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मोहब्बत ने सीखा दिया
कविता

मोहब्बत ने सीखा दिया

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तेरी मोहब्बत ने मुझे, लिखना सीखा दिया। लोगों के मन को, पढ़ना सीखा दिया। बहुत कम होंगे जो मुझे, पढ़ने की कोशिश करते है। क्योंकि जमाने वालो ने तो, मुझे पागल बना दिया था। न धोका हमने खाया है, न धोका उसने दिया है। बस जिंदगी ने ही एक, नया खेल खेला है। जो न कह सकते है, और न सह सकते है। बस बची हुई जिंदगी को, जीने की कोशिश कर रहे है। और लोगों को मोहब्बत की परिभाषा समझा रहा हूँ।। चिराग जलाया करते थे, अंधेरों में रोशनी के लिए। तभी तो जिंदगी ने अब, अंधेरा कर दिया। देखकर रोशनी को, अब हम डर जाते है। की कही अंधेरों से भी, अब नाता न छूट जाये।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं र...
अगर दिल में मेरे
कविता

अगर दिल में मेरे

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** अगर दिल में मेरे चाहत का पारावार न होता मिलन का आप से सपना कभी साकार न होता हमें एक सूत्र में चुन चुन पिरोती भावनायें हैं वरन् उल्लास से पूरित कभी संसार न होता अभी भी जाति भाषा में उलझ जाती है ये दुनिया मज़हबी आग में रह रह धधक जाती है ये दुनिया अगर अनुचित उचित में फ़र्क़ हम सीखे हुए होते कोई शातिर हमारे शहर का सरदार न होता ज़माने को चराने की कभी जुर्रत नहीं करना छकाने के लिए उसको कोई हिकमत नही करना तुम्हें ये रौब रुतबा सम्पदा मुमकिन नहीं होती दुवाओं का तुम्हारे पास यदि भण्डार न होता अगर तुम आदमी हो आदमी सा काम भी करना किसी का दर्द बाँटों इस तरह का काम भी करना हमारे मन में भी पशुता पल्लवित हो गई होती अगर माता पिता सा साथ पहरेदार न होता तनिक परहित सदाशयता से रिश्ता जोड़ना सीखो ख़ुशी की राह मजलूमों के ख़ातिर खोलना ...
पेड़ लगाये… भविष्य संवारे
कविता

पेड़ लगाये… भविष्य संवारे

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** इंसान को कितना कौन समझाये समझकर भी अनजान बनता है । यदि प्रकृति को समझ जाये तो वह इंसान भगवान बनता है ।। बुद्धिमान होकर भी आदमी नासमझ और बेईमान बनता है । सभी प्राणियों में ही सिरमौर है वह मानव का आज पहचान बनता है ।। यदि प्रकृति को समझ ........ ..... कहते है वृक्ष आस है वृक्ष सांस है वृक्ष से कई औषधि बनता है । पेड़ लगाओ भविष्य संवारो वृक्ष से ही तो ऑक्सीजन बनता है।। यदि प्रकृति को समझ ......... ..... आओ मिलकर कर आज ही शपथ ले पर्यावरण संरक्षण का समझ बनता है। प्रकृति के तत्वों को आज जान ले पर्यावरण प्रेमी श्रवण बनता है ।। यदि प्रकृति को समझ ......... ..... परिचय :- धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू निवासी : भानपुरी, वि.खं. - गुरूर, पोस्ट- धनेली, जिला- बालोद छत्तीसगढ़ कार्यक्षेत्र : शिक्षक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हू...
वक्त गुजर जाएगा
गीत

