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बरखा का उपहार

डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’
मंडला (मध्य प्रदेश)

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मेघों से फिर अंबार भरा,
रिमझिम हो रही फुहार।
सकल धारा को है मिला,
बरखा का यह उपहार।

सोंधी माटी की खुशबू,
फैल रही है चहुं ओर।
जंगल में मंगल हुआ,
थिरक रहे अब मोर।

सारे बंधन को तोड़कर,
नदिया बह रही स्वतंत्र।
जल का विराट स्वरूप,
दिखता यत्र तत्र सर्वत्र।

रीते रीते सब भर गए,
खेत और खलिहान।
धान बुआई का फिर,
शुरू हुआ अभियान।

वर्षा की नन्ही बूंदों से,
चहुंओर छाई हरियाली,
कृषकों के घर आंगन में,
फिरसे आई खुशियाली।

प्यासी धरती की देखो,
अब बुझ गई है प्यास।
कुम्हलाए हुए वृक्षों में,
फिर आई अब श्वास।

दादुर औ पपीहा ने किया,
फिर बरखा का आगाज
धानी चुनरिया ओढ़कर,
निखरी है वसुंधरा आज।

परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’
निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंडला।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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