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साथ
कविता

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संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तेरा मेरा साथ रहे मेरा तेरा साथ रहे। दिलकी फर्याद रहे तेरे दीदार मिले। मिलने मिलाना का दौर चलता रहे। सुखदुख के साथी बने साथ जो तेरा रहे।। तेरा मेरा साथ रहे..। जब से तुम मिलो हो तकदीर गई है बदल। मेरे जीवन की तुम अब एक तस्वीर हो। इसलिए तो मैं हूँ तेरा दिवाना। अब तुम ही मेरी एक पहचान हो।। तेरा मेरा साथ रहे...।। करता हूँ ईश्वर से रोज मैं प्रार्थना। बना रहे जीवन भर अपना ये प्यारा रिश्ता। अब तुम ही हो मेरी जिंदगी की डोर। चल रही है साँसे अब तेरे साथ रह कर।। तेरा मेरा साथ रहे मेरा तेरा साथ रहे।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं...
हे माँ तु शारदे
कविता

हे माँ तु शारदे

गुरुदीन वर्मा "आज़ाद" बारां (राजस्थान) ******************** हे माँ, ओ माँ, हे मॉं तु शारदे। जीवन का मिटा तु अंधेरा। दे दे हमको नया तु सवेरा।। तुमसे करते हैं विनती यह हम। कर दे हम पर तू यह उपकार।। हे मॉं, ओ माँ, हे मॉं शारदे ...।। सुषिर स्वर मुखरित वीणा से, सुमधुर हो जीवन संगीत। शोभित निर्मल नीरज की सुरभि से, जीवन हो महकित।। तेरी पूजा करें हम रोज, दे दे जीने का हमको आधार। हे माँ, ओ माँ, हे मॉं शारदे ...।। दृग रश्मि आलोक से हो, जीवन में सुप्रभात। नव आशा से सुपथ पर, यह जीवन हो सुफलित।। करें अर्पण सुमन तुझ पर, दे दे हमको तु ऐसा संसार। हे माँ, ओ माँ, हे माँ शारदे ...।। प्राचीन स्वर्ण सुसज्जित वसुंधरा, नव भारत में मण्डित हो। सुसभ्य सुभाषित नव कृति से, सुसंस्कृत जीवन निर्मित हो।। तुझसे करें यही मनुहार, दे दे हमको तु ऐसे अधिकार। हे माँ, ओ माँ, हे माँ शारदे ...।।...
वसंतोत्सव
कविता

वसंतोत्सव

संजू "गौरीश" पाठक इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आया वसंत, मन आल्हादित। गूँजे भँवरे, फूली सरसों। वृक्षों पर अमराई छाई, नव सृजन हुआ सृष्टि में ज्यों।। प्राकट्य दिवस माँ शारदे का! शत-शत वंदन और अभिनंदन। विद्या, बुद्धि,सुर, लय दो माँ, करती हूं पुष्प गुच्छ अर्पण।। मंडराती तितली फूलों पर। सुंदर परिदृश्य उभर जाता। देता संदेशा है वसंत, उल्लसित काम फिर हो जाता।। गीता में कहते वासुदेव, ऋतुओं का राजा मैं वसंत। आप्लावित रस श्रंगार युक्त, प्रमुदित होता जन-जन अनंत।। ढक जल को कमल सरोवर में, देते संदेश मनुज को यों। खुलकर जीवन को जियो सदा, दारुण दुख में अब डूबे क्यों? खग कलरव चहुँ दिशि गूँज रहा, वसुधा ने नव श्रृंगार किया। वरदान सदृश है ऋतु वसंत, नव ऊर्जा का संचार किया।। परिचय :- संजू "गौरीश" पाठक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह...
साहित्य की सबसे बड़ी धरोहर वसन्त ऋतु
आलेख