वक्त गुजर जाएगा

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** अब तक लाखों को रुला चुका, अब नहीं रुलाने पाएगा, वक्त गुजर जाएगा।। चिंता की कोई बात नहीं, हरदम रहती है रात नहीं। क्या वक्त कहीं पे रुकता है, क्या आता रोज प्रभात नहीं।। डर जाएगा फिर क्यों तन मन, क्यों नहीं प्रभाती गाएगा, वक्त गुजर जाएगा।। अब प्राणवायु उसके घर से, आ पहुँची है रहमत बरसे। अब कमी नही ऑक्सीजन की, मन खुशियों से अब क्यों तरसे।। खुशियों के आँसू आँखों में, अब होंगे कौन रुलाएगा, वक्त गुजर जाएगा।। संक्रामित रोज बढ़े जाते, विष कोरोना का फैलाते। पर अब टीका मैदां में है, हम देख रहे राहत पाते।। "अनंत" कोरोना भागेगा, विषधर कैसे डस जाएगा, वक्त गुजर जाएगा।। परिचय :- अख्तर अली शाह "अनन्त" पिता : कासमशाह जन्म : ११/०७/१९४७ (ग्यारह जुलाई सन् उन्नीस सौ सैंतालीस) सम्प्रति : अधिवक्ता पता : नीमच जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) घोषणा...
कुछ अच्छा नहीं लगता
कविता

कुछ अच्छा नहीं लगता

डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** रोज़ के अख़बार नौकरी या व्यापार, गाड़ी-घोड़े कार नगद और उधार, कुछ अच्छा नहीं लगता। सुबह या फिर शाम, काम या विश्राम, मान और सम्मान, प्रसिद्धि या नाम, कुछ अच्छा नहीं लगता। सब टीवी चैनल बोर, केवल कोरोना का शोर, हैं चीत्कार चंहु ओर, टूटती सांस,जीवन डोर, कुछ अच्छा नहीं लगता। बस अपनों की फ़िक्र, और एक ही ज़िक्र, ज़िंदगी का चक्र, कितना विचित्र, कुछ अच्छा नहीं लगता। सब मापदंड ध्वस्त, कोई नहीं है मस्त, इक रोग से परस्त, हैं कोविड से त्रस्त, कुछ अच्छा नहीं लगता। ये अंधकार और हार, क्षमता से अधिक भार, संभव कहाँ उपचार, विस्मृत हुए उपकार, कुछ अच्छा नहीं लगता। सभी मंदिर मस्ज़िद बंद, अस्पतालों में कुप्रबंध, अंदर छुपे हुए जयचंद, नेताओं के मुँह बंद, कुछ अच्छा नहीं लगता। कोरा विपक्षी हल्ला, बिन पतवार मल्लाह, लूट खुल्लम खुल्ला,, शिकवा, शिकायत गिला, कुछ अच्...
हमारा लॉकडाउन
लघुकथा

हमारा लॉकडाउन

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** पूरा शहर बंद हो गया था। पता नहीं महामारी से कब तक देश में लॉकडाउन रहेगा? वर्षा सब कुछ सुन रही थी पर चुप थी। उसका मन तो कर रहा था। इसे आज ही एहसास हुआ है कि लॉक-डाउन सुबह से चालू हो गया हैं। आज से सभी दुकानें बंद रहेगी। स्कूल, कॉलेज बंद रहेंगे।यात्रायात के सभी साधन बंद रहेंगे। घर में किस तरह रहेगा यह, बंद होकर इसकी अय्याशी जो बंद हो जाएगी। रोज की महफिले, वही दारू पीकर तमाशा करना। जिस महफिल में रोज मजा मारता है वह बंद हो जाएगा। कॉलेज भी बंद हो गया है, वह कर रहा था। बेटे की पढ़ाई का क्या होगा? साल खराब हो जाएगा। वर्षा मन ही मन सोच रही थी वैसे कौन सा बेटा पास हो जाएगा? वह भी तो बाप पर ही गया है। किताबे तो उसे हमेशा दुश्मन दिखाई देती है। मैं ही उसकी किताबों को समेटती रहती हूँ। किताबे तो ज्ञान का भंडार होती हैं। ऐसा ही कहते थे मेरे पिताजी। ...
सवेरे-सवेरे
लघुकथा

