
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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प्रश्न उठा
डर नहीं लगता
उत्तर मिला
कैसा डर…
किससे डर…
ये दुनिया है ही नंगों की
नंगे को नंगे से डर कैसा…..
ये तो हमाम है
यहाँ सब नंगे हैं
बस.. अंतर इतना सा कि
कोई है छोटा नंगा
तो कोई बड़ा नंगा
कोई मात्र हेराफेरी से चलता है
तो कोई सौदा कर लेता आत्मा का
जैसा भी हो
नंगा तो बस नंगा है
नंगे को नंगे से डर कैसा…..
क्यों सोचते हैं
नंगे के पास आत्मा होगी
जिसे अहसास हो
जिसमें संवेदन हो… दर्द हो..
नंगा कब सचेत होता है
कि जमीर जागता रहे
नंगा कब अचेत होता है कि
प्रतिहिंसा दफन हो
कौन पड़े
चेतन-अवचेतन के पंगे में
नंगे तो सिर्फ नंगे होते हैं
फिर नंगे को डर कैसा…..
नंगे को तो मतलब है
मात्र अपने मतलब से
अपनी आकांक्षा से
अपनी महत्वाकांक्षा से
अगर कुछ होता और तो
क्यों कहलाता नंगा
ये तो सिर्फ लिपटा है
दर्प की झीनी झीनी चादर से
जो भला कब ढक पाती है
किसीके नंगेपन को
वो तो सिर्फ जीता है
ढके होने के भ्रम में
पर असल में तो है नंगा
और नंगे को डर कैसा…..
नंगा तो रहेगा ही नंगा
फिर कैसा डर
किससे डर
या यूँ कहूँ कि
नंगा तो जन्मजात निडर है
मतलब
नंगा सदैव निडर है
सदा निडर रहेगा
निडर को डर कैसा
नंगों में नंगे को डर कैसा….. !
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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