आई शिशिर ऋतु
सरला मेहता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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जब शरद ने ली विदाई
मस्त शिशिर ऋतु आई
पर्णो ने भी ली अंगड़ाई
शाखाएँ देखो हैं इतराई
ठिठुरन अंग अंग कँपाएँ
ऊनी मफ़लर, शाल भाए
गुनगुनी धूप में हैं सुस्ताए
या रजाई में दुबक जाएँ
दिन छोटे, लंबी होती रात
ठंडी से कटकटाते हैं दाँत
आ जाती है मकरसंक्रांत
तिल गुड़ खाने की सौगात
गरम चाय व गाजर हलवा
केसर दूध, कॉफी व कहवा
गोभी, मटर, टमाटर जलवा
गुड़ की राब, पीता कलवा
दो मासों की होती बहार
शिशिर है जाने को तैयार
बुलाती रंग बिरंगी फ़ुहार
बसंत बहना! खुले हैं द्वार
परिचय : सरला मेहता
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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