सवेरे-सवेरे

मनोरमा पंत महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** सवेरे-सवेरे पूना से किसी नारायण जी का फोन आया, गिड़गिड़ाते हुऐ बोले- बेटा! वाट्सएप पर किसी ने आपका संदेश फारवर्ड किया है कि आप कोरोना मरीजों को खाना भिजवा रहे हैं, मेरे भाई इन्दौर के 'महक अस्पताल में भरती हैं, अकेले भर्ती हैं, क्या आप उन्हें खाना भिजवा सकते हैं ? मैंने उन्हें आश्वस्त किया तो वे रोने लगे। मैंने अपने कुछ साथियों के साथ ऐसे लोगों के लिये भोजन बनवाना शुरू किया जो किसी ऐसे अस्पताल में भर्ती हैं, जहाँ चिकित्सा तो हो रही है पर भोजन नहीं मिल रहा। अधिकतर ऐसे मरीज जो अकेले रहते हैं, या पढने या नौकरी के सिलसिले में इन्दौर में रहते हैं। झटपट पूनावाले के बुजुर्ग भाई की सब जिम्मेदारी ले ली। आज वे अस्पताल से डिस्चार्ज हो गये और अपने घर चले गये। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा पंत सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय भोपाल नि...
है समय बड़ा अनमोल
कविता

है समय बड़ा अनमोल

ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) धवारी सतना (मध्य प्रदेश) ******************** आंक सके तो आंक ले बन्दे, है समय बड़ा अनमोल। तय सांसे बस तुझे मिली हैं, अब तोल तोल तू बोल।। कितना जीवन व्यर्थ गंवाया, खाने, पीने और सोने में। औ, कितनी सांसे व्यर्थ गंवाई, बतियाने और रोने में। क्या तनिक बैठकर सोचा तूने, मिला है क्यों यह मानव तन। कुछ तो होगा उद्देश्य तेरा, क्या मोह भरा बस अपनापन।। अपने बच्चों का पालन तो, कर लेते हैं मूक पशु भी। पर क्या तू उनसे श्रेष्ठ नही, यह बात समझ न पाया अब भी।। अरे! तुझको है पाना परम् तत्व को, जो बसा है तुझमें चेतन रूप। और दया भाव की ऊष्मा से सबमे पाना वही स्वरूप।। जब ऐसे होंगे भाव तेरे, तब सिद्ध हो जीवन का मोल। फिर पल पल लगें तुझे कीमती, तब तू समझे समय का मोल परिचय :- ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) निवासी - धवारी सतना (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ क...
शर्मसार मानवता
कविता

शर्मसार मानवता

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** यहीं मानवता शर्मसार हो रही। कहावत कोई मरे कोई मौज करे की जो चरितार्थ हो रही। कालाबाजारी चरम पर है। भ्रष्टाचारी का जतन हर है। इंसानी खाल में भेड़ियावतार है, खुले आम कर रहा मौत का व्यापार है। त्रस्त जनता,सो रही सरकार है। उसे भी तो केवल अपने वोटों से सरोकार है। सुबह न्यूज़ पढ़ी डॉ गिरफ्तार है, जीवन प्रदत दवा का करते व्यापार है। जब रक्षक ही बन बैठे भक्षक हैं, तब कहो क्यों न डूबे गर्त में संसार है। कोई पूछे उस व्यापारी से किया क्या उसने आरक्षित अपनी सांसो का संसार है। या ये दुनिया उसकी जागीर उसी की खिदमत गा र है। या फिर कर ली उसने अपने कफ़न में जेब तैयार है। तभी तो मद में चूर हो कर रहा यूँ मानवता को शर्मसार है। परिचय :- रश्मि लता मिश्रा निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना,...
रोटी
कविता

रोटी

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** भूख में स्वाद जाने क्यों बढ़ जाता रोटी का झोली/कटोरदान से झांक रही रख रही रोटी भूखे खाली पेट में समाहित होने की त्वरित अभिलाषा ताकि प्रसाद के रूप में रोटी से तृप्त हो ऊपर वाले को कह सके धरा पर रहने वाला तेरा लख-लख शुक्रिया। रोटी कैसी भी हो धर्मनिर्पेक्षता का प्रतिनिधित्व करती भाग -दौड़ भी रोटी के लिए करते फिर भी कटोरदान धरा पर रहने वालों को नेक समझाइश देता कटोर दान में ऊपर-नीचे रखी रोटी मूक प्राणियों के लिए होती सदैव सुरक्षित। दान के पक्ष के लिए रखी एक रोटी की हकदारी से भला उनका पेट कहाँ से भरता ? रोटी की चाहत रोटी को न मालूम रोटी न मिले तो भूखे इंसान की आँखें रोती यदि रोटी मिल जाए ख़ुशी के आंसू से वो गीली हो जाती बस इंसान को और क्या चाहिए ऊपर वाले से किन्तु रोटी की तलाश है अमर। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी व...
बोझ
कविता

