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नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)

खुमान सिंह भाट
रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़)
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विज्ञान का मानना है कि किसी वस्तु के सेवन से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं प्रभावित होती हैं और व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तित हो जाता है। किंतु, यह आवश्यक नहीं है कि केवल मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली वस्तुएं ही ‘नशा’ हैं। यदि नशे को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह कला और भावना के प्रति गहरी दीवानगी को दर्शाता है।
न करते औषधियों से प्रेम धन्वंतरि, तो आयुर्वेद का सटीक प्रमाण कहाँ से मिल पाता?
न होती ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लगन राजा हरिश्चंद्र में, तो सामाजिक नैतिकता की स्थापना कहाँ से हो पाती?
न होती ज्ञान और संगीत की तल्लीनता देवर्षि नारद में, तो वेदों का प्रचार-प्रसार कहाँ से हो पाता?
न होती भक्ति-भावना की पराकाष्ठा भक्त प्रह्लाद में, तो ईश्वरीय आस्था की सिद्धि कहाँ से हो पाती?
न होता निःस्वार्थ भाव महर्षि दधीचि में, तो परोपकार का सर्वोच्च उदाहरण कहाँ से प्राप्त हो पाता?
न होता रामायण महाकाव्य रचने का अनुराग महर्षि वाल्मीकि को, तो समाज को नीति, धर्म और आदर्श जीवन की सीख कहाँ से मिल पाती?
न होता मर्यादा का ऐसा नशा श्री रामचंद्र में, तो रामराज्य (आदर्श शासन) की स्थापना कहाँ से हो पाती?
न होता अस्त्र-शस्त्र के ज्ञान का संकल्प ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र को, तो शिक्षा और रक्षा प्रणाली में देश सुदृढ़ कैसे हो पाता?
न होता कर्म-प्रधान होने का धुन श्रीकृष्ण को, तो कर्तव्य-पथ पर अडिग रहने का महत्व कहाँ से मिल पाता?
न होती महाभारत और पुराणों की रचना का समर्पण वेदव्यास में, तो ज्ञान का संकलन और संरक्षण कहाँ से हो पाता?
न होता राज-धर्म और कर्तव्य का ऐसा नशा भीष्म पितामह को, तो अनुशासन और प्रतिज्ञा-पालन की पराकाष्ठा का उदाहरण कहाँ से मिल पाता?
न होता सत्य के पालन का हठ युधिष्ठिर में, तो विकट परिस्थितियों में भी धैर्य की प्रेरणा कहाँ से मिल पाती?
न होता सनातन धर्म के उत्थान का संकल्प आदि शंकराचार्य को, तो भारत के चारों कोनों पर अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार कैसे हो पाता?
न होती समाज सेवा करने की भावना बापू (महात्मा गांधी) में, तो ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का संदेश जन-जन तक कैसे पहुँच पाता?
न होती देशभक्ति की भावना ५२७ वीर रणबांकुरों में, तो कारगिल की सरहद पर इतनी शान से तिरंगा कैसे लहरा पाता?
न होती राष्ट्रीय एकता की भावना सरदार पटेल में, तो अखंड भारत का स्वरूप आज जैसा है, वह कहाँ से हो पाता?
न होती नारी शक्ति जागरण की भावना सावित्रीबाई फुले में, तो महिलाओं को शिक्षा और बेहतर बुनियादी सुविधाएं कहाँ से प्राप्त हो पातीं?
न होता सपनों को साकार करने का जुनून कलाम साहब (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम) में, तो आज भारत को मिसाइल मैन कहाँ से प्राप्त हो पाता?
न होता साहस और आत्मनिर्भरता की भावना रानी लक्ष्मीबाई में, तो १८५७ की क्रांति में वे अपने अद्भुत शौर्य का परिचय कैसे दे पातीं?
न होती एकाग्रता की अखंड साधना स्वामी विवेकानंद में, तो लक्ष्य-प्राप्ति का सही बोध (ज्ञान) कहाँ से हो पाता?

परिचय :- खुमान सिंह भाट
पिता : श्री पुनित राम भाट
निवासी : ग्राम- रमतरा, जिला- बालोद, (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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