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चंपा का फूल
कविता

चंपा का फूल

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** चंपा के फूल जैसी प्रिये काया तुम्हारी मन को आकर्षित कर देती जब तुम खिल जाती हो चंपा की तरह। तुम भोरे, तितलिया के संग जब भेजती हो सुगंध का सन्देश वातावरण हो जाता है सुगंधित और मै हो जाता हूँ मंत्र मुग्ध। प्रिये जब तुम सँवारती हो चंपा के फूलो से अपना तन जुड़े में, माला में और आभूषण में तो लगता स्वर्ग से कोई अप्सरा उतरी हो धरा पर। उपवन की सुन्दरता बढती जब खिले हो चंपा के फूल लगते हो जैसे धवल वस्त्र पर लगे हो चन्दन की टीके। सोचता हूँ क्या सुंदरता इसी को कहते मै धीरे से बोल उठता हूँ प्रिये तुम चंपा का फूल हो। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश - विदेश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में न...
मुद्दे उठाए जाते हैं
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मुद्दे उठाए जाते हैं

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** मेरे देश में, मुद्दे उठाए जाते हैं। जिंदगी के असल सच से, लोगों के ध्यान हटाए जाते हैं। घटना को, घटना होने के बाद, देकर दूसरा ही रुख। असल घटनाओं पर, पर्दे गिराए जाते हैं। मेरे देश में मुद्दे उठाए जाते हैं। जिंदगी किन, हालातों में बसर करती है। पंचवर्षीय सरकारों में, अमीर- गरीब के मापदंडों में, मध्यवर्ग को, बस वायदे ही थमाए जाते हैं। मेरे देश में, मुद्दे उठाए जाते हैं। जागे.....असल पहचानिए। जो कानों को, सुनाया जाता है। आंखों को दिखाया जाता है। दो रोटी कमाने के लिए, हम और आप कितनी लड़ाई लड़ते हैं। हमें मुद्दों में, कितना बहलाया जा रहा है। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय ह...
खुशियों का पैगाम
कविता

खुशियों का पैगाम

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** किसी की याद जब हद से गुजर जाए तो कोई क्या करें.... कोई दूर रहकर भी बहुत याद आये तो कोई क्या करे.... न मिलना हो मुमकिन, न भूलना हो मंजूर.... कोई फितूर बनकर छा जाए तो कोई क्या करे ये खुदा!!!!! अब तो मदद कर या तो मिला दे उसको या फिर ज़ेहन से ही मिटा दे क्योंकि होश के बादल जब छाए तो कोई क्या करे अब जीना भी हुआ मुश्किल और मौत भी आती नहीं ऐसे में बेहोशी अगर छा जाए तो कोई क्या करे ये खुदा!!!!! अब तू ही राह दिखा वरना हर तरफ जब अंधेरा ही दिखाई दे तो कोई क्या करे अब तो हर तरफ बिखेर दे उम्मीदों की लड़ियाँ.... क्योकि मायूसी अगर छा जाए तो कोई क्या करें।। अब बस बहुत हुआ.... अब तो बस कोई खुशियों का पैगाम ही आये, दिल ये दुआ करे परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस...
विश्वास
कविता

विश्वास

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** विश्वास की टूट गई है रीढ़! अपनापन नहीं रह गया अब दृढ़!! सदाशयता को हुआ पक्षाघात! अविश्वास देत है नित आघात!! संबंधों की खो गई ऊष्मा! भावनाओं की पूँजी ना जमा!! चहुंँ दिशि हुआ घनीभूत स्वार्थ! निरंतर छीजन ग्रसित परमार्थ!! संस्कारों की डोर पड़ी झीनी! उद्दंडता ने सब लज्जा छीनी!! आंँधी चली है पाश्चात्य की! जड़ें उखड़ी हैं पौर्वात्य की!! आत्मीयता को ग्रस रहा राहू! अपनों को तृषित हो रहे बाहू!! विश्वास का हुआ चतुर्दिक अभाव! घृणा वैमनस्य का बढ़ा प्रभाव!! निष्ठा त कहीं पड़ी हैं मृतप्राय! विश्वास की पूंँजी गलती जाय!! नेह, विश्वास, त्याग, करुणा तज! युग वरे अहं, स्वार्थ, घृणा अज!! विद्वेष का आँचल बढ़ता जाए! सौहार्द्र न अब मन को लुभाए!! संवेदनाओं की गागर रीती! भावुक मन पर, पूछो क्या बीती!! प्रभु! ऐसी कोई हवा चल जाय... युग की नस में ही नेह ढल जाय...
सूक्ष्म पुरुस्कार
कविता