साहित्य की सबसे बड़ी धरोहर वसन्त ऋतु

अशोक पटेल "आशु" धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** "जीवन में उत्साह का प्रतीक- वैदिक साहित्य से लेकर उपनिषद वेद पुराण और महाभारत,रामायण सहित कालिदास और हिंदी साहित्य के इतिहास पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो हम यह पाते हैं कि इन सभी कालों के कवियों ने ऋतुओं पर एक से बढ़कर एक सुंदर साहित्य सृजन किया है। पर वसन्त ऋतु के सौंदय पर जो वर्णन हुआ है,वह कहीं और अन्यत्र देखने को नही मिलता। विशेष करके कामदेव की ऋतुराज वसन्त पर जो लेखनी चली है वह साहित्य के इतिहास की अनमोल धरोहर मानी जाती है। जिसने हिंदी को उपकृत ही नही किया बल्कि इसे पुष्पित पल्लवित और सुरभित भी किया है। इस ऋतु में प्रकृति सोलह सृंगार से युक्त पलास महुए आम की सौरभता मदमस्त कराती सुरभित सुंदरता। फागुन के फाग की मस्ती और रंगीली वातावरण को उत्साह से भर देती है। इस वसन्त का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस दिन विद्या दायिनी माँ...
प्रकृति का श्रृंगार बसंत
छंद

प्रकृति का श्रृंगार बसंत

रेखा कापसे "होशंगाबादी" होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) ******************** रोला छंद आया सुखद बसंत, प्रीत रम हृदय जगाए। वसुधा रति श्रृंगार, देख मन अनुपम भाए।। धर पीताम्बर वस्त्र, भगवती ध्यान लगाओ। धन वैभव का साज, सौर्य गुरु ग्रह से पाओ।। बिखरे पतझड़ पात, वात झोंका अलसाये। रम अनुपम मधुमास, अधर मधु मनन लुभाये।। अरुणोदय की थाप, रश्मि की तपन प्रवाहित। नव पल्लव सौगात, कुसुम मकरंद सुवासित।। रक्तिम टेशू पुष्प, बौर अमुआ पर झूले। मीठी कोयल कूक, खेत में सरसो फूले।। प्रेमिल अंत अधीर, मिलन प्रियतम हिय प्यासा। विरह वेदना पीर, मिटे अब दुखद कुहासा।। फीकी पड़ती धुंध, निशा का ठौर सिकुड़ता। रवि किरणों का शौर्य, उत्तरायण तट पड़ता।। यौवन पाते अन्न, कृषक अंतस हर्षाता। प्यारा सुखद बसंत, सभी के मन को भाता।। परिचय :- रेखा कापसे "होशंगाबादी" निवासी - होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) घोषणा प...
बसंत ….नहीं आया
कविता

बसंत ….नहीं आया

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** बसंत ....नहीं आया। इस बार बसंत नहीं आया। धूमिल-धूमिल धरा पर छाया। बादल बरसे निसदिन-निसदिन. भरे हृदय की व्यथा कोई समझ ना पाया। इस बार बसंत नहीं आया। मौन प्रकृति व्यथा संग मरण सन थी। कैसे गुंजन करते भंवरे बागों में, जब कोई पुष्प ही खिल ना पाया। इस बार बसंत नहीं आया। जीवन की उमंगे उम्मीदें पिघली पल-पल। जीवन को एक सजा-सा बिताया। उम्मीदों-आशाओं से खिलते हैं उपवन। ना चांद चमका ना कोई तारा आया। धरती सूखा ना पाई अपनी सीलन को। इस बार पेड़ों का पत्ता ना कोई मुस्कुराया। इस बार बसंत नहीं आया। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि रा...
आ गए ऋतुराज बसंत
कविता

आ गए ऋतुराज बसंत

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** आ गए ऋतुराज बसंत , बसंत पंचमी मनाते हैं | हटा गए शिशिरता बसंत, बसंत पंचमी मनाते हैं || स्वागत में ऋतुराज बसंत के , पूजन शारदे का हम करते हैं | लेकर ज्ञानदायिनी का आशीष , कल्याण जीवन का हम करते हैं || अस्थि कँपाकर चले गए हैं , अब शिशिर का हो गया है अंत | शुभागमन तो कुसुमाकर का है, अब आ गए ऋतुराज बसंत || आलिंगन करेंगे खग-मृग भी , स्वागत करेंगे ऋतुराज तुम्हारा | मन मंदिर में एक आस जगी भी, स्वागत करेंगे हमराज तुम्हारा || नवकिसलय तरुवर लेकर , हवा बसंती जब लहराते हैं | कुसुम कलियाँ विकसित खुलकर, उन्मत्त भ्रमर तब मंडराते हैं || हो जाती शस्य श्यामला धरा , वन-उपवन सब खिल जाते हैं | ऋतुराज वसंत के आगमन पर, तन मन सबके खिल जाते हैं || तन मन सबके खिल जाते हैं, तन मन सबके .................. परिचय :- सुरेश ...
संवेदना
लघुकथा