बोझ

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** सागर की गहराई से भी अधिक सहनशीलता उसके अंदर है.... हुनर पाया है उसने एक ऐसा, पलकों पर भी रखती वो समंदर है.... देखों सारी जिम्मेदारियों को उसने अपने जुडें में बांधा है.... पैरों में पायल है, मगर घुघरूओं को बंधनों ने जकड़ा है.... रखती है पाई-पाई का हिसाब, मगर रहता खुद की उम्र का भी नहीं है जिसें होश.... नाम जिसका रखा है दुनिया ने बोझ..... नाम जिसका रखा है दुनिया ने बोझ..... कभी किसी की बेटी है.... तो कभी किसी की पत्नी है.... कभी किसी की माँ है.... तो कभी किसी की सास है.... अनेक है, अलौकिक है, अनंत है उसके रूप.... सब को आँचल की छाया में बिठाकर, खुद सहती है धूप.... समझ लेती है सभी को अपने ऐसा, एक यही भी है उसमें दोष.... नाम जिसका रखा है दुनिया ने बोझ..... नाम जिसका रखा है दुनिया ने बोझ..... कतल कर देती है.... अपनी सारी इच्छाओं का, लग...
जरा ठहरों…
कविता

जरा ठहरों…

निशा कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** जरा ठहरों.....जरा ठहरों..... इस भाग -दौड़ की जिंदगी में, तुम कहाँ भागे जा रहे हों.... हरदम तुम क्यों बैचेन रह रहे हों कहि तुम खुद को तो भूलते नहीं जा रहे हों.... जरा ठहरों....जरा ठहरों..... और एक बार तुम सोचों कहि तुम इस भाग-दौड़ के जिंदगी में, अपनों को तो नहीं खोते जा रहे हों.... जरा ठहरों....जरा जरा ठहरों.... तुम इस तरह दिमाग में टेंशन लेकर जैसे-तैसे जिए जा रहें हो... क्या तुम अपनों के साथ, बैठ कर दो पल प्रेम की बातें कर रहें हों..... जरा ठहरों.... जरा ठहरों.... चार दिन की इस जिंदगी को जिंदादिली से जिओ.... जो पीछे छूट गए हैं उसे साथ लो खुद हँसो, दूसरों के भी जिंदगी में खुशियों लाओ, ये न सोचों की तुम अपने जीवन में पीछे छूट रहें हो..... जरा ठहरों....जरा ठहरों..... इस भाग-दौड़ की जिंदगी में तुम कहाँ भागें जा रहें हों.... हरदम तुम क्...
एक विनती
कविता

एक विनती

शोभा सोनी बड़वानी (मध्य प्रदेश) ******************** न रूठिए अब अपनों से न गुस्सा करिए अपनों से। करती मौत तांडव जमीं पे पल पल में बिछड़ रहे हम अपनों से।। न जाने कौन सा मेसेज आखिरी हो न जाने कौन सा कॉल आखिरी हो वो प्यार वो रिश्ता आखिरी हो अब टूटती हैं सांस सांसों से सभी गलत फहमियां मिटा लो आज फिर अपनों को मनालो बुझ रहे है हर पल दिए एक बार अपनो से रिश्ता निभालो।। सब गलतफहमियां मिटा दो, दिलों को जीत लो, प्यार दिखा दो, कही कोई हसरत ना रह जाए, एक बार सभी को अपना बना लो।। परिचय :- शोभा सोनी निवासी : बड़वानी (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं,...
जहरीली हवा
कविता

