
भीष्म कुकरेती
मुम्बई (महाराष्ट्र)
********************
भारत में भोजन इतिहास
भारतीय इतिहास का मौर्य काल (लगभग ३२२ ईसा पूर्व से १८५ ईसा पूर्व) न केवल राजनीतिक सुदृढ़ता, प्रशासनिक दक्षता और विशाल साम्राज्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यह संस्कृति, कला, अर्थव्यवस्था और खान-पान के विकास का भी एक स्वर्ण युग था। मौर्य साम्राज्य के दौरान भारतीय समाज में कृषि का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, व्यापारिक मार्ग सुदृढ़ हुए और देश-विदेश से सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा। इसका सीधा प्रभाव तत्कालीन जनजीवन, भोजन की विविधता, पाककला (Culinary Arts) और भोजन से जुड़े सामाजिक तथा धार्मिक नियमों पर पड़ा। इस काल की भोजन व्यवस्था और पाककला की जानकारी हमें मुख्य रूप से कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’, यूनानी राजदूत मेगास्थनीज के यात्रा वृत्तांत ‘इंडिका’, अशोक के शिलालेखों तथा उस काल के बौद्ध और जैन ग्रंथों से प्राप्त होती है।
कृषि का विस्तार और खाद्य सामग्री की उपलब्धता
मौर्य काल में अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि थी, और राज्य की ओर से सिंचाई, बांधों और भूमि सुधार के विशेष प्रबंध किए जाते थे। ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य द्वारा कृषि नियंत्रण, धान की विभिन्न किस्मों, दालों, तिलहनों, सब्जियों और फलों के उत्पादन का विस्तृत विवरण मिलता है। अनाज और खाद्यान्न: इस काल में चावल (शालि, व्रीहि), जौ (यव), गेहूं (गोधूम), और विभिन्न प्रकार के मिलेट्स (मडुआ, ज्वार, बाजरा) प्रमुख थे। कौटिल्य ने विभिन्न प्रकार के धान और उनसे बनने वाले भोजनों का उल्लेख किया है।दालें और फलियां: उड़द, मूंग, मसूर, चना और मटर का नियमित उपयोग होता था। शाक-सब्जियां और कंदमूल: भूमिगत कंदमूल, हरी पत्तेदार सब्जियां, लौकी, कद्दू, बैंगन और विभिन्न जंगली साग मौर्यकालीन आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। फल और मेवे: आम, केला, अंगूर, अनार, जामुन, खजूर, और विभिन्न प्रकार के पहाड़ी और मैदानी फल बहुतायत में खाए जाते थे।
मौर्यकालीन पाककला (Culinary Arts) और व्यंजन विविधता
मौर्य काल की पाककला अत्यंत विकसित थी। भोजन को स्वादिष्ट, पौष्टिक और सुपाच्य बनाने के लिए विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता था। राजसी महलों से लेकर सामान्य जन के घरों तक रसोई कला के अलग-अलग स्तर थे।
शाही रसोई और पाक विशेषज्ञ
राजमहलों में राजाओं के भोजन की तैयारी अत्यधिक सतर्कता और विशेषज्ञता के साथ की जाती थी। ‘अर्थशास्त्र’ में भोजन को जहर से बचाने के लिए विशेष परीक्षकों (विषकन्याओं या प्रशिक्षित वैद्य-कर्मचारियों) का उल्लेख है। रसोइयों और सूपकारों (Cooks) का एक संगठित वर्ग था जो विभिन्न स्वादों, मसालों और पकाने की विधियों में पारंगत होता था।
प्रमुख खाद्य एवं पेय व्यंजन:
भात और व्यंजन (ओदन): चावल विभिन्न रूपों में पकाया जाता था। सादा भात, दूध में पकाया गया खीर (पायस), और मांस या दाल के साथ पकाए गए मिश्रित चावल के व्यंजन लोकप्रिय थे। मांस पकाने की विधियां: मेगास्थनीज के विवरण के अनुसार, मौर्य समाज (विशेषकर क्षत्रिय और उच्च वर्ग) में मांस का सेवन प्रचलित था। हिरण, सूअर, भेड़, और विभिन्न पक्षियों का मांस भुना हुआ, उबला हुआ या झोल (सूप) के रूप में खाया जाता था। राजाओं के शिकार के दौरान ताज़ा मांस पकाने की विशेष व्यवस्था होती थी।
शाकाहारी पकवान: दालों के सूप, विभिन्न प्रकार की रोटियां, पूरियां, और आटे-दाल से बनने वाले खमीरयुक्त व्यंजन खाए जाते थे।
पेय पदार्थ: मौर्य काल में विभिन्न प्रकार के पेयों का प्रचलन था। फलों के रस, गन्ने का रस, नारियल पानी, और दूध आधारित पेय के अलावा विभिन्न प्रकार की मदिरा (सुरा, मैरेय, आसव, और सीधु) का सेवन समाज के विभिन्न वर्गों में होता था। मेगास्थनीज ने उल्लेख किया है कि भारतीय लोग मदिरा कम पीते थे, लेकिन उत्सवों और विशेष अवसरों पर इसका सेवन किया जाता था।
भोजन नियम, शिष्टाचार और सामाजिक-धार्मिक प्रभाव
