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बाहर फागुन बौराया है
कविता

बाहर फागुन बौराया है

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** बाहर फागुन बौराया है, मलय-पवन लहराती है पर भीतर की अगन अनकही, पल-पल मुझे जलाती है रंगों की इस भीड़-भाड़ में, मैं तनहा खड़ा रहूँ निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? यादों की समिधा सुलगी है, नयनों के इस कुंड में धुआँ-धुआँ सा हुआ जा रहा, मैं सपनों के झुंड में भीग रही है दुनिया सारी, केसरिया बौछार से मैं अपनी रुलाई को अब, हँस कर कैसे सहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? अबीर गुलाल उड़ाते चेहरे, लगते हैं सब बेगाने मौन खड़ा हूँ अधरों पर मैं, लिए हज़ारों अफ़साने कोरे रह गए मन के पन्ने, बिन तेरे अनुराग के राख हुए इन अहसासों को, कब तक चुनता रहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? परिचय :- . विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश) सम्प्र...
प्यारी माँ
कविता

प्यारी माँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** माँ मेरी ममता की मूरत, मिले हमेशा तेरी गोद। शान्ति शकुन है तेरी गोद मै, प्यार ममता की छाँव भी। सुख चैन आँचल मै तेरे, मीठी लोरी भाव है। हर जनम तेरी गोद मिले माँ, प्रेम स्नेह अपार है। मधुर बोल शांति स्वरूप माँ, सुख दुख सहती अपार है। माँ का आँचल इतना विशाल, समा जाये सब घर संसार। निर्मल मन निर्मल विचार, देती माँ तू शुभ आशिर्वाद। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम...
देदो अलसाई संध्या
कविता

देदो अलसाई संध्या

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनमन्दिर कर दो मेरा तृप्त शबनम हो अगर पत्तो पर की देदो कमनीयता मुझे तुम जैसा क्षणिक जीवन जीने के लिए। रजत राशि हो अगर आफताब की दो बिछा चांदनी आंगन मे मेरे अगर हो मेहताब की रश्मि तो देदो कुछ क्षण शाम अलसाई सी। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित ...
इलाज का टेंडर
व्यंग्य

इलाज का टेंडर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "डॉक्टर साहब, आप तो ये बताओ, इलाज में कुल खर्चा कितना बैठेगा?" मरीज़ एक्सीडेंट का है। जाहिर है, मरीज़ के सभी अटेंडेंट डील ब्रेकर बनकर आए हैं। इनमें असली घरवाले कौन हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। भीड़ देखकर लगता है कि मामला एक्सीडेंट का है और एक्सीडेंट करने वाले को पकड़ लिया गया है। मरीज़ को अस्पताल के हवाले कर दिया गया है, और बाहर एक्सीडेंट करने वाले का गिरेबान पकड़कर गालियां दी जा ही हैं, धमकाया जा रहा है। पुलिस केस की धमकी से जितना ऐंठ सकते हैं, उतना ऐंठने की कोशिश में लोग लगे हुए हैं। इस बीच, कुछ ऐसे मामलों के दलाल, जो इस मौके का निवाला खाने के आदी होते हैं, तुरंत सूंघकर आ जाते हैं। ये वो लोग होते हैं जो दोनों पार्टियों से अपनी जान पहचान बना लेते हैं। कुछ वकील, जिनकी रोज़ी-रोटी ऐसे ह...
अंतर्मन का द्वंद्व
कविता

अंतर्मन का द्वंद्व

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सबसे भयंकर युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़े जाते वे मन के भीतर होते हैं जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजाता। यहाँ दुश्मन यादें बनकर आता है, कभी डर बनकर वार करता है कभी उम्मीद बनकर उठाता है और कभी तोड़कर छोड़ जाता है। इस लड़ाई में खून नहीं बहता, पर सपने रोज़ मरते हैं चेहरा हँसता रहता है पर अंदर हजारों चीखें होती हैं। कभी मन हार मान लेता है कभी आत्मा उठ खड़ी होती है हर रात गिरती है हर सुबह फिर लड़ती है। यह युद्ध सब लड़ते हैं पर कोई दिखाता नहीं क्योंकि कमजोरी बताना इस दुनिया में अपराध समझा जाता है। भीतर की लड़ाई इंसान को थका देती है पर खत्म नहीं करती जो सह जाता है वही मजबूत बनता है बाकी टूटकर खामोश हो जाते हैं! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी ...
होली तेरे रंग
कविता