जहरीली हवा

विनोद सिंह गुर्जर महू (इंदौर) ******************** जहरीली हवा बह रही। हमसे यूं कह रही।। जीना है तुम्हें गर। अपनों के साथ घर।। खुद को नजर बंद कर दो। ताले में बंद कर लो।... घूमने का ख्याल छोड़ो। व्यर्थ के सवाल छोड़ो।। जिंदगी रहे सलामत, होटलों की दाल छोड़ो।। मेहफिल ना जाने का, इरादा बुलंद कर लो।।... खुद को नजर बंद कर दो। ताले में बंद कर लो।... मौत का पैगाम लेके। आये है तूफान ऐसे। लड़ने तैयार हैं हम, हार जायें मान कैसे।। निश्चय खदेड़ देंगे, ऐलान-ए-जंग कर दो।।... खुद को नजर बंद कर दो। ताले में बंद कर लो।... मुश्किल है आन पड़ी। आफत में जान पड़ी। महामारी फैल रही, आई विकराल घड़ी।। निराशा के आंगन में , उत्साह, उमंग भर दो।।... खुद को नजर बंद कर दो। ताले में बंद कर लो।... परिचय :-   विनोद सिंह गुर्जर आर्मी महू में सेवारत होकर साहित्य सेवा में भी क्रिया शील हैं। आप अभा साहित्य परिषद मालव...
नशा
कविता

नशा

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** नशा तुम करते हो भुगतना परिवार को पड़ता है गलती तुम्हारी होती है पर भूखे सोना तुम्हारे बच्चो को पड़ता है कह-कह कर थक जाती है तुम्हारी पत्नी पर तुम तो उन्हे मारने पड़ते हो। ये आदत बुरी है तुम भी जानते हो पर दोस्तो के साथ मे तुम भी बड़े मजे से पीते हो जीवन में तुम्हे क्या करना है तुम नहीं सोचते हो बच्चे पत्नी को छोड़ कर तुम दोस्तो की बाते मानते हो। तुम्हारे बाद क्या होगा घर का तुम तो शौक से पीते हो और जनाब हर रोज पीकर तुम खुद को ही बर्बाद करते हो उसे खाने या पीने से पहले पढ़ तो लिया करो ना आए पढ़ना तो चित्र तो देख लिया करो। तू नशा कितनो की जिंदगियां बर्बाद करेगा किसी के मांग का सिंदूर छीन लिया तो किसी के सिर से पूरी कायनात छीन ली किसी के सहारे को खत्म कर दिया तो किसी को अपने ही घर से बेदखल कर दिया...
फिजुल ख़र्च
लघुकथा

फिजुल ख़र्च

ममता रथ रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** मां- "बेटा पंडित जी को ५०० रु. देना, तुम्हारे नाम से ज्योत जला देंगे।" दीपक पंडित जी को ५०० रु. बेमन से दे देता है। पंडित जी के जाने के बाद दीपक मां से- ये क्या मां आजकल तुम बहुत फिजुल ख़र्च करने लगी हो, कभी यहां दान करो, कभी गौशाला के लिए चारा दे आओ, कभी पंडित जी को दान, हर साल आज के दिन मंदिर में ज्योत जलाना, ये सब क्या है मां बहुत खर्च हो रहा है कुछ कम करो।" ऐसा कहकर दीपक चला गया, मां ने कुछ नहीं कहा, ऐसे भी मां कहां कुछ कहती हैं, फिर आज तो दीपक का जन्म दिन है। रात होते तक घर में दीपक के दोस्तों की महफ़िल सज़ चुकी थी, जहां महंगें शराब का दौर चल रहा था। जुए पर दांव भी लगाएं जा रहें थे, भले ही शौक के लिए खेला जा रहा था पर सब खेल रहे थे। मां अपने कमरे में बैठकर सोच रही थी कि फिजुल ख़र्च कहां हो रहा है। परिचय :-  ममता रथ पिता : विद्या भूष...
वो यादें
कविता

वो यादें

सुप्रिया चतुर्वेदी रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** वो यादें बचपन की, उस आंगन मे थी। जहां मेरा जीवन का, एक हिस्‍सा बीता था। वो हसना मेरा, वो रोना मेरा। सब उसकी दीवारों में, एक तस्‍वीर के फ्रेम जैसे सजा था। वो चार दिवारों का कमरा नही, मेरी यादें से सजा हुआ मेरा घर था। वो यादें बचपन की, उस आंगन मे थी। जहां मेरा जीवन का, एक हिस्‍सा बीता था। परिचय :- सुप्रिया चतुर्वेदी निवासी : रायपुर छत्तीसगढ़ घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल)...
मासूमियत
लघुकथा

