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गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)

चिचियावत डोलत हांसत हे,
मन ल देख वो थरथर कांपत हे,
कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल,
छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल,
बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे,
हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे,
हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा,
झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा,
मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी,
धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी,
कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी,
का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी,
बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे,
खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे,
सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे,
मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे,
इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे,
अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी,
कहां जावय बता ए भई,
गोहरावत हे हसदेव, हसदेव…
कइसे बचाहीं अपन जंगल ल,
कइसे बचाहीं अपन पानी,
कइसे बचाहीं चिरई-चुरगुन,
कइसे बचाहीं जिनगानी,
काटत-काटत डारा गिरही,
सूखत जाही नदिया-नाला,
कागज ऊपर हरियर जंगल,
जमीं म खाली होही छाला,
मोर छाती म टांगी चलथे,
मोर सांस म धुर्रा भरथे,
जिनगी देवइया जंगल मोला,
आज मोल म बिके बर मरथे,
मोर कोरा म खेलत बालक,
कइसे खेलही घूरा म रे,
मोर गोदी के चिरई कहिथे,
कहां उड़हूं अब पूरा म रे?
बघवा के डेरा उजड़त हे,
हाथी के डगर हरावत हे,
भालू, हिरन, चिरई-चुरगुन
कहां अपन घर बनावत हे?
पेड़ कटे त हवा कहां ले,
नदिया सूखे पानी कहां ले,
माटी रोवत, पहाड़ कराहत,
दूध मिलही किसानी कहां ले?
जंगल मोर दाई के अंचरा,
नदिया मोर दाई के पानी,
माटी मोर दाई के ममता,
एमा बसथे मोर कहानी,
मोर जंगल ल मत उजाड़व,
मोर नदिया ल मत सुखावव,
मोर पुरखा के छांव बचावव,
मोर अवइया पीढ़ी बचावव।
नइ तो एक दिन पूछही संतान,
कहां गे वो हरियर बन भाई?
कहां गे वो नदिया के कलकल?
कहां गे चिरई के तरुनाई?
तब का जवाब देहू दुनिया ल,
का कहिहू अपन जमीर ल?
धन के खातिर बेच दिहू का
दाई के जिंदा तस्वीर ल?
सुनव सरकार, सुनव समाज,
जंगल सिरिफ लकड़ी नइ हे,
नदिया सिरिफ पानी नइ हे,
माटी सिरिफ धरती नइ हे,
एमा बसथे सांस मनखे के,
एमा बसथे जीव-जंतु के,
एमा बसथे पुरखा के सपना,
एमा भविष्य संतति के,
अब्बड़ होगे खेल तमासा,
अब्बड़ होगे मोल-भाव,
जंगल दाई गोहरावत हे,
बचावव मोला, देहू जवाब,
डारा-पाना हाथ जोड़ के,
नदिया रोवत धार बहावत,
बघवा, हाथी, चिरई कहिथें,
हमर घर ल मत उजाड़व,
जागव संगी, जागव भाई,
जंगल बर अब आवाज उठावव,
समता, न्याय अउ हक के रद्दा
मिलके अपन बनावव,
हसदेव के हर बूंद कहत हे,
सुनव मोर गोहार,
जंगल बचही, पानी बचही,
तभे बचही संसार,
मोर जंगल, मोर पानी,
मोर माटी, मोर पहचान,
गोहरावत हे हसदेव आज
बचावव मोर अरमान,
गोहरावत हे हसदेव,
गोहरावत हे हसदेव।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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