संवेदना

माधवी तारे (लन्दन से) इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ट्रिंग-ट्रिंगsss मोबाईल की रिंगटोन बज रही थी। रखमा की राह देखते-देखते घर के आवश्यक कार्य सम्पन्न कर प्रतिभा जरा-सी लेटी ही थी। ढेरे सारे काम अभी अधूरे थी। 'बाद में देखूँगी'- कहकर आराम करने के मूड में थी वह, पर दीर्घ काल तक बजती रिंगटोन ने हैरान कर दिया। फोन उठाना ही पड़ा। हैलो !! कौन बोल रहा है? आवाज अपरिचित-सी लग रही थी। मैं बोल रही हूँ मैडम! रखमा बाई की बड़ी बेटी हूँ। क्या कहना है? मॅडम जी! आज सवेरे मम्मी फिसलकर गिर गई है। उसके पैर में फ्रैक्चर हुआ है। उसे मैं सरकारी अस्पताल में प्लास्टर लगाने के लिये ले आयी हूँ। आधी-अधूरी बेहोशी की अवस्था में उन्होंने मुझे सिर्फ आपके घर में यह बात सूचित करने को कहा है। अरे, भगवान! ये कैसी आफ़त आन पड़ी है? अब क्या करूं? काहे का आराम? उठ जाओ, अधूरे सारे काम मुझे ही पूर्ण करने हैं। घर क...
घर वापसी
लघुकथा

घर वापसी

मनोरमा पंत महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** "रमाकांत जी ! यहाँ से जाने के बाद हमें भूल तो नहीं जाओगे"? अरे ! कैसी बात करते हैं आप? बीच बीच में आप सब से मिलने आता रहूँगा। आज पूरे पाँच वर्षों बाद रमाकांत जी का पोता उन्हें लेने आया है, एक-एक दिन गिन रहे थे आखिर वह दिन आ ही गया। संगी-साथी छेड़ते रहते थे "अरे यार ! स्वीकार कर लो वृद्धाश्रम को, यही हम लोगों का घर है।" पर वे कहते रहे- न वह आवेगा जरूर। मृदुभाषी रमाकांत जी ने सबको बतलाया था कि बहू बेटा सड़क दुर्घटना में मारे गये, पोता नवोदय विद्यालय के होस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा है। उसको मैंने समझाया था- "कि तू पढाई पूरी कर, कुछ बन तब तक मैं वृद्धाश्रम में रह लूँगा।" आज वह एक अच्छी नौकरी कर रहा है, उसने मुझसे वायदा किया था कि नौकरी लगते ही वह मुझे लेने आ जाऐगा, और वह आ गया" कहते कहते खुशी से रमाकांत जी का गला रूद्...
कूक रही कोयलियाँ
धनाक्षरी

कूक रही कोयलियाँ

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनहरण घनाक्षरी कूक रही कोयलियाँ ये अम्बुवा की डालियाँ नियति निखर गई बासंती बयार से पीत रंग पसरा है वीतराग छलका है शारदे प्रसन्न हुई वीणा की झंकार से हरियाली देखो छाई मधुमास बेला आई सजनी सँवर गई यौवन के भार से डाल डाल पड़े झूले बालवृंद खूब डोले भोर से साँझ हुई हँसी की फ़ुहार से बिदेस से आया मीत सखियों ने गाए गीत आहट फिज़ा में हुई द्वारे पे दस्तक से किए सौलह सिंगार पीली ओढ़ के चुनर पिया से मिलन गई नैन मुंदे लाज से मेहँदी रचे हैं हाथ सजना है साथ साथ बिखरा गजरा ज़रा सँवार दे प्यार से ऋतुराज आगमन महामारी का नमन धरणी विभोर भई आशा के संचार से परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
आ गया ऋतुराज बसंत
कविता