मौर्य काल में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था, बल्कि इसे अनुशासन, स्वास्थ्य और धार्मिक संस्कारों से जोड़कर देखा जाता था। भोजन से संबंधित नियमों को कड़ाई से पालन किया जाता था।
वर्ण व्यवस्था और खान-पान के नियम
सामाजिक सोपान: समाज के विभिन्न वर्गों के खान-पान में भिन्नता थी। ब्राह्मण और तपस्वी आमतौर पर शुद्ध शाकाहारी, सात्विक भोजन (कंदमूल, फल, शाक और दूध) ग्रहण करते थे। वहीं क्षत्रिय वर्ग में शिकार का मांस भी भोजन का हिस्सा था।
अस्पृश्यता और शुद्धता: भोजन की पवित्रता को लेकर समाज में कड़े नियम थे। रसोई घर की स्वच्छता और भोजन बनाने वाले की पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान था, जो यह दर्शाता है कि राज्य शुद्ध भोजन उपलब्ध कराने के प्रति कितना गंभीर था।
बौद्ध, जैन और मौर्य सम्राटों का प्रभाव
मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध धर्म के प्रसार ने खान-पान की संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।
अहिंसा और पशु वध पर नियंत्रण: अशोक ने अपने शिलालेखों (विशेषकर प्रथम स्तंभ लेख और लघु शिलालेख) में राजकीय रसोई में मारे जाने वाले पशुओं की संख्या को बेहद कम कर दिया और अंततः कई प्रकार के पशु वध पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे साम्राज्य में शाकाहारी भोजन और अहिंसक जीवनशैली को बड़ा प्रोत्साहन मिला।
सम्राट अशोक का भोजन: जैन और बौद्ध परंपराओं के प्रभाव से अशोक ने सादा और संयमित जीवन अपनाया, जिसका प्रभाव शाही भोजों की भव्यता को कम करने पर भी पड़ा।
भोजन करने के नियम और शिष्टाचार
समय और संयम: प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार दिन में दो बार (दोपहर और शाम) भोजन करने का नियम था। अतिथि सत्कार को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था- “अतिथि देवो भव” की भावना मौर्य समाज में प्रबल थी।
स्वास्थ्य और आयुर्वेद: भोजन करते समय ऋतुओं (ऋतुचर्या) और प्रकृति (वात, पित्त, कफ) का ध्यान रखा जाता था। आयुर्वेद के सिद्धांतों के आधार पर भोजन को औषधि के रूप में भी देखा जाता था, जिससे शरीर में संतुलन बना रहे।
निष्कर्ष
मौर्य काल में भोजन और पाककला ने एक लंबी और समृद्ध यात्रा तय की। एक ओर जहां यह काल आर्थिक समृद्धि के कारण लजीज व्यंजनों, मसालों और विविध खाद्यान्नों से परिपूर्ण था, वहीं दूसरी ओर बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव ने समाज को संयम, शुद्धता और अहिंसा की ओर अग्रसर किया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मेगास्थनीज के विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि मौर्यकालीन भोजन प्रणाली केवल पोषण तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह राज्य प्रशासन, अर्थव्यवस्था, नैतिकता और सामाजिक अनुशासन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। मौर्य काल में कृषि एक अत्यंत महत्वपूर्ण गतिविधि थी और कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय पर न केवल नीतियों का ग्रंथ है, बल्कि एक विस्तृत कृषि-संहिता भी है। मौर्य प्रशासन ने कृषि को राज्य की आय का प्रमुख स्रोत मानते हुए इसके लिए अत्यंत कड़े और सुव्यवस्थित नियम बनाए थे। यहाँ मौर्यकालीन कृषि नियमों और कृषि-प्रशासन का विस्तृत विवरण है:
कृषि भूमि और राज्य का नियंत्रण
कौटिल्य के अनुसार, भूमि का स्वामी राज्य था। कृषि के लिए नियमों का मुख्य उद्देश्य उत्पादकता को अधिकतम करना और राज्य के खजाने को भरना था।
सीताध्यक्ष का पद: अर्थशास्त्र में कृषि विभाग के अध्यक्ष को ‘सीताध्यक्ष’ कहा गया है। इनका प्रमुख कार्य राज्य के कृषि कार्यों का पर्यवेक्षण करना, श्रमिकों का प्रबंधन करना, बीज संचय करना और कृषि उपकरणों की देखरेख करना था।
भूमि का आवंटन: राज्य उन लोगों को भूमि आवंटित करता था जो खेती करने में सक्षम थे। यदि कोई किसान अपनी भूमि को कृषि योग्य नहीं बनाता था, तो राज्य उसे छीनकर किसी अन्य व्यक्ति को देने का अधिकार रखता था।
