माँ की याद
कुंदन पांडेय
रीवा (मध्य प्रदेश)
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छोटा घर था पर हम खुश थे
और संग सभी का साथ रहा।
घर बढ़ा हुआ तुम चली गई
कोई भी ना अब खास रहा।
सब छूट गया अब कुछ न
बचा सर पर तेरा ना हाथ रहा।
तब दिन थे हर क्षण मस्ती के
हम कितना मौज उड़ाते थे।
तुम भूल गई क्या हे जननी
तुझ संग ही हम मुस्काते थे।
तेरे जाने से ओ माता
सारी दुनिया बीरानी है।
हंसने की कोई वजह नहीं
अब बस आंखों में पानी है।
मां तुम्हें पता है! अब पापा
होली पर रंग ना लाते हैं।
ना ही अब रावण जलता है
न दीपावली मनाते हैं।
ना ही बटते पेडे़ घर-घर
ना खील बताशे आते हैं।
अब साथ नहीं सब बसते हैं
सूने में ही सब हंसते हैं।
बस काया है मन और कहीं
सांसो का ना अब बास रहा।
जीवन की सारी अभिलाषा
अंदर ही अंदर ठिठक गई।
तेरी बेटी तुझ बिन ऐ माँ
चुपचाप खड़ी बस सिसक रई।
परिचय :- कुंदन पांडेय
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