सच बस इतना है कि जिसे खिलाया जा रहा है, वह गाय नहीं, सांड है-और उसे यह भूमिका मंज़ूर नहीं। जलीकट्टू पर बवाल हुआ, सोशल मीडिया उफना। कुछ दिन बाद सब भूल गए कि लड़ाई किसके लिए थी। इंसान अपनी ईगो के लिए बुल फाइट चाहता है; बुल अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ रहा है-अकेला। अब आख़िरी उम्मीद कथा-वाचकों से है। जिनके एक इशारे पर जनता दिशा बदल लेती है। अगर वे कह दें कि यह बैल नहीं, नंदी है- भगवान शिव की सवारी-तो तस्वीर बदल सकती है। तब “नंदी आश्रम” खुलेंगे, चढ़ावे में इसका हिस्सा तय होगा। नाम बदलते ही व्यवस्था बदल जाती है-हमारा देश इसका जीता-जागता प्रमाण है। कम से कम इतना तो हो कि गाय के साथ उसके भाई की भी सुध ली जाए। क्योंकि श्रद्धा अगर चयनात्मक हो जाए, तो वह सेवा नहीं, सुविधा बन जाती है। और सांड-या कहिए नंदी-अब सुविधा नहीं, इंसानियत माँग रहा है।
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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