
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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“सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो…?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप… यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता?
पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की ड़दौड़ शुरू हो जाती- तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते।फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं- उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता।
टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जाकर मानसून का बजट स्वीकृत होता। और वह भी “ई-टेंडर पोर्टल” से होकर ही आता- ट्रैकिंग कोड सहित! “मानसून आवंटन एवं वितरण मंत्रालय” का गठन होता – जल संसाधन, ग्रामीण विकास और सुस्त अफसरशाही के संयुक्त तत्वावधान में। जातिगत, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन का ध्यान रखना सरकार की लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है। आवंटन को लेकर संसद, सड़क और समाचार चैनलों पर आरोप-प्रत्यारोप का प्री मानसून आ ही गया है। वैसे आजकल बादल भी नेताओं की तरह दल-बदलू हो गए हैं- कब आएँ और कब पाला बदलकर दूसरी जगह चले जाएँ, पता ही नहीं चलता। दिखेंगे आपको और बरसेंगे कहीं और- बिलकुल शातिर नेताओं की बाँटी गई रेवड़ियों की तरह, जो उन्हीं क्षेत्रों में मिलेंगी जिन्होंने उन्हें वोट दिए हैं।
जैसे बरसात में मेंढक टर्र-टर्र करते हैं, उसी प्रकार चुनावी मौसम में नेता रूपी बरसाती मेंढकों की भी टर्र-टर्र सुनाई पड़ती है। बरसात बादलों की ही नहीं होती है, चुनावी वायदों की भी होती है। ऐसी बारिश जो आपको असल में कोई लाभ नहीं देगी, बस *खटाखट-खटाखट* आपको मुँगेरीलाल के हसीन सपनों में ले जाएगी। आप आत्ममुग्ध पड़े रहिए और फिर अगले पाँच साल इस बरसात का इंतज़ार करते रहिए। अब तो *आर्टिफिशियल रेन* का दौर आ गया है। लोगों ने बादलों को भी क़ैद कर लिया है- जब चाहे तब बरसा लो। लोगों को पानी की बारिश से ज़्यादा धन की बारिश में रुचि है। *रेनफॉल* से ज़्यादा *स्नोफॉल* की चाहत है, और इसलिए हिल स्टेशनों में भीड़ मिलेगी। हमारे यहाँ तो जितनी बर्फ़ हिल स्टेशनों पर गिरती है, उससे ज़्यादा तो नेताओं, सेलिब्रिटियों की पार्टियों में वाइन के ग्लास में गिर जाती है।
ये बारिश की कमी, सूखा-सब भुलावा है। अब कौन *राग मल्हार* गाए? प्रेमी भी प्रेमिका के बारिश में भीगने का इंतज़ार नहीं करता। प्रेमिका अब किसी एक की नहीं रही, पब्लिक सेलिब्रिटी हो गई है-लाखों दिलों की धड़कन। पहले ही अपने तन को बिन बरसात के पानी बचाए प्रदर्शन कर रही है, लाखों *कमेंट्स* और *लाइक्स* बटोर रही है। ये है बिन पानी की बारिश, जिसमें भीगे बेरोज़गारों की टोली सरकार को राहत दे रही है। आप तो बस झूठे वादे करते जाओ-बेरोज़गारी कोई समस्या है ही नहीं। युवाओं को हाथ में झुनझुना दे दो और उसमें फोर जी का *डेटा पैक* डाल दो, बस वो *चूँ* तक नहीं करेगा।
शहर भी देखो तो बारिश का स्वागत कुछ खुले मन से नहीं करता। शहर की सड़कें एक ही बारिश में अपने छुपाए गड्ढों को दिखाकर शहर की खस्ता हालत का चिट्ठा बयान करती हैं। इसलिए *पीडब्ल्यूडी* वाले खफ़ा हैं। चूँकि एक ही बारिश में नाले उफान पर आ जाते हैं, इसलिए शहर की सफ़ाई व्यवस्था की ज़िम्मेदारी लेने वाले महकमे भी बरसात से खफ़ा हैं!
पर्यावरण विभाग वालों के वृक्षारोपण की असलियत सामने आ जाती है। बाँधों की कमीशनखोरी से बनी दीवारें, जो एक बारिश में टूटकर बाढ़ ला देती हैं-इन सबकी हकीकत बयान करने वाली बारिश से भला कौन खफ़ा नहीं होगा? बारिश से सूखा कम हो जाए ये तो संभव नहीं, हाँ बाढ़ ज़रूर आएगी। और हर बार बारिश रिकॉर्ड नहीं तोड़ती-बारिश से आने वाली बाढ़ रिकॉर्ड तोड़ती है।
सरकारें और महकमे बारिश से उतने खुश नहीं होते जितने *ओलावृष्टि* और *अति वृष्टि* से बर्बाद हुई फसलों के मुआवज़े देने में खुश होते हैं। एक तो किसान की चप्पल घिसवाने का मज़ा और मुआवज़े की राशि से अपने घर में भी कुछ रिश्वत की सुखद बारिश की कृपा जो जुड़ी है।
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
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