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श्याम बाँसुरी

मंजू लोढ़ा
परेल मुंबई (महाराष्ट्र)

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मुझे बाँसुरी बहुत पसंद है,
यह मेरे श्याम का
मनपसंद वाद्य है,
जब भी बाँसुरी सुनती हूँ
ब्रजधाम पहुँच जाती हूँ,
ऐसा लगता है श्रीकृष्ण
कहीं आसपास है,
कानों में उनकी
बासुंरी की मीठी-मधुर
तान सुनाई देने लगती है,
श्याम सलोने से एक अदभूत
मुलाकात हो जाती है।
आँखो के समक्ष उनका
दैदीप्यमान-सुंदर-सलोना
मुखडा़ दिखाई देने लगता है,
कंदब के पेड़ तले
पीताम्बर धारे, मोर पंख सजाये,
वैजयंती को गले से लगाये,
होठों पर बाँसुरी
साथ में श्री राधारानी,
चारों तरफ गोप गोपियाँ,
ज्यों ही बाँसुरी बजने लगती,
उसकी तान में खोकर,
सभी सुध बुध बिखराकर
झुमने लगते हैं,
यमुना का पानी
हिलोंरे लेने लगता हैं,
पशु-पक्षी भी
नृत्य करने लगते हैं,
फुल-हवाएं सारा संसार
स्तंभित हो जाता हैं,
यह दृश्य आंखों के समक्ष
साकार देखकर,
मन अंदर से
प्रफुल्लित हो उठता है,
एक अजीब से स्वर्गगिक
आनंद में डूबने लगता है,
श्रीकृष्ण के चरणों में
नतमस्तक हो जाता है।
श्याम की बाँसुरी
संदेश दे जाती है,
बिन बुलाये मत बोलो,
जब भी बोलो मीठा बोलो,
हृदय में कोई गांठ मत रखों,
किसी से कोई बैर-भाव मत रखों,
खुश रहों-आनंद बांटो-आनंदित रहों।
बोलो श्रीकृष्ण कन्हाई, श्याम सलोने की जय।

परिचय :- मंजू लोढ़ा
निवासी : परेल मुंबई (महाराष्ट्र)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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