सूक्ष्म पुरुस्कार

गौरव हिन्दुस्तानी बरेली (उत्तर प्रदेश) ******************** युगों-युगों से अडिग खड़े हो, भयंकर आँधियों में, भीषण तूफ़ानों में, बारिशों में, विनाशकारी ओलावृष्टियों में, और तनिक भी न हिले हलाचला आने के बाद भी नहीं, प्रतिवर्ष, प्रतिदिन प्रतिपल देते रहे तुम, शीतल छाया, प्राणदायिनी वायु सभी को, और देते रहे अनुमति पक्षियों को, घोसले बनाने की अपनी विशाल शाखाओं पर बाँधें रहे मिट्टी के एक-एक कण को, अपनी जड़ों से, ऐसी श्रेष्ठतम, सर्वोत्तम, निस्वार्थ सेवा पर, हे बरगद के प्राचीन विशाल वृक्ष मैं अलंकृत करता हूँ तुम्हें पद्मश्री, पद्मविभूषण तथा भारत रत्न जैसे सूक्ष्म पुरुस्कारों से। परिचय :- गौरव हिन्दुस्तानी निवासी : बरेली उत्तर प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...
आशिक तू हमें
कविता

आशिक तू हमें

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** आशिक तू हमें, दिलको कू-ए-यार बना दे। या रब तू अपने, इश्क का बीमार बना दे।। ये सिर तेरे आगे ही झुके मालिके जहां। तेरे ही आगे हाथ उठे मालिके जहां।। दिल तेरी हम्दे पाक पढ़े मालिके जहां। पग राहे हक में ही ये बढ़े मालिक जहां।। यूँ हक की सल्तनत का पैरोकार बना दे। या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।। इंसाफ पर चलने की हमें राह बता दे। मिलने की तमन्नाओं को तू अपना पतादे।। तेरे हैं इस जहान को मौला तू जता दे। खाते में फरिश्तों से कह के नाम खता दे।। नबीयों का रसूलों का वफादार बना दे। या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।। माले हराम पेट में जाने नहीं पाए। छल दिल में कभी पैर जमाने नहीं पाए।। नफरत जेहन में भूल के आने नहीं आने नहीं पाए। गुस्सा कभी भी सिर को उठाने नहीं पाए।। यूँ जिंदगी में सब्र को साकार बना दे। या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।। जो क...
शिक्षक दिवस
कविता

शिक्षक दिवस

डॉ. उपासना दीक्षित गाजियाबाद उ.प्र. ******************** शिक्षा का कर्णधार, क्यों इतना लाचार, कलम की अस्मिता का, मूल्य हुआ निराधार, कलम के सिपाही, पर बेड़ियाँ हजार, असमानता की खाई में, गिर कर हुआ बेकार। आरक्षण की वैसाखी, और व्यक्तिगत संस्थाएँ, शिक्षक की गरिमा को, खूंँटी पर लटकाते, घिसो कलम और घिसो, रक्त बूँद शेष तन में, और घिसो और घिसो, मुँह न खोलो, होंठ सिलो, कम वेतन, कार्य करो, शिक्षा का सूत्रधार, रो रहा लगातार, कलम की अस्मिता का, मूल्य हुआ निराधार। विश्व गुरु का मन अस्वस्थ, पर पुस्तक पर दृष्टि पैनी, रोटी की आपाधापी, बातें 'प्रमुख 'की सहनी, राजनीतिक पदों पर, अनपढ़ों की भरमार, राष्ट्र का निर्माता बना, वित्तहीन बेरोजगार, सत्ता के मदान्धों ने किया, शिक्षा का बंटाधार, बंदरों की मंडली में कैसे, हो शिक्षक दिवस साकार। परिचय :- डॉ. उपासना दीक्षित जन्म - ३० दिसंबर १९७८ पिता - स्व. ब्रजन...
हिन्दी हमको भाती है
कविता