होली तेरे रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** फीके-फीके अब लगे, होली तेरे रंग। क्यूं बेसुरे से हो गये, फागुन वाले चंग। बहुरंगी दुनिया में, शेष ना असली रंग, ढ़ोल नगाड़े प्रेम के, बजते नहीं मृदंग। खास वर्जित है, आकर दबे पाँव लगाना, गुलाल गजबन गालों पे, नहीं सुहाती अंग। फागुन में धूमिल पड़ी, रसिया वाली रात, गुलमोहर की डाल पर, बसंत नंग-धड़ंग। बदले बदले मौसम में, दुखी खड़ा पलाश, फागुन अब नहीं खेलता, रंग रंगीला फाग। रिश्तों में से गायब है, चंदन की सी महक, चौपालों पर बस्ती में, बजती नहीं भपंग। लाती नहीं कुमारियां, अब गेहूँ चने की बाल, कच्चे पक्के मासूमों को, देख बिड़कुल्ले दंग। पीलिया ग्रसित ठिठोली, मन में मीठी आग, प्रीत प्रेत सी देखकर, भौचक धुरखेल के रंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा,...
बिन पते का पत्ता
कविता

बिन पते का पत्ता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हरा-भरा, नीला-पीला पेड़ की डाली का मैं बस पत्ता कहलाता हूँ, तना, डालियों, शाखाओं का मामूली सा रंगबिरंगी पत्ता, पेड़ की स्वाभिमान बढ़ाता हूँ पेड़ का जीवनसाथी बनकर मैं तो मामूली पत्ता कहलाता हूँ, पेड़ की रौनक क्या है प्रकृति की रौनक क्या है, चार चांद लगाने आता हूँ, मैं मामूली सा पत्ता कहलाता हूँ, हरियाली को हरदम हरा भरा खिलाता हूँ, मैं प्रकृति की आज्ञा से पहले पेड़ की डाली में आ नहीं पाता हूँ हरा-भरा खिलाखिला मुर्झाता छोड़ चला जाता हूँ, हवा आंधी तूफान का भरोसा नहीं कर पाता हूँ अस्तव्यस्त प्रकृति में हरा भरा सा खुशहाल बेहाल बनकर तमाशा सा जमीन पर उतर आता हूँ अस्तित्वहीन, मूकदर्शक निर्जीव मुर्झाया मृत सा न जाने कहाँ कौन सी दिशा में दूर दर-दर की ठोकरों में जमीन के कण-कण में समय चक्र की भांति कालचक...
मेरे आराध्य
भजन

मेरे आराध्य

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मेरे आराध्य देते भाव, तो मैं गीत लिखता हूं। श्रेष्ठ गायक सकें गा, इसलिए संगीत लिखता हूं। मेरे आराध्य ... करी आराध्य ने करुणा कृपा, तो राम मन भाए। लिखाई राम महिमा, जिसको गायक झूमकर गाये। न मैं कवि हूं न हूं गायक, समर्पण व्यक्त करता हूं। मेरे आराध्य ... तुम्ही ने प्रेरणा करके, नाम मधुशाला लिखवाई। जिसे संगीत और स्वर दे, विवेक और रोली ने गाई। सुनाते नाम महिमा तुम, कलम को मैं चलाता हूं। मेरे आराध्य ... लिखाते गीत मीटर में, तो गायक डूबकर गाते। जो गाते डूबकर भक्ति में, वो तेरी कृपा पाते। करी इतनी कृपा जिसका मै, हरपल गान करता हूं। मेरे आराध्य ... मेरे आराध्य तुमसे ये ही, विनती दास की तेरे। रमू बस नाम सेवा में, न अब माया मुझे घेरे। जो दी है नाम की सेवा, उसे निष्ठा से करता हूं। मेरे आराध्य ... ...
मृत्यु से दो-दो हाथ
दोहा, मुक्तक

