
चित्रलेखा व्यास
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)
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विंध्याचल की पहाड़ियों पर उस दिन धूप कुछ फीकी-सी थी। मंदिर की सीढ़ियों के बाहर लाजो चुपचाप बैठी थी। सामने घंटियाँ लगातार बज रही थीं- टन…टन…टन… हर एक घंटी की आवाज़ जैसे उसके भीतर उतरकर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रही थी। लाजो मिर्जापुर की रहने वाली थी। उम्र बहुत नहीं थी, मगर आँखों में जाने कितने मौसम उतर चुके थे। वह मंदिर के बाहर बैठी उन घंटियों को सुनते हुए सोच रही थी- क्या ईश्वर के घर में भी किसी लड़की की इच्छा की कोई आवाज़ पहुँचती है?
तभी मंदिर के भीतर से पुजारी ने उसे आवाज़ दी। “बेटी, दर्शन कर लो।” वह उठी। माथे पर आँचल खींचा और माँ विंध्यवासिनी के सामने जा खड़ी हुई। आँखें बंद कीं तो मन में कोई प्रार्थना नहीं थी, केवल एक प्रश्न था- “माँ, मेरी जिंदगी का रास्ता मुझे चुनने दोगी?” दर्शन करके वह गंगा किनारे चली गई। गंगा उस दिन बहुत शांत थी। किनारे बैठे-बैठे उसने देखा- छोटी-छोटी चिड़ियाँ पानी में उतरतीं, एक क्षण डुबकी लगातीं और फिर अपने पंखों को फड़फड़ाकर आकाश में उड़ जातीं। लाजो देर तक उन्हें देखती रही। उसने मन ही मन कहा- “काश! मैं भी इन चिड़ियों जैसी होती… जिसे जहाँ जाना हो, उड़ जाती। किसी से पूछना न पड़ता कि मेरी उड़ान किस दिशा में होगी।” उसने गंगा का पानी हथेलियों में लिया। चेहरे पर लगाया। उसे लगा जैसे नदी उसके भीतर की सारी घुटन बहा ले जाएगी। लेकिन घर लौटते ही उसे पता चला कि उसके पिता ने उसकी सगाई तय कर दी है। लाजो ने कुछ कहना चाहा, मगर पिता की आँखों में बेटी के भविष्य की चिंता थी और समाज का डर भी। “बेटी, घर-परिवार देख लिया है। लड़का ठीक है। अब हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ में है।” लाजो ने सिर झुका दिया। उसने पहली बार समझौता किया। उसने अपनी इच्छा से। अपनी उड़ान से। अपने सपनों से। और शायद सबसे पहले- अपने आप से। कुछ ही समय बाद उसकी शादी हो गई।
शादी के लाल जोड़े में बैठी लाजो को लगा था कि अब उसका अपना घर होगा। कोई उसका हाथ थामेगा, उसके मन की सुनेगा। लेकिन सुहाग की लाल चूड़ियों के भीतर छिपी उसकी जिंदगी का रंग बहुत जल्द फीका पड़ गया। शादी के बाद उसे पता चला कि उसका पति मानसिक रूप से अस्वस्थ था। वह कभी सामान्य रहता, तो कभी ऐसी बातें करता जिन्हें लाजो समझ नहीं पाती। कभी हँसता, कभी गुस्सा करता, कभी बिना कारण घर से निकल जाता। लाजो पति की पत्नी कम और उसकी देखभाल करने वाली अधिक बन गई। लेकिन उसके दुःख का सबसे बड़ा कारण पति भी नहीं था। घर की जिठानियाँ उसे ताने देतीं- “अपने भाग्य को रो रही है?” “मायके वालों ने क्या देखकर शादी की थी?” “पति को संभाल नहीं सकती तो कैसी पत्नी?” हर ताना उसके हृदय पर पत्थर की तरह गिरता। वह रात में चुपके से रोती। तकिए में मुँह छिपाकर रोती, ताकि उसकी सिसकियाँ किसी को सुनाई न दें।
कभी-कभी वह आईने के सामने खड़ी होकर खुद से पूछती- “लाजो, तू कहाँ खो गई?” आईना चुप रहता। एक दिन अत्याचार की सीमा टूट गई। लाजो अपने मायके लौट आई। वह कुछ दिनों के लिए नहीं लौटी थी। वह आठ वर्षों तक वहीं रही।