मासूमियत

माधवी तारे इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************   'वक्त की कैद में जिंदगियाँ हैं, मगर चंद घड़ियाँ हम सब सब्र करें, प्राण वायु की आपूर्ति के लिए तो कम से कम।' संपूर्ण विश्व की त्रासदी से हम सब वाकिफ हैं। एक अनाहत भय से हर शख्स परेशान सा है। बच्चें, बूढ़े एवं युवा सब-के-सब आज की स्थिति का गुनहगार स्वयं को मान रहे हैं। स्वार्थांध होकर मानव ने प्रकृति के साथ की हुई ज्यादतियां या खिलवाड़ का नतीजा वर्तमान स्थिति में कैसा भारी पड़ रहा है, सब देख रहे हैं, मान भी रहे हैं। 'वनराजी, वृक्षबेलियाँ हमारे सगे-संबंधियों जैसी है', यह हमारे देश की परंपरा युगों-युगों से चली आ रही है। ऐसे में एक घर की बुजुर्ग महिला सुबह-सुबह उठकर, नहा-धोकर, पुजा की थाल हाथ में लेकर जंगल की ओर निकल पड़ती है। दरवाजे की आहट सुनकर उसका छोटा पोता उठकर, "दादी माँ, रुको। मैं भी आपके साथ जंगल की और आता हूँ," कहकर जल्दी से ह...
उसे क्या गिला है
ग़ज़ल

उसे क्या गिला है

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहा है बताओ उसे क्या गिला है जहाँ में अकेला मुझे वो मिला है मुझे देख गाते उसे भी बुलाया खुले में गवाओ उसे जो मिला है जवानी दिवानी बनी है कहानी मुझे जो दिया है वही तो मिला है शमा के उजालो मुझे साथ लेलो उजाला दिखाने यही तो मिला है लगाया जिसे है गले से हमारे वही आज तेरे घरों से मिला है नही है भरोसा जिसे जो मिला है जहाँ में हमारे सभी को मिला है परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिंदी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरच...
आज झंझावात
कविता

आज झंझावात

सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** "ये कैसी चल पडी, खबरों से, मन पर होता है, आघात, बन्द, घरों में हो गये हैं, अब सारे लोग, लगता जैसे महीनों से न हुई हो बात, तडफ रही जिंदगी, प्राण वायू के लिये, कैसे बचायें हम, अपनों के हृदयाघात, किसने कहा कि ये अंधेरा छ्टेगा नहीं, सुनहरी किरणो से होगा कल सुप्रभात, मायूसी के बादल तो अब लगे हैं छटने, नई कोपलों ने लाई, खुशियों की सौगात" परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संकलन) में प्रकाशित, ३ गीत॰ मुक्तक लोक व्दारा, प्रकाशित पुस्तक गीत सिंदुरी हुये (गीत सँकलन) मेँ प्रकाशित...
“सुन्दरकाण्ड के सार” के सृजन की पृष्ठ भूमि
मुक्तक

“सुन्दरकाण्ड के सार” के सृजन की पृष्ठ भूमि

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ये कोरोना बीमारी
कविता

ये कोरोना बीमारी

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** ये कोरोना बीमारी जो बनी महामारी, केवल मनुष्य पर क्यों पड़ रही भारी। इसके जन्म की व्यक्ति है जिम्मेदार, कोरोना इसलिए व्यक्ति को रहा मार। क्यो? जीव-जन्तु नहीं हो रहा बीमार, व्यक्ति स्वयं इस बीमारी का शिकार। इसमें क्या करे इस सृष्टि के रचनाकार, व्यक्ति स्वयं है बीमारी का जिम्मेदार। जब व्यक्ति कन्द, मूल व फल खाये, हर व्यक्ति हर वर्ष एक पौधे लगाये। इसके बदले में शीतल मंद हवाएँ पाये, सुखी व आनन्दमय वो जीवन बिताये। पीपल, आम, महुआ का पौधा लगाये, स्वादिष्ट, मीठे व ताजे-ताजे फल खाये। अब ज्यादा से ज्यादा लोग खाये गोश, इस बीमारी का दे किसको हम दोष। वातावरण में व्यक्ति ने प्रदूषण फैलाये, व्यक्ति खुद जीवन में बीमारी है लाये। लगा है जल्दी से करोड़पति बन जाये, दुनियाँ के सबसे धनी व्यक्ति हो जाये। हाय रे पैसा हाय! रे ह...
तुम अगर मिल गए
कविता