मृत्यु से दो-दो हाथ

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** चलो मृत्यु से हम करें, मिलकर दो-दो हाथ। आपस में सब दीजिए, इक दूजे का साथ। मुश्किल में मत डालिए, नाहक अपनी जान, वरना सबका एक दिन, घायल होगा माथ।। दिल्ली में विस्फोट से, दुनिया है हैरान। इसके पीछे कौन है, सभी रहे हैं जान। मोदी जी अब कीजिए, आर-पार इस बार, नाम मिटाओ दुष्ट का, चाहे जो हो तान।। वो भिखमंगा देश जो, बजा रहा है गाल। शर्म हया उसको नहीं, भूखे मरते लाल। युद्ध सिवा उसको‌ नहीं, आता कोई काम, गलती उसकी है नहीं, पका रहा जो दाल।। हम तो हारे हैं नहीं, कैसे कहते आप। सीट भले आई नहीं, मानें क्यों हम शाप। अभी टला खतरा नहीं, लोकतंत्र से यार, हम भी कहते गर्व से, हुआ चुनावी पाप।। मोदी आँधी में उड़े, खर-पतवारी रंग। सोच-सोच सब हो रहे, गप्पू पप्पू संग। जनता ने ऐसा दिया, चला बिहारी दाँव, जीते-हारे जो सभी, ...
सत्रहवां संस्कार
आलेख

सत्रहवां संस्कार

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  सोलह संस्कारों का वर्णन हमारे वेदों में वर्णित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार किए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे, ये सत्रहवां संस्कार कहाँ से आ गया, जिसको आज तक आपने सुना या देखा नहीं। "आवश्यकता अविष्कार की जननी है।" जो भी परम्पराएं समाज में स्थापित होती है, वो वक़्त और समाज की जरूरत के हिसाब से तय होती है। वर्तमान में छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई करते हैं। उसके लिए उन्हें मनुष्य के मृत शरीर अर्थात देह की आवश्यकता होती है, जिसके बिना वे मानव शरीर की बारीकियों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शोध यानी रिसर्च के लिए भी मानव देह की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में देश के मेडिकल कालेजों में जितनी देहों की आवश्यकता है, उस अनु‌पात में मिल नहीं पा रही है। मृत्यु के बाद हम अपने धर्म के अनुसार देह को...
लो बसंत के दिन अब आए
कविता

लो बसंत के दिन अब आए

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सरसों फूले टेसू महके, आम्र तरु मंजरी बौराए, लो बसंत के दिन अब आए। कोयल कूके मयूर है नाचे, भ्रमर कलि संग गुनगुनाए, लो बसंत के दिन अब आए। बासंती बयार सखि को, प्रिय का संदेश पहुंचाए, लो बसंत के दिन अब आए। हरियाली और पुष्पों से, प्रकृति का दामन भर जाए, लो बसंत के दिन अब आए। मदमस्त बसंत के मौसम में, सजनी साजन संग सुहाए। लो बसंत के दिन अब आए। चहुं दिशाएं सुरभित हो जाए, प्रकृति संग मानव हर्षाए, लो बसंत के दिन अब आए। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंडला। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...
जीव जगत के लिये
कविता

जीव जगत के लिये

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दृग चन्चल, मन चन्चल बिटिया चन्चल, गौरी चन्चल मृग चन्चल, मृग दृग चन्चल आखेट के लिए आते हिन्सक के पग चन्चल। चन्चल सरिता झरना चन्चल जल की बून्दे, फुहारे चन्चल भागती चन्चल रश्मि छाया के संग। चन्चल पवन, चन्चल अग्नी पतझड चन्चल करता पथ को पथ पर पडे पर्ण चन्चल। पर, स्थिर, धैर्यवान धरा इन सब को संवारती आश्रय देती है मानव जीवन के लिए जीवजगत के लिए ... जीव जगत के लिए ...। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इं...
माँ … ज्ञान का सागर
कविता

माँ … ज्ञान का सागर

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ज्ञान का सागर है माँ, तू भक्ति की आराधना, सरस्वती सा विवेक तुझमे, तप-बल की तू शक्ति माँ। इस सागर मै नहार कर के माँ ज्ञान की ज्योति तुम्ह से पाई। भक्ति मै सरोबार होकर माँ प्रेम की रित तुझसे पाई। तेरी गोदी पाकर के माँ काव्य गीत मैने गाया, शक्ति बल पाकर के तुझसे यह कलम दवाद चलाई माँ। शान्त चित्त बुद्धि पाकर के यश तेरा फैलाया माँ, कठिन घड़ी और कठिन परीक्षा बस तेरा आशीर्वाद है माँ, प्रेम की धारा माँ है मेरी पिता किनारा नदियो का, कैसे हम बहकर के जाये, जो हाथ हे थामा गुरूवार का। अहंकार मान ना आये गुरूवार, हाथ झडी़ थामै रखना, प्रेम बोल से फटकार तुम गुरुवार। मुझ दिनन पर मडँते रहना परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर...
कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद
कविता

कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कोई पूछे तो धन्यवाद, ना पूछे तो समझो प्रसाद, सेवा का सच्चा सुख मिले, बस इतना ही है इराद। मनुष्य जिए अपने लिए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दिखावे की चादर ओढ़े क्यों, सच मन में ही रुके रहे। सेवा यदि की निस्वार्थ भाव से, फल उसका तुम पाओगे, तालियाँ चाहे कम मिलें, भीतर दीप जलाओगे। प्रशंसा की प्यास छोड़ दो, कर्म को ही साथी मान, जो बोओगे वही उगेगा, यही है जीवन का विधान। जो करते हो स्वयं के सुख को, वही सच्चा उत्सव है, बिना दिखावे का जीवन ही, सबसे बड़ा अनुभव है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेर...
ताला
दोहा

ताला

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** अधरों पर ताले लगे, विवश रहें करतार। टूटे जाने मौन कब, पीड़ा बढ़ी अपार।। मौन करें धारण सभी, बनकर मानस-दास। कैसी प्रभु यह चाकरी, ताले में सब आस।। कैसे प्रिय से हो मिलन, ताले लगे निवास। पता नहीं कुछ दे गए, सजनी सतत उदास।। झूठा ही वाचाल है, करे कौन प्रतिकार। मौन खड़ा प्रभु सत्य है, होकर बहु लाचार।। लोकतंत्र बेबस हुआ, संसद बैठी मौन। कर्म सभी अवरुद्ध हैं, खोले उनको कौन।। जीवन सम विश्राम है, वाणी बैठी शांत। मौन स्वरों में बोलता, मनुज हृदय आक्रांत।। कुछ कहना अपराध है, आया संकट काल। बंधक बनी स्वतंत्रता, जलती क्रांति मशाल।। बोलो सदा विचार कर, करते हैं अनुरोध। आकर्षित करती सदा, वाणी सरस अबोध।। नारी शक्ति स्वरूप है, अधर-अधर प्रतिमान। ताले में भी बन्द है, लगती मुक्त विधान।। मौनावस्था भंग कर,...
इस वक्त मैं …
कविता

इस वक्त मैं …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बड़े-बड़े अधिकारियों के रहमोकरम पर डोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं, हर पहुंच कार्यालय में मेरा हरदम नाम होता है, इधर से उधर हिस्सा निकाल पहुंचाना मेरा काम होता है, अब घर में रहूं या कार्यालय में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, अरे आपका भाई बिंदास है कभी किसी से नहीं डरता है, मुझसे डरते मेरे सारे साथी हैं, दूल्हा कोई और रहे पर आपका भाई होता सबसे पहला बाराती है, पैसे की बात आ जाए तो मेरा जिगरी भी एतबार नहीं करता है, आपका भाई कुछ जन्मजात जलवे धरता है, मगर सोच रहा हूं कि सेवानिवृत्त पश्चात क्या कोई मुझे पहचानेगा, निस्वार्थ वाला सहकर्मी मानेगा, अरे जाने भी दो यारों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं। परिचय :-  रा...
शिवशक्ति
गीत

शिवशक्ति

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** शमीशान शिव विश्वनिर्वाण कारी। शरण में तुम्हारे सभी जीवधारी।। मिटा दो सभी कष्ट महका दो बगिया। त्रिशूलं कराग्रे त्रयी तापहारी।। महाकाल उज्जैन में तुम विराजे। लिए हाथ डमरू गले सर्प साजे। कहे सब सदा काल भी तुमसे हारे। चढ़े अंग में भस्म तड़के तुम्हारे। वरे वाम अंगे प्रिये गौर माता। गुणातीत गणनाथ हे निर्विकारी। शमीशान शिव विश्वनिर्वाण कारी।। किया देव दानव जलधि का बिलोना। तभी जहर का कुंभ निकला कहोना। लगे देव दानव सभी फड़फड़ाने। पिया था हलाहल सभी को बचाने। नमन नीलकंठे जटा गंगधारी। निराकार निर्गुण तपस्वी अकारी। शमीशान शिव विश्वनिर्वाण कारी।। बहुत कष्ट संसार में तेरे देखा। तड़पते हृदय का कभी लेना लेखा। रहे खुश हमेशा चुभें दिल में भाले। दिखाऍं हृदय के बता किसको छाले। करों पार भव से ये नैया...
मीराबाई
दोहा

