प्यासी धरती
मनोरमा पंत
महू जिला इंदौर म.प्र.
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क्यों कर रहे हो शोर कि
घरती प्यासी है,
पृथ्वी दिवस तो मनाते हो
धरती के गुण गाते हो
कविताएँ रचते हो
गीत गाते हो,
बस करो यह ढोंग
धरती प्यासी ही नहीं
मरणासन्न है असहाय है
मूर्ख मानव !
जान कर भी अनजान है
क्यों बस्ती दर बस्ती
बसा रहा हैं,
खेत खलियान मिटा
रहा है,
आम पीपल रो रहे हैं
यूकलिप्टस पानी लील रहे हैं
हो रहा आयात दलहनो का
शोर मचा है नकदी फसलों का
बहती नदियाँ सूख रही हैं,
ताल तलैये खो चुके हैं
नदियों को क्यों बांध रहे हो
उनका कलेजा छीज रहे हो
अब भी पूछ रहे हो
धरती है क्यों प्यासी ?
जाओ, जंगलों को ढूँढो
डूबे गांवो को ढूँढो
ढूँढो कीट पंतगो को
ढूँढो खोये हुये फूलों को
धरती तृप्त हो जावेगी
प्यास उसकी बुझ जावेगी
परिचय :- श्रीमती मनोरमा पंत
सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्य...

