आ गया ऋतुराज बसंत

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** आ गया ऋतुराज बसंत, मन हो रहा मगन। मनोहर छटा बिखेरता मदमस्त गगन, खिल रहा सूर्यरश्मियों से धरा का मुखमंडल समस्त भूमण्डल बन रहा उत्तम उपवन। पुहुप रस पी-पीकर मधुकर कर रहे गुंजन, बन रहा प्रकृति में सहज संतुलन। आ गया ऋतुराज बसंत मन हो रहा मगन। धारण किया धरा ने पीत वसन, प्रकृति ने किया श्रंगार सहज। आज सज रही ऋतुराज की दुल्हन, मानो कामदेव-रति का हो रहा मंगल-मिलन। आ गया ऋतुराज बसंत, मन हो रहा मगन। परिचय :-  प्रभात कुमार "प्रभात" निवासी : हापुड़, (उत्तर प्रदेश) भारत शिक्षा : एम.काम., एम.ए. राजनीति शास्त्र बी.एड. सम्प्रति : वाणिज्य प्रवक्ता टैगोर शिक्षा सदन इंटर कालेज हापुड़ विशेष रुचि : कविता, गीत व लघुकथा (सृजन) लेखन, समय-समय पर समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। घोषणा पत्र : मैं यह प्...
हे ! वाग्वादिनी माँ
कविता

हे ! वाग्वादिनी माँ

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हे ! वाग्वादिनी माँ हे ! वाग्वादिनी माँ तू हमें ज्ञान दें तू हमें ध्यान दें। भटक रहें हम जीवन पथ पर आकर हमें तू अब थाम लें। तू ब्राम्ह की माया तू ही महामाया हम फंसे मोहजाल आकर हमें तू अब निकाल लें। तू ज्ञान की मुद्रा तू ध्यान की मुद्रा हम गिरे अज्ञान में आकर हमें तू अब ज्ञान दें। तू सुर की वन्दिता तू ही सुरवासिनी हम हो रहें बे-सुरे आकर हमें तू सुर का ज्ञान दें। तू विद्या की धात्री तू ही विद्युन्माला हम धंस रहें अविद्या में आकर हमें तू विद्या का वरदान दें हे ! वाग्वादिनी माँ हे ! वाग्वादिनी माँ तू हमें ज्ञान दें तू हमे ध्यान दें। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
राजनीति करना चाहता हूँ
हास्य

राजनीति करना चाहता हूँ

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं भी सोचता हूँ कि राजनीति में कूद पड़़ूं, इस हमाम में सब नंगे मैं ही तन ढाक कर क्या करूँ? तंग आ गया हूँ वोट दे देकर क्यों न इस बार पहले टिकट और फिर वोट की मांग करूँ। राज की बात आपको बताता हूँ मैं भी खूब धन कमाना चाहता हूँ अब ईमानदारी से भला दाल रोटी तो चल ही नहीं सकती बस एक बार बड़ा हाथ मारना चाहता हूँ। आलीशान बंगला महंगी गाड़ियों के आजकल सपने बहुत आते हैं, बस कैसे भी ये सपने अपने पूरे कराना चाहता हूँ, अंदर की बात है किसी से मत कहना हवाला से धन भी कमाना चाहता हूँ, बस एक बार मौका भर देकर तो देखिए स्विस बैंक में अपना भी खाता खुल जाये रुपयों से बैंक खाता भरना चाहता हूँ। आप सबने कितनों को मौका दिया एक बार मुझे भी देंगें तो पहाड़ नहीं टूट जायेगा, मैंनें तो अपना राज आपको बता ही दिया बस एक...
वैभव तेरा चहुँ ओर रहे
कविता

वैभव तेरा चहुँ ओर रहे

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी ******************** माता लक्ष्मी दारिद्र हरो, मम जीवन में उल्लास भरो मिट जाए दुख पीड़ा सारी, वर मुद्रा में निज हाथ धरो। हे विष्णु प्रिया लक्ष्मी माता, तुमसे है दुनियाँ का नाता। जिस पर ना कृपा आपकी हो, जीवन भी उसको भरमाता। हे कमला माता कल्याणी, जीते अभाव में जो प्राणी धनवर्षा उन पर माँ कर दो, खाली झोली उनकी भर दो। तुम उनका भाग जगा दो माँ, सारा दुख दर्द मिटा दो माँ उनके जीवन में शुचिता कर, सारा संताप हटा दो माँ। हे सिंधु सुता, धन की देवी, धनधान्य युक्त जीवन कर दो निर्धन के घर धन की वर्षा, शरणागत को सुख का वर दो जीवन में कर दो खुशहाली, सज्जित हो पूजा की थाली जगमग हो सबके जीवन में, मिट जाय रात सब की काली। खुशहाली चारों ओर रहे, दारिद्र ताप ना कोई सहे हर घर में रोशन हो चिराग, वैभव तेरा चहुँ ओर रहे। परिचय :- अंजनी क...
परीक्षा
कविता, बाल कविताएं