आठ साल… आठ साल किसी स्त्री के जीवन में केवल समय नहीं होते, वे उम्र के आठ हिस्से होते हैं, जिनमें बालों में सफेदी उतरती है और आँखों में अनुभव। मगर लाजो ने उन आठ वर्षों में हारना नहीं सीखा। कई रातें ऐसी आईं जब उसका मन इतना टूट गया कि उसे जीवन से मोह नहीं रहा। वह गंगा किनारे जाती। लहरों को देर तक देखती। कभी-कभी उसके पैर पानी की ओर बढ़ जाते। एक रात उसने सचमुच सोच लिया- “बस… अब और नहीं।” वह गंगा की ओर बढ़ी। लेकिन तभी किनारे पर बैठी एक छोटी बच्ची ने अपनी माँ का हाथ पकड़कर कहा- “माँ, घर चलो… बहुत रात हो गई।” लाजो ठिठक गई। उसने उस बच्ची को देखा। उसके भीतर जाने कहाँ से एक आवाज़ उठी- “अगर मैं चली गई तो मेरे हिस्से की लड़ाई कौन लड़ेगा?” वह वापस लौट आई। उस रात उसने पहली बार मृत्यु से नहीं, जीवन से समझौता किया। उसने तय किया- “मैं मरूँगी नहीं। मैं अपनी जिंदगी को फिर से लिखूँगी।” समय बीतता गया।
परिवार की परिस्थितियों के बीच लाजो ने फिर अपने वैवाहिक जीवन में लौटने का निर्णय लिया। यह लौटना हार नहीं था। वह अपने भीतर की ताकत लेकर लौटी थी। कुछ वर्षों बाद उसकी बेटियाँ हुईं। जब पहली बेटी ने उसकी उँगली पकड़ी तो लाजो ने उसे देखकर कहा- “तू मेरी बेटी नहीं, मेरी अधूरी उड़ान है।” दूसरी बेटी आई तो उसने उसे सीने से लगाकर कहा- “तुम दोनों वह पढ़ाई पढ़ोगी, जो मैं नहीं पढ़ सकी।” लाजो ने अपने हिस्से की रोटी कम कर दी, लेकिन बेटियों की किताबें कभी कम नहीं होने दीं। घर में पैसे कम होते तो वह अपने कपड़े नहीं खरीदती। बेटियों की फीस भरती। त्योहार आता तो अपने लिए चूड़ियाँ नहीं लेती। बेटियों के लिए किताबें लाती। लोग कहते- “लड़कियों को इतना पढ़ाकर क्या करोगी?”
लाजो मुस्कुराती- “जिस दिन ये अपने पैरों पर खड़ी होंगी, उस दिन मुझे अपने सारे समझौते छोटे लगेंगे।” बेटियाँ पढ़ती गईं। एक ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। दूसरी ने भी अपने सपनों को पंख दिए। वे दोनों आगे बढ़ती गईं। और एक दिन वही बेटियाँ अपनी माँ के सामने किताब लेकर बैठीं। “माँ, अब आपकी बारी है।” लाजो हँस पड़ी। “मेरी उम्र में?” बड़ी बेटी ने उसका हाथ पकड़कर कहा- “उम्र पढ़ाई की नहीं होती माँ, सपनों की होती है।” लाजो ने वर्षों बाद फिर किताब उठाई। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। अक्षर धुँधले दिखाई दे रहे थे। लेकिन इस बार उसकी आँखों का धुँधलापन आँसुओं का था- दुःख का नहीं, गर्व का।
बेटियों ने माँ को फिर से पढ़ाया। जिस माँ ने उन्हें जीवन पढ़ाया था, अब बेटियाँ माँ को अक्षर पढ़ा रही थीं। समय ने करवट ली। बेटियाँ अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। लाजो ने अपनी जिंदगी में न जाने कितने समझौते किए थे-
बचपन के साथ समझौता।
सपनों के साथ समझौता।
शादी के साथ समझौता।
रिश्तों के साथ समझौता।
समाज के साथ समझौता।
और सबसे बड़ा समझौता- अपने मन के साथ।
लेकिन एक समझौता उसने कभी नहीं किया- अपनी बेटियों के भविष्य से। एक शाम वह फिर गंगा किनारे बैठी थी।
