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नित्य मन को मार कर के

मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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नित्य मन को मार कर के,
और विष पी हम जिये हैं,
शूल राहों में बिछे पर,
घाव अपनों ने दिये हैं।।

टूटती आशा कड़ी सब
साँस भी बंधक बनी है।
घुट रहा है दम धुँए से,
मौत से अपनी ठनी है।।
लीलता अजगर दुखों का,
वेदना हिय में घनी है।
टाट का बिस्तर जला सब,
वारुणी जी भर पिये हैं।।

उड़ गया है प्रीति-पंछी,
छटपटाता है शिकारी।
वासना का जाल जकड़ा,
कर्म गीता देख हारी।।
दाँव पर पत्नी लगाते,
बैठ कर पागल जुआरी।
है छलावा हर कदम पर,
ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।।

दे रहा है जग चुनौती,
रूठती भी है प्रभाती।
है अँधेरा भी घनेरा,
ये अमावश भी सताती।।
तामसी हैं नृत्य करते,
रोशनी आँखें चुराती।
जूगनू भी करते शरारत,
आस के बुझते दिये हैं।

दोष किसका है कहें क्या,
मौन बैठे हैं सितारे।
आसुरी माया बढ़ी है,
घात करते हैं सहारे।।
है छलावा हर कदम पर,
सत्य निष्ठा भी पुकारे।
हाशिए पर हम खड़े हैं,
संग आकुल हिय लिये हैं।।

परिचय :- मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश)
पति : पुरुषोत्तम भट्ट
माता : स्व. सुमित्रा पाठक
पिता : स्व. हरि मोहन पाठक
पुत्र : सौरभ भट्ट
पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट
पौत्री : निहिरा, नैनिका
सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन।
प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, काव्यमेध, आहुति, सवैया संग्रह, पंख पसारे पंछी
सम्मान : विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा, विद्या सागर और साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन द्वारा, महिला रत्न अलंकरण, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “उत्कृष्ट न्यायसेवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित तथा कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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