परीक्षा

केदार प्रसाद चौहान गुरान (सांवेर) इंदौर ****************** वैसे तो हमारा जीवन भी एक परीक्षा है जो कदम कदम पर हम अनुभव करते हैं यह भी एक शिक्षा है जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए हम रात दिन पुस्तक पढ़ते हैं उम्मीदों की सीढ़ियां चुनकर प्रतिदिन आगे बढ़ते हैं हमें जो मुकाम हासिल करना है उसके लिए करते हैं मेहनत और सपने बूनते है बच्चे अपनी पसंद का सब्जेक्ट चुनते हैं मन लगाकर पढ़ाई करने वाले बच्चे आसानी से सफल हो जाते हैं अपनी मंजिल पर पहुंच जाते हैं फिर मनचाहा फल पाते हैं पेपर हो चाहे किसी भी सब्जेक्ट का उससे नहीं घबराते हैं जो बच्चे टेंशन नहीं लेते हैं परीक्षा का वह बहुत ही आसानी से सफल हो जाते हैं मेरी सलाह है आपसे परीक्षा से कभी नहीं घबराना चाहिए बनाकर टाइम टेबल पढ़ाई में जुट जाना चाहिए समय पर खाना, समय पर पढ़ना समय पर सोना और ...
शाकाहार – सर्वोत्तम
आलेख

शाकाहार – सर्वोत्तम

मयंक कुमार जैन अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) ******************** आम के फल का स्वाद नहीं ले सकता। इसी प्रकार बीज रूप में जैसा आहार लिया जाता है, वैसे ही भाव-विचार और आचार होते हैं। आहार दो प्रकार के है- शाकाहार और मांसाहार। शाकाहार अहिंसामूलक है, तो मांसाहार हिंसामूलक। शाकाहार स्वास्थ्यप्रद है, तो मांसाहार रोगों का घर, शाकाहार मानवीय और सौन्दर्यपरक आहार है तो मांसाहार आसुरी और विकृतिपरक, in ७७ सात्विक है तो मांसाहार कालकूटविष, शाकाहार प्रकाश की ओर ले जाता है तो की गौरव गरिमा है। शाकाहार ही मानव के अन्दर संतोष, सादगी, सदाचार, स्नेह, सहानुभूति और समरसता जैसे चारित्रिक गुणों का विकास कर सकता है, मांसाहार कदापि नहीं। शाकाहारी का मन जितना संवेदनशील होता है मांसाहारी का नहीं हो सकता। शाकाहार का तात्पर्य है चारों ओर स्नेह और वि वास का वातावरण बनाकर प्रकृति के कण-कण को सह अस्तित्व की भावना स...
एक दिए ने धूम मचा दी
कविता

एक दिए ने धूम मचा दी

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** विकट अँधेरे लगे हुए थे, रातों के जयकारे में। एक दिए ने धूम मचा दी, अँधियारे गलियारे में।। तुम दिनकर के वंशज होकर, असमंजस में जीते‌ थे। देख अँधेरोँ की ताकत को, घूँट खून का पीते थे।। तुमको शक था जिस दीपक पर, क्या इकलौता कर लेगा। अँधियारों से डरकर, चुपके से समझौता कर लेगा।। उसी दीप ने दिखा दिया दम, तम बदला उजियारे में। एक दिए ने धूम मचा दी, अँधियारे गलियारे में।।१।। अपने आप नहीं मिटते तम, इन्हें मिटाना पड़ता है। खुद को दीप बनाकर खुद का, दीप जलाना पड़ता है।। तब ही कान्ति केश तक छाती, तिमिर तोम हर लेती है। दीपशिखा सूरज बन जाती, ज्ञान व्योम कर देती है।। फिर अन्तर क्या रहा दीप में, तारे और सितारे में। एक दिए ने धूम मचा दी, अँधियारे गलियारे में।।२।। आभा के कारण रवि का तम, दरश नहीं कर पाता ...
बसन्ती बहार
कविता, स्तुति