मीराबाई

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** रत्नसिंह की थी सुता, मीराबाई नाम। भोजराज पति नाम था, कृष्ण भक्ति था काम।। मीरा जब विधवा हुई, थामा गिरधर हाथ। मीरा माला जप रहीं, जुड़ीं कृष्ण के साथ।। नैन साँवरे हैं बसे, देखो निश्छल प्रीत। श्याम दर्श की धुन बनी, ढूँढे कान्हा मीत।। प्रभु चरणों में नाचती, गाती मधुरिम गीत। भक्ति बनी पहचान जब, लिया जगत को जीत। मीरा जोगन श्याम की, तजी लोक की लाज। सतत उपासक कृष्ण की, भूल गयी सब काज।। प्रेम डोर मीरा बँधीं, नेह जगत आधार। मीरा के कान्हा सदा, दिव्य लोक उपहार।। पति गिरिधर को मानती, मीरा पावन प्रेम। कृष्ण रंग चुनरी रँगी, भूले सारे नेम।। इकतारा ले हाथ में, धर जोगन का वेश। कृष्णमयी मीरा हुई, भूली अपना देश।। मीरा से अब हो रही ,भक्तिकाल पहचान । प्रेम भक्ति को राह दी,सब करते गुणगान।। गरल सुधा ...
सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
व्यंग्य

सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज मौसम ने जाने किस ज्योतिषीय गणना के बाद यह तय किया कि अब ठिठुरन को रिटायरमेंट दे देना चाहिए। सुबह की धूप में वह पुरानी खीझ नहीं थी, जो हड्डियों में उतरकर ऑर्थोपेडिक चेतना को भी कंपा दे। आज की धूप में वसंती उष्णता थी- हल्की, लुभावनी, आत्मविश्वासी। जैसे बसंत ऋतु ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर घोषणा कर दी हो- “मैं आ चुकी हूँ, कृपया पीला परिधान धारण करें।” वसंती स्वर्णिम रंग ने मुझे भी अपने प्रभाव में ले लिया। अलमारी खोली तो महीनों से अंदर-बाहर होती, मौसम विभाग की अनिश्चितताओं की शिकार, एक आग्नेय वर्ण की पीली टी-शर्ट कोने से झाँकती मिली। वह मुझे देख रही थी- थोड़ी उम्मीद, थोड़ी शिकायत भरे लहजे के साथ। जैसे कह रही हो- “कब तक मुझे सिर्फ बसंत पंचमी की प्रतीक्षा में रखोगे? मैं भी सार्वजनिक जीवन चाहती...
होमबाउंड – फिल्म समीक्षा
फिल्म

होमबाउंड – फिल्म समीक्षा

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** प्लेटफॉर्म पर परीक्षार्थियों की खचाखच भीड़ - रेलगाड़ी में चढ़ने के लिए मारामारी - परीक्षा केंद्र तक पहुंचना ही पहली लड़ाई है- परीक्षा हो भी जाए तो उसके बाद परिणाम के लिए सालों तक इंतजार करना- हुनर की कद्र नहीं है; जातीय भेदभाव हावी है। गफलत भरा बीतता समय बहुत सुंदरता से दिखाया है; परिणाम में भी जातिगत भेदभाव; तीर से चुभने वाले डायलॉग सशक्त समसामयिक, सहज, मार्मिक पीड़ा व अपमान को दर्शाते दृश्य आपको सीट से चिपके रहने को विवश करते हैं। हुनर की कद्र नहीं है; जातीय भेदभाव हावी है। खपरैल के गडढों में से आसमान देखना आसान नहीं, जितना ईंटा गारा डाल खुद को खड़ा करते हैं- लोग दूसरी तरफ से धक्का मार कर गिरा देते हैं। गेंद का असली वजूद हवा में ही है दोस्त, जमीन पर तो बस पड़ी ही रहती है- खुद की कद्र करना स्वार्थ नहीं होता एक दूसरे को चाहने का मतलब यह...
फागुन आया देह में
दोहा