तुम अगर मिल गए

प्रीति जैन इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** सवाल खटखटा रहे हैं, मेरे मन का द्वार धरा का क्या हाल हुआ, सताए यह विचार मन विचलित, नैन विस्मित, देख नजा़रे धरती के सजा मिली कैसी हमें पूछूंगी भगवन, तुम अगर मिल गए इंसान ही इंसान का बन बैठा है दुश्मन अनाचार, अत्याचार, हैवानियत, मर गया कोमल मन संसार है नश्वर, मोल इंसानियत का न जाना किसी ने गुनाहों की मेरे मांग लूंगी माफी, तुम अगर मिल गए जगमगाती दुनिया में छाया एक पल में अंधियारा तम को चीरकर दीप्त प्रकाशमान करो, झिलमिल उजियारा अलौकिक रोशनी से रोशन होगा जहां, मन में विश्वास है आस की लौ थी क्युं जलाई, पूछूंगी तुम अगर मिल गए होश कहां बाकी रहा, चहूं ओर छाई निराशा बंद ताले में बैठे जो मंदिर में, मन में अब भी आशा मंज़र कैसा, चलती सांसे, हवा का पता नहीं क्युं ये विडंबना धरती पर छाई, पुछुंगी तुम अगर मिल...
तेजू की धुन
लघुकथा

तेजू की धुन

अमिता मराठे इंदौर (म.प्र.) ******************** लंबे इंतजार के बाद वातावरण बदलने लगा था। महामारी और लाॅकडाउन से लोगों को निजात मिलने लगी थी। रामबाबू भी अपने रूकें कामों को पूरा करने में जुट गये थे। स्कूल के पट खुलने लगे थे। सबके कारोबार गति पकड़ ही रही थी, तो कोरोना की दूसरी लहर बेभान हो उछाले मारने लगी। तेजू अपनी झोपड़ी के बाहर टूटी सी खटिया पर बैठे कभी मुस्कुराता तो कभी गंभीर चेहरा बनाये टेढ़े बांके हाथ किये कुछ बड़बड़ाता था।आते जाते लोग कहते विक्षिप्त है। बच्चे उसकी पीठ पर मारते तो कोई खाने की चीज उसके सामने डाल देते थे। उसे महामारी से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन चौकस रहता था। लोगों की भेंट की चीजें लेते समय कहता 'जागते रहो, अरे! पगले भला हो कहते हैं। राम बाबू हमेशा उसे टोकते किन्तु तेजू ने अपनी चाल नहीं बदली। राम बाबू की समाज सेवा में तेजू और उसकी माँ को प्राथमिकता थी। उन्हें तेजू से प्...
मास्क बनाओ ढा़ल
कविता

मास्क बनाओ ढा़ल

शंकरराव मोरे गुना (मध्य प्रदेश) ******************** उड़ती हुई धूल कण से, छोटे कोरोना कण हैं। हैं सुगंध कण जैसे लेकिन, गंध हीनता गुण है।। गोल गोल आकृति पाई है, गोल गोल ही सिर हैं। धूल कणों के साथ तैरते, चलें कभी स्थिर हैं।। कोरोना मरीज के तन से, उड़ते बन गुब्बारे। मानव तन से भूख मिटाने, फिरते मारे मारे।। स्वांसों से कर मेल, नासिका से प्रवेश वे पाते। स्वांस नली से तैर वायरस, फैंफडों में बस जाते।। ऑक्सीजन को हटा, छेद में अपने पैर जमाते। पल-पल में अपने जैसे, लाखों वायरस उपजाते।। साहस का है काम यहां, अपना एकांत बनाना। प्रभु है मेरे साथ स्वयं को, बार बार समझाना।। जाना आना मास्क लगा, मत पास किसी के जाना। समय बुरा है कुछ दिन तक, घर में भी मास्क लगाना।। कोरोना अदृश्य वायरस है, शत्रु वत आ जाए। ढाल मास्क की धारण करना, ये ही जान बचाए।। विश्व ...