बसन्ती बहार

रुचिता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आ गया ऋतुराज बसन्त लेकर प्रेम की नई तरंग हर तरफ सुनहरी छटा है बिखरी प्रकृति दुल्हन जैसी है निखरी खेतों में पक गई सरसों की बाली फलों से लद गई अम्बुआ की डाली प्रेम रंग में रंगी है धरती सारी फूलों पर मंडरा रही तितलियाँ प्यारी चल रही शीतल मन्द बयार मतवाली हर तरफ फैली है खुशहाली माँ भगवती भी लेकर अवतार देने आई बुद्धि-विद्या का उपहार करें हम माँ की आराधना बार-बार सब पर हो माँ शारदा की कृपा अपार श्वेताम्बर धारिणी, वीणा वादिनी दे दो माँ मेरे भावों को शब्दों का आकार नित नव रचना का सृजन करू मैं दो मेरी लेखनी को अपना आशीर्वाद परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप ...
ऋतुराज बसंत 
कविता

ऋतुराज बसंत 

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उषा की लालिमा निराली कुंज-कुंज छाई हरियाली लो आ गया ऋतुराज बसंत सखी महक उठे दिग् -दिगंत ठंडी-ठंडी मदमस्त बयार आई लेकर बासंती उपहार शाख-शाख खिले प्रसून हर्षित बेलें करें आलिंगन फैली चहुं ओर मकरंद सुगंध मंडराते-गुनगुनाते भ्रमर वृंद विथियों में फैला वासंती वैभव प्रीतियों में भूला सुधि प्रणीत मन आम्र मंजरी से सजी अमराई देख-देख उनको पिक बौराई प्रकृति पीली-पीली चुनर ओढ़े मन की कोयल कुहू-कुहू बोले जिया मेरा बन बैठा अनुरागी वन-वन डोले जैसे बैरागी मन के आंगन फिर सजी खुशियों की रंगबिरंगी रंगोली ऋतुराज बसंत श्रृंगारित फूलों की डोली अलंकृत बासंती चांद बासंती चांदनी बहका अंबर महकी यामिनी परिचय :- निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वा...
कदम बढ़ा कर देखो
कविता

कदम बढ़ा कर देखो

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** होगा काम नहीं क्यों तुमसे कदम बढ़ा कर देखो साहस को अपनाओ प्यारे सोच बदल कर देखो प्रभु राम गर वन ना जाते कैसे रावण मरता कृष्ण अगर ना बल दिखलाते कंस कहो क्या डरता गांधी जी गर घर में रहते देश स्वतंत्र न होता पराधीनता की जंजीरें अब तक जकड़ा रहता दशरथ मांझी चेनी लेकर अगर न पथ को बनाते गाँव के लोग कहो कैसे सुविधा का लुत्फ़ उठाते इसीलिए कहता हूँ सबसे भाव बदल कर देखो होगा कोई काम नहीं क्यों सोच बदल कर देखो परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.बी.एड. सम्प्रति : एस. बी. आई. से अवकाश प्राप्त प्रकाशन : मेरा भारत कहाँ खो गया (कविता संग्रह), विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार ...
हम बच्चे मन के कच्चे
बाल कविताएं

हम बच्चे मन के कच्चे

प्रमोद गुप्त जहांगीराबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** हरदम बाइक कार चलानी, डांटे अक्षु को उसकी नानी। उछल-कूद व धमा-चौकड़ी करती हो अपनी मनमानी। हम बच्चे मन के कच्चे है- कभी-कभी करते शैतानी । खेल समय पर खेलो भैया डांट पड़े ना तुमको खानी। सही समय पर पढ़ने जाओ भैया आबू और किट्टू रानी। हम खेलेंगे और खूब पढ़ेंगे निश्चित ही मंजिल है पानी। परिचय :- प्रमोद गुप्त निवासी : जहांगीराबाद, बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन : नवम्बर १९८७ में प्रथम बार हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेठ मासिक पत्रिका-"कादम्बिनी" में चार कविताएं- संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाशित हुईं, उसके बाद -वीर अर्जुन, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, युग धर्म, विश्व मानव, स्पूतनिक, मनस्वी वाणी, राष्ट्रीय पहल, राष्ट्रीय नवाचार, कुबेर टाइम्स, मोनो एक्सप्रेस, अमृत महिमा, नव किरण, जर्जर कश्ती, अनुशीलन, मानव ...
नई सदी का बसंत
कविता

