
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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दिवाली का अर्थ सबके लिए अलग-अलग है। सरकारी कर्मचारियों के लिए बोनस, बच्चों के लिए पटाखे, व्यापारियों के लिए साल भर का जमा माल निकालने का अवसर और गृहिणियों के लिए, सफाई। हमारे लिए दिवाली का अर्थ है, अपने ही घर में अपने अस्तित्व की समीक्षा! सफाई का कार्यक्रम महीनों पहले बन जाता है। काम का बँटवारा होता है, हिदायतें जारी होती हैं और हमारे शौक जाँच आयोग के सामने पेश कर दिए जाते हैं।
सबसे पहले फोटोग्राफी के उपकरण निकलते हैं। कैमरे, लेंस, ट्राइपॉड,जिन्हें कभी बड़े अरमानों से खरीदा था।
“कब तक सँभालकर रखोगे यह कबाड़?”
“इस बार जरूर इस्तेमाल करूँगा। बस, रहने दो।”
यह आश्वासन हम पिछले कई वर्षों से दे रहे हैं। अब तो कैमरे भी हमारी बात पर विश्वास नहीं करते होंगे। हमने कई बार सफाई में हाथ बँटाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन हर बार खारिज हो गया। “रहने दो! तुम सफाई नहीं, लीपापोती करते हो। अपना अटाला तो सँभलता नहीं!” कबाड़ी वाला भी कबाड़ जाँच-परखकर खरीदता है। हमारे शौक उससे भी कम सम्मान के पात्र हैं। इधर हमें किताबें पढ़ने का नया शौक चढ़ा है। इतनी पुस्तकें मँगा लीं कि अब उन्हें पढ़ने से बड़ी समस्या रखने की है। घर में हमारे नाम बी.पी.एल. कोटे की आधी अलमारी आवंटित है। उसमें पहले से फोटोग्राफी के उपकरण निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बाकी अलमारियाँ साड़ियों से भरी हैं। साड़ियों का साम्राज्य स्थायी है, हमारे शौक अस्थायी घुसपैठिए!
दिवाली की सफाई में हमने हिम्मत करके किताबों का ढेर श्रीमती जी के सामने प्रस्तुत किया।
“अब इन्हें कहाँ रखोगे?” हमने खुशामद की अंतिम बची पूँजी लगाई। “जितनी जगह तुम्हारे दिल में हमारे लिए है, उसी में थोड़ा-सा कोना किताबों को दे दो। घर में जगह अपने आप निकल आएगी।” “दिल पर बोझ ना बढाओ । घर में जगह बताओ! वैसे भी तुम्हारे पिछले शौकों का हाल देख चुकी हूँ। अगले साल तक यह शौक भी बचा रहेगा, क्या भरोसा!” हमें लगा, श्रीमती जी किताबों के लिए जगह नहीं, अगले साल की दिवाली का इंतजार कर रही हैं। अंततः हमने पुस्तकें लाल कपड़े में बाँधीं, रस्सी से गाँठ लगाई और पांडुलिपि जैसा स्वरूप दे दिया। संभव है, प्राचीन साहित्यकारों की पत्नियाँ भी इसी समस्या से जूझी हों। उन्होंने भी किताबों की गठरी बाँधवाई होगी। शायद इसी गाँठ से “ग्रंथ” शब्द बना हो! हमारा यह भाषावैज्ञानिक अनुसंधान फिलहाल घरेलू अनुभव पर आधारित है। फिर भी हमने एक विनम्र प्रस्ताव रखा।
“एक शीशे वाली अलमारी बनवा दो। किताबें सजी रहेंगी। सामने कुर्सी-मेज लगाकर फोटो खिंचवाएँगे। साहित्यकार होने का प्रभाव पड़ेगा। संभव है, दो-चार पुरस्कार भी मिल जाएँ!” उत्तर आने से पहले ही मेडिकल जर्नल, देसी नुस्खों की पुस्तकें, हास्य उपन्यास, भविष्यफल, जंतर-मंतर, रसीद बुकें और पति-पत्नी के मधुर संबंधों के नुस्खे भी हमारे साहित्यिक ढेर में शामिल कर दिए गए।
“इन्हें भी साथ बाँध दूँ?” हम साहित्य के इस साम्यवादी आंदोलन को देखते रह गए। वर्षों की साहित्यिक पूँजी एक ही गठरी में समाहित हो रही थी। चिकित्सा, ज्योतिष, हास्य और गृहस्थी,सब बराबर! विशेषकर पति-पत्नी के मधुर संबंधों वाली पुस्तक देखकर अफसोस हुआ। काश, समय रहते पढ़ ली होती! अपनी व्यथा साझा करने पड़ोसी मित्र के घर पहुँचे। दरवाजा भाभी जी ने खोला।
“उस्ताद कहाँ हैं?”
“अंदर आ जाइए।”
कमरे में मित्र दिखाई नहीं दिए। ऊपर नजर उठाई तो देखा,एक ऊँचे ताक पर खड़े थे। हाथ में झाड़ू, कपड़ों पर धूल, आँखों में नमी और चेहरे पर ऐसी उदासी, मानो गृहस्थी ने आजीवन कारावास सुना दिया हो। हम बिना कुछ कहे लौट आए। सोचते रहे, दिवाली अपने साथ सबके लिए कुछ न कुछ दुःख लाती है। कोई सफाई में हाथ बँटाने से दुखी है, कोई हाथ नहीं बँटाने दिए जाने से। हमारी त्रासदी यह है कि घर में हमारे शौक भी सुरक्षित नहीं और सफाई में हमारा सहयोग भी स्वीकार्य नहीं! खैर, खाकसार और कर भी क्या सकता है! अपनी व्यथा दो शेरों में समेट रहा हूँ। पसंद आएँ तो इन्हें ग़ालिब का समझकर थोड़ी इज्जत दे दीजिएगा,
इन्हें सँभालने की कोशिश में उम्र निकल गई,
बिखरी पड़ी थी जिंदगी कुछ किताबों की तरह।
शौक़-ए-परवाज़ था, मगर अपने पर नहीं थे,
जो ख़्वाब सँजोए बैठे थे, ज़मीनी हक़ीक़त नहीं थे।
फिलहाल किताबों की गठरी सुरक्षित है।
अगले साल का कुछ पता नहीं।
दिवाली पर घर की सफाई होती है,
हमारे यहाँ शौकों की छँटाई!
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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