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पहले पाने का जुनून-सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)

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आईफ़ोन १८ लॉन्च हो चुका है। अब प्रतीक्षा है कि भारत में उसे सबसे पहले किसने खरीदा। पिछली बार आईफ़ोन १७ के आगमन पर अंकुश गोयल जी ने रातभर स्टोर के बाहर डेरा डालकर यह गौरव अर्जित किया था। देश को उन पर एवरेस्ट विजय जैसा गर्व हुआ होगा। आखिर फोन खरीदना साधारण काम हो सकता है, लेकिन सबसे पहले खरीदना देश की शान में उसकी सहभागिता। पश्चिम को यह बेचैनी आईफ़ोन ने सिखाई होगी; हम भारतीय इसे जन्मजात लेकर आते हैं। हमें सबसे पहले पहुँचना, पाना, बताना, बाँटना और लूटना भी है। “सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी” गीत की पंक्ति नहीं, जीवन- पद्धति और जन्मसिद्ध अ-धिक्कार है।
सड़क पर हमारी प्रतिभा दिखाई देती है। एम्बुलेंस सायरन बजाती निकले तो बाइकवीर इसे रास्ता देने का संकेत नहीं, दौड़ की चुनौती समझता है। वह घायल से पहले अस्पताल पहुँचना चाहता है; संभव हुआ तो उससे पहले यमलोक भी। लाल बत्ती उसके लिए आदेश नहीं, बुद्धि-परीक्षण है, देखें ट्रैफिक पुलिस और नियमों के बीच से कैसे निकला जा सकता है। जाम में उसका हाथ एक्सेलरेटर पर वैसा फड़कता है जैसे चेतक की लगाम पर महाराणा प्रताप का। हॉर्न उसका रणघोष है। सामने जगह न हो, वह हॉर्न से जगह पैदा करने में विश्वास रखता है। चिंता रहती है, देश अगली सदी में कहीं उससे पहले न पहुँच जाए। कारवीर भी पीछे नहीं। गति बढ़ाकर वह आगे निकलने को तत्पर रहता है। सामने वाला रास्ता न दे तो शीशा, बोनट और फुटपाथ,सभी वैकल्पिक मार्ग हैं। मंजिल कहाँ है, यह गौण है; बस ‘कोई उससे आगे नहीं निकल जाए‘ ये उसका ध्येय वाक्य है। जहाँ कुछ मुफ्त बँट रहा हो, वहाँ हमारी गति अलौकिक हो जाती है। लंगर, प्रसाद, रेवड़ी, ज्ञान, तमाशा या झगड़ा, हम प्रथम पंक्ति में मिलेंगे। मुफ्त में ज़हर बँट रहा हो तो भी चिंता ज़हर की नहीं होगी; डर यह रहेगा कि हमारे पहुँचने से पहले समाप्त न हो जाए। अपने ओपीडी में मैं इस राष्ट्रीय चरित्र का क्लिनिकल परीक्षण करता हूँ। दो महीने पुराना फ्रैक्चर पहले दिखने के चक्कर में “अभी-अभी” टूटा बताया जाता है। कोई नेताजी का फोन लगवाता है, कोई डॉक्टर का भाई, भतीजा या रिश्तेदार बन जाता है। बीमारी प्रतीक्षा कर सकती है, नंबर नहीं।

एक दिन वेटिंग रूम में एक मरीज बैठा था। रिसेप्शनिस्ट ने कहा, “आप अकेले हैं, दिखा लीजिए।” वह बोला, “थोड़ी देर और बैठता हूँ।” जब तक दूसरा मरीज आएगा नहीं, वह प्रमाणित कैसे करेगा कि डॉक्टर को सबसे पहले उसी ने दिखाया? विजय के लिए प्रतिद्वंद्वी भी तो चाहिए। रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन रुकने से पहले हमारा उतरना और चढ़ना शुरू हो जाता है। भीतर वाला बाहर आने को बेचैन, बाहर वाला भीतर जाने को आतुर; दरवाजे पर दोनों पहले मैं- पहले मैं की ‘तू-तू मैं-मैं’ में भिड़ते हैं। कभी जेब कटती है, कभी कुर्ता फटता है, कभी सामान छूटता है और कभी बच्चा; मगर उपलब्धि अक्षुण्ण रहती है, हम धक्का सबसे पहले खा चुके होते हैं। हवाई यात्रा में भी हम बोर्डिंग से घंटाभर पहले पंक्ति बना लेते हैं, मानो विमान हमारे बिना चोरी से उड़ जाएगा। उतरते समय सीट-बेल्ट का संकेत बंद होते ही पूरा केबिन खड़ा हो जाता है। फिर गर्दन झुकाकर दस मिनट खड़े रहना मंजूर है, क्योंकि बैठे रह गए तो एयरहोस्टेस की “बाय-बाय” किसी और को पहले मिल जाएगी। टिकट का पूरा मूल्य इसी विदाई में वसूलना है।
बैंक, राशन, वॉशरूम, आरक्षण-खिड़की और मंदिर, हर जगह हमारी आत्मा कतार से आगे विचरण करती है। मंदिर में भगवान सर्वव्यापी हो सकते हैं, लेकिन दर्शन तभी सफल हैं जब बैरिकेड लाँघकर दूसरों से पहले किए जाएँ। वीआईपी दर्शन शायद भक्त भगवान् को अपने दर्शन पहले करवाकर अपनी स्वर्ग की सीट सुरक्षित करना चाहता है। यहाँ तक कि शवयात्रा में भी कुछ लोग अर्थी से आगे निकलने को बेचैन दिखते हैं। मृतक बोल पाता तो शायद उठकर कहता, “भाई, तुझे इतनी जल्दी है तो तू ही यहाँ लेट जा; मैं अगली बारी देख लूँगा।” संभव है सज्जन अग्रिम बुकिंग, लकड़ियों पर छूट या मोक्ष में शुरुआती नंबर की संभावना तलाश रहे हों। दरअसल दूसरे नंबर पर आते ही हमें फोमो होने लगता है। हम भूल जाते हैं कि हर आगे निकलना प्रगति नहीं होता। कभी रास्ता देना, बारी की प्रतीक्षा करना और एम्बुलेंस को पहले जाने देना सभ्यता है। मगर यह बात आईफ़ोन १८ की कतार में कौन समझाए? वहाँ देश फिर तैयार खड़ा है, सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी, यह बताने के लिए।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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