नई सदी का बसंत

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नई सदी के प्रथम बसंत कैसे करूं स्वागत तेरा पहले जब तुम आते थे स्वागत अमीर शाखाएं झुकती वंदना सजाते आमृ पणृ पलाश अगन लगाते थे कुंद, कदंब कचनार लजाते चंपा चमेली जहु़ ओर महकते वृक्षवल्ररी यौवन पर होती थी तो पाषाणो में पुष्प थे खिलते। पर वर्तमान में आमृ कुंज में कम बौराऐ आमृ वृक्ष है। नहीं कोयल की कुक कहीं चकवा, चातक, चकोर चोंच भी नहीं मारते पत्तों पर शायद उन्हें विश्वास नहीं वृक्षवल्ल्ररी तनों पर तज, तज कर निड अपने नील गगन में उड़ते हैं सोच यही गगन तले प्राण वायु मिल जावे कहीं।। तुम आए हों हे बसंत स्वागत तुम्हारा करती हूं। पुनः परंपराएं दोहराओ यह इच्छा रखती हूं, अमराई में बौराऐ आमृ वृक्ष और कूकेँ कोयल की कूक केसरिया पीला बाना पहने अमल ताश सरसो फूल चटक, चटक चटके सब कलियां कुंद चांदनी की डाली मोगरा, गुल...
मधुमास
कविता

मधुमास

राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** प्रकृति बसंत बौछार, मधुप गूंजे कलीयन कली रे अली। प्रेम डगर आसान नहीं, श्वेत दंत मुस्कान चली रे अली।। गजगामिनी पदचाप धरे, नेह भरें मादकता चली रे अली। कलीयन सब फूल खिले, गुंजन मिलिंद सब अली रे अली।। सुरभि बयार जोबन सखी, हास करत संचार चली रे अली। कुसुम तारुणाई भयी, मकरंद भरी महक चली रे अली।। यौवन मंजरी अंत चली अफवाह चली अली रे अली। काल के कपाल में, राम नाम सत्य अली रे अली। एही भांति मानव मधुमास, चार चरण जीवन चली रे अली।। प्रकृति बसंत बौछार, मधुप गूंजे कलीयन कली रे अली।। परिचय :-  राम रतन श्रीवास निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़) साहित्य क्षेत्र : कन्नौजिया श्रीवास समाज साहित्यिक मंच छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष सम्मान : कोरबा मितान सम्मान २०२१ (समाजिक चेतना एवं सद्भाव के क्षेत्र में) शिक्षा : हिन्दी साहित्य (स्नातकोत्त...
हम अपना मुकद्दर जो आजमाने लगे
कविता

हम अपना मुकद्दर जो आजमाने लगे

शाहरुख मोईन अररिया बिहार ******************** हम अपना मुकद्दर जो आजमाने लगे, मेरे अजीज हाथों में खंजर उठाने लगे। हवाओं में फैला है जो नफरती ज़हर, जलता देख घर मेरा वो जो मुस्कुराने लगे। खौफ के साए में हर लम्हा है कैद अब, बहसी लोग ख़ुद को जो ख़ुदा बताने लगे। मजबूर, लाचार, ग़रीबों की है किस्मत, त्योंहारों में भी वो जो आंसू बहाने लगे। कुछ बंदिशे हो हवावाजों की जुबां पे, वो पागल ख़ुद को जो ख़ुदा बताने लगे। मयस्सर हो तमाम खुशियां गमखारो को, कुछ बेईमान अब ख़ुद को जो रहनुमा बताने लगे। परिचय :- शाहरुख मोईन निवासी : अररिया बिहार घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकत...
गणतंत्र दिवस
हाइकू

गणतंत्र दिवस

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** भारत देश गणतंत्र दिवस है सभी मनाओ भारत देश गणतंत्र हुआ रे ध्वजा मंगाओ। भारत देश गणतंत्र हुआ रे खुशी मनाओ। भारत देश गणतंत्र हुआ रे ताली बजाओ। भारत देश गणतंत्र हुआ रे लड्डू बटाओ। भारत देश गणतंत्र हुआ रे गीत गाओ रे। परिचय :- डाॅ. कृष्णा जोशी निवासी : इन्दौर (मध्यप्रदेश) रुचि : साहित्यिक, सामाजिक सांस्कृतिक, गतिविधियों में। हिन्द रक्षक एवं अन्य मंचों में सहभागिता। शिक्षा : एम एस सी, (वनस्पति शास्त्र), आई.आई.यू से मानद उपाधि प्राप्त। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ले...