फागुन आया देह में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** फागुन आया देह में, जागी आज उमंग। मन उल्लासित हो गया, फड़क उठा हर अंग।। फागुन लेकर आ गया, प्रीति भरा संदेश। जियरा को जो दे रहा, मिलने का आवेश।। फागुन की अठखेलियाँ, होली का पैग़ाम। हर कोई लिखने लगा, चिठिया प्रिय के नाम।। फागुन की मदहोशियाँ, छेड़ें मीठी तान। हल्का जाड़ा कर रहा, अनुबंधों का मान।। सरसों में आकर्ष है, महुये में है काम। पवन नेह ले कर रहा, कर्म आज अविराम।। फागुन लिए तरंग है, सबकी बदली चाल। मौसम ने ऐसा किया, कुछ तो आज कमाल।। बहके-बहके लोग हैं, संयम रहा न आज। फागुन करने लग गया, हर दिल पर तो राज।। फागुन रंगारंग है, बजें आज तो चंग। संतों के मन भी चढ़ा, साहचर्य का रंग।। यौवन है हर भाव पर, टूटे सारे बंध। है स्वच्छंद मधुमास अब, अवमानित सौगंध।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : ...
बेरूखी क्यों
कविता

बेरूखी क्यों

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रह तो रहे हैं, इसे घर कह तो रहे हैं, पर घर में मकड़ियों का जाला है, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है, कोई किसी को अपने आगे कुछ समझ नहीं रहा है, क्या तुम्हे नहीं लगता कि अंदर ही अंदर कुछ सुलग नहीं रहा है, सोच अलग हो सकता है, विचार अलग हो सकता है, पर अपनों के प्रति प्यार क्या दिल में नहीं रहा या गए हो भूल, इतने बड़े या इतने जिम्मेदार बन गए कि अपने आप में हो चुके हो मशगूल, परिवार के बीच रह रहे हो तो अपनों के प्यार को चख, सबको अपने स्वार्थ के हिसाब से न परख, अब लग ही नहीं रहा कि खून खून को पुकारता है, मगर कैसा खून है जिसका स्वार्थ चिंघाड़ता है, जब अपनों के प्रति इतनी बेरूखी है तो क्या खाक देश से प्यार दिखा पाओगे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्...
शबनम की बून्दो पर
कविता

शबनम की बून्दो पर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शबनम की बून्दो पर वक्त ठहर गया सा लगता है गुम-सुम आशियाने मे कोई सिमट गया सा लगता है सर्द मौसम मे धूप फुलझडी सी लगती है। शब के अंधेरे मे निर्धन देह अलाव तक सिमटती है कुछ जीने के लिए हँसते है कुछ हँसने के लिए जीते है जटिल जिन्दगी की राहो मे मुनासिब नही आम आदमी के लिए। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्र...
एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान
कविता

एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** जीवन एक सिक्का है, दो पहलू संग लाता है, एक तरफ़ समस्या खड़ी, दूजा राह दिखाता है। छाया संग धूप चले, यह जग का है विधान, दुख की काली रात में ही, जागे सुख की पहचान। काँटों से घबराए जो, फूलों तक ना पहुँच पाए, जो ठोकर को समझे पाठ, वही मंज़िल को अपनाए। हर उलझन एक पहेली है, जो हल माँगती जाती, धैर्य अगर साथी बन जाए, राह स्वयं बन जाती। समस्या जब सिर उठाए, मन थोड़ा घबराता है, समाधान वहीं छुपा होता, जहाँ डर सताता है। आंधी से जो टकराएगा, वही दीप बन पाएगा, हिम्मत की लौ जलाकर ही, अंधियारा हट पाएगा। शिकायत से कुछ न मिले, बस मन बोझिल होता है, प्रयासों की चाबी से ही, हर ताला फिर खुलता है। ठहराव नहीं जीवन में, संघर्ष ही पहचान, गिरकर फिर से उठ जाना, यही असली सम्मान। सिक्का जब तक चलता है, कीमत वही बताता, रुक जाए जो ...
भारत मॉं के वीर सपूत
धनाक्षरी

भारत मॉं के वीर सपूत

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** दिवस ये प्रेम का था, समूह जवानों का था पुलवामा से वो चले, खुशी- खुशी मान से। खुद को कहे जो पाक, हरकत की नापाक, ऐसा क्रूर कृत्य किया, खेल गया जान से। दम है तो आकर के वार करे सामने से, पीठ पर वार करे, कायर जहान से। वीर वो शहीद हुए, भारत की आन हुए, कोटिश: नमन हम, करते हैं शान से। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गायन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रका...