वही गंगा।
वही किनारा।
वही चिड़ियाँ।
बस इस बार लाजो की आँखों में उदासी नहीं थी। एक चिड़िया पानी में डुबकी लगाकर फिर आसमान में उड़ गई। लाजो मुस्कुराई। उसने धीमे से कहा- “मैं भी उड़ना चाहती थी… मगर मेरे पंखों को मेरे बच्चों ने पहचान लिया।” बेटियाँ उसके पास आकर बैठ गईं। एक ने माँ के कंधे पर सिर रखा। दूसरी ने उसका हाथ थाम लिया। लाजो ने दोनों को देखा। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
बेटी ने पूछा- “माँ, रो क्यों रही हो?” लाजो मुस्कुराई- “ये आँसू समझौते के नहीं हैं बेटी… ये उस दिन की खुशी के हैं, जब मेरी जिंदगी ने मुझे लौटाकर मेरा अपना नाम दिया है।”
गंगा बहती रही।
चिड़ियाँ उड़ती रहीं।
घंटियाँ दूर विंध्याचल के मंदिर में फिर बजने लगीं- टन…टन…टन… लाजो ने आँखें बंद कीं। आज घंटियों की आवाज़ उसे उदास नहीं कर रही थी। उसे लगा- शायद ईश्वर ने उसकी प्रार्थना देर से सुनी थी, मगर सुनी जरूर थी। और उस दिन लाजो समझ गई- हर समझौता हार नहीं होता; कुछ समझौते आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाते हैं। लेकिन अपनी आत्मा, अपने अस्तित्व और अपने सपनों से किया गया समझौता- एक दिन न एक दिन टूटना ही चाहिए। लाजो ने गंगा की ओर देखा। चिड़ियाँ फिर आकाश में थीं। और इस बार उसे लगा- उड़ान देर से मिली है, पर अब यह उड़ान उसकी अपनी है।
परिचय : चित्रलेखा व्यास
उपनाम : नीलचित्रा व्यास
जन्मतिथि : ११/०६/१९९६
पिता : मदन मोहन व्यास
माता : बन्नी देवी
पति : निलेश चौबीसा
स्थाई पता : कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)
वर्तमान पता : प्रतापनगर, उदयपुर (राजस्थान)
शिक्षा : BCA कपासन (2015), M.A अंग्रेजी साहित्य (MLSU, Udaipur), B.A हिंदी साहित्य(MLSU, Udaipur), MCA जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी, उदयपुर (राजस्थान) (2025)
प्रकाशित पुस्तकें : सहलेखिका- १ शब्दों का आसमान, २ भारत की बेटी, ३ सावन के झूले, तीज के गीत, ४ Mansoon, ५ sturmfier, ६ Trees of memory, ७ Scares&stars, ८ Soulprints of friendship, ९ Gardan of worlds, १० SUNBURNT ROSES.
सम्मान : राज श्री राष्ट्रीय वीर साहित्य वीर शिरोमणि सम्मान २०२६, राज श्री श्रीहरि भक्ति काव्य साहित्य रत्न सम्मान२०२६, विश्व हिंदी सृजन सागर मंच पाली, राजस्थान नवांकुर साहित्य सम्मान २०२६, विचार शिरोमणि सम्मान २०२६, विमला ज्ञान साहित्य मंच, गोण्डा उत्तरप्रदेश से तिरंगा साहित्य सम्मान
सृजन : मुख्यतः हिंदी एवं राजस्थानी (मेवाड़ी) भाषा में कविता, गीत, कहानी तथा लोकगीतों का सृजन।
विशेष अभिरुचि : गायन कला
काव्य गोष्ठी : राज श्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी, छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन एवं राष्ट्रीय काव्य गोष्ठियों में आमंत्रित कवयित्री के रूप में अपनी स्वरचित रचनाओं का प्रभावशाली पाठ कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्यिक उपस्थिति दर्ज कराई।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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