राजकीय फार्म (सीता): राज्य के अपने सीधे नियंत्रण वाले खेतों को ‘सीता’ कहा जाता था। यहाँ राज्य के दासों, कैदियों और दिहाड़ी मजदूरों के माध्यम से खेती की जाती थी।
बीज और फसल प्रबंधन
अर्थशास्त्र में बीजों के संरक्षण और फसल चक्र को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं: बीज का उपचार: कौटिल्य ने बीजों को बोने से पहले विशेष प्रकार के उपचार (जैसे गोबर, शहद, घी का लेप) देने का सुझाव दिया है, ताकि अंकुरण बेहतर हो सके।
फसल चक्र: मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार की फसलों को अदल-बदल कर बोने का नियम था। चावल, तिलहन, दालें और सब्जियों की खेती के लिए अलग-अलग मौसम निर्धारित थे।
सिंचाई और जल-कर नियम
मौर्यकालीन कृषि नियमों में सिंचाई का स्थान सर्वोपरि था। राज्य ने जल प्रबंधन को एक अनिवार्य सरकारी जिम्मेदारी माना था।
उदकभाग (जल-कर): राज्य द्वारा सिंचाई के साधन उपलब्ध कराने के बदले किसानों से ‘उदकभाग’ नामक कर वसूला जाता था। यह कर फसल का १/५ से १/३ तक हो सकता था।
स्वयं की व्यवस्था: यदि किसान स्वयं की व्यवस्था (कुएं, नहर या तालाब) से सिंचाई करता था, तो उसे कर में विशेष छूट दी जाती थी।
तड़ाग (तालाब) निर्माण: कौटिल्य ने राजा को निर्देश दिया है कि वह नहरों, तालाबों और बांधों का निर्माण कराए। इन जल स्रोतों को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान था।
कृषि-कर और राजस्व (भाग और बलि)
राजस्व निर्धारण में अर्थशास्त्र अत्यंत कठोर है:
भाग: कृषि उपज का वह हिस्सा जो राज्य को कर के रूप में दिया जाता था, ‘भाग’ कहलाता था। सामान्यतः यह उपज का छठा भाग (१/६) होता था।
बलि: इसके अतिरिक्त एक और कर ‘बलि’ था, जिसे संभवतः धार्मिक या प्रशासनिक कार्यों के लिए अतिरिक्त कर के रूप में लिया जाता था।
मुआवजा और दंड: यदि किसान समय पर कर नहीं चुकाते थे या कृषि कार्य में लापरवाही बरतते थे, तो उन पर जुर्माना लगाया जाता था। इसके विपरीत, अकाल या प्राकृतिक आपदा के समय राजा द्वारा बीज, अनाज और ऋण देकर सहायता करने का भी नियम था।
कृषि संबंधी दंड और नैतिकता
कौटिल्य ने कृषि को सुरक्षित रखने के लिए कड़े दंड निर्धारित किए थे:
पशुओं की सुरक्षा: खेतों में चरते हुए पशुओं से फसल बचाने के लिए सख्त नियम थे। बिना अनुमति के फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले पशुओं के मालिक पर जुर्माना लगाया जाता था।
श्रमिक प्रबंधन: खेतों पर काम करने वाले मजदूरों का शोषण रोकने के लिए राज्य द्वारा मजदूरी तय की जाती थी। साथ ही, यदि कोई मजदूर काम के प्रति लापरवाही करता या अनुपस्थित रहता, तो उसे दंडित किया जाता था।
मौसम और नक्षत्रों का ज्ञान
मौर्यकालीन कृषि नियमों में मौसम का पूर्वानुमान लगाना भी शामिल था। अर्थशास्त्र में इस बात का उल्लेख है कि राज्य को वर्षा के समय और उसकी मात्रा का अनुमान लगाने के लिए विशेष यंत्रों (वर्षामापक या ‘वर्षमान’) का उपयोग करना चाहिए। इस ज्ञान के आधार पर ही अगली फसल की योजना बनाई जाती थी।
निष्कर्ष
मौर्यकालीन कृषि नियम यह दर्शाते हैं कि उस समय का शासन कितना दूरदर्शी था। ‘अर्थशास्त्र’ में कृषि केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय उद्योग के रूप में थी। राज्य का हस्तक्षेप—बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने से लेकर सिंचाई और राजस्व निर्धारण तक—यह बताता है कि मौर्य साम्राज्य में कृषि को एक व्यवस्थित वैज्ञानिक ढांचे के अंतर्गत रखा गया था। यही कारण था कि मौर्य साम्राज्य न केवल विशाल था, बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और समृद्ध भी था।
आभार –कृबु
Copyright @Bhishma Kukreti
जिन्हे अरुचिकर लगे वे सूचित कीजियेगा
परिचय :- भीष्म कुकरेती
जन्म : उत्तराखंड के एक गाँव में १९५२
शिक्षा : एम्एससी (महाराष्ट्र)
निवासी : मुम्बई
व्यवसायिक वृति : कई ड्यूरेबल संस्थाओं में विपणन विभाग
सम्प्रति : गढ़वाली में सर्वाधिक व्यंग्य रचयिता व व्यंग्य चित्र रचयिता, हिंदी में कई लेख व एक पुस्तक प्रकाशित, अंग्रेजी में कई लेख व चार पुस्तकें प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

