हिन्दी हमको भाती है

भारत भूषण पाठक देवांश धौनी (झारखंड) ******************** हिन्दी हमको भाती है, सबको खूब सिखाती है, चुन्नी-मुन्नी तुम भी पढ़ लो, दीदी आज बताती है। जन-जन की भाषा हिन्दी, कहता रंभाकर नन्दी, कोयल बागों में बोले, सुन्दर लगती है बिन्दी। संस्कृत भाषा की बेटी, नेह बाँहों में समेटी, यही बनाती है ज्ञानी, समृद्धि देती भर पेटी। परिचय :- भारत भूषण पाठक 'देवांश' लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी - ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला दुमका (झारखंड) कार्यक्षेत्र - आई.एस.डी., सरैयाहाट में कार्यरत शिक्षक योग्यता - बीकाॅम (प्रतिष्ठा) साथ ही डी.एल.एड.सम्पूर्ण होने वाला है। काव्यक्षेत्र में तुच्छ प्रयास - साहित्यपीडिया पर मेरी एक रचना माँ तू ममता की विशाल व्योम को स्थान मिल चुकी है काव्य प्रतियोगिता में। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ...
बेरोजगार
कविता

बेरोजगार

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** देश विदेश में शिक्षा की, ना बन पाया कुछ काम। युवाओं का हाल हुआ बेहाल, एक के साथ एक हो रहे बेरोजगार...... बेरोजगार की है अनेक परिभाषा, पर ना कर पाया कोई उसे परिभाषित। एक काम पर अनेक करते काम, कभी प्रच्छन्न तो कभी घर्षित हो जाते बेरोजगार...... मशीनीकरण की क्रांति एसी आई, हजारों का कार्य मशीनों ने लिया। हस्तशिल्प उद्योग पर है बढ़ावा, पर आगे चलकर ना आता कोई बेरोजगार...... परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी (राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने ...
छोटा कलमकार
गीत

छोटा कलमकार

अवधेश कुमार 'कोमल' जमोलिया, बाराबंकी (उ.प्र.) ******************** जो दिल में आता है साहब, बस कहने की कोशिश करता हूं। मैं छोटा सा कलमकार हूं, बस लिखने की कोशिश करता हूं।। मैं लिखता हूं मातृ भूमि पर, गद्दरों से आहत होकर। मैं लिखता हूं धर्म के ठेकेदारों से घायल हो होकर।। मैं लिखता हूं खद्दर धारी नेताओं के बारे में। जिसने विष रस घोल दिया है, गांव गली-चौबारे में।। मैं कहता हूं भारत के उस अद्भुत पी.एम नरवर से। मैं कहता हूं भारत के उस अटल अलौकिक नव स्वर से।। जिसने हटा तीन सौ सत्तर, कश्मीर देश में मिला दिया। वर्षों का वनवास राम का एक ही छण में मिटा दिया।।   परिचय :- अवधेश कुमार 'कोमल' पिता : शिव बालक यादव निवासी : जमोलिया, बाराबंकी (उ.प्र.) उद्घोषणा : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के...
इक अफसाने को याद कर
कविता

इक अफसाने को याद कर

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** मेरी आज इक अफसाने को याद कर रात गुज़रेगी सनम जो कल मुझसे मिले थे उनकी याद कर रात गुजरेगी सनम दो पल ठहरे थे कि उनसे मुलाकात हुई थी हमसे बस लब्जो के बाण जो चले आज वो याद कर रात गुजरेगी सनम उन लम्हों में मुझे अपनापन सा मिला था जीवन का मुहोब्बत हो चली है मुझे वो बातें याद कर रात गुजरेगी सनम मेरे हर गम, जख्म, दर्द को तथा जज्बातों को समझा था उन्होंने मेरी आँखों से जो खुशी छलकी थी वो याद कर रात गुजरेगी समन जिन्दगी का वो हसीन महीना, दिन, तरीख आज ही तो है क्योंकि उन्होंने मेरा आज ही हाथ थामा है वक्त याद कर रात गगुजरेगी सनम कभी भी मुझ संग तुम दगा, दिल्लगी ना करना और बेवफाई क्योंकि आज तुम्हारी वो हर कसमें याद कर रात गुजरेगी सनम परिचय :- बबली राठौर निवासी - पृथ्वीपुर टीकमगढ़ म.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार स...
दिल के रिश्ते
गीत

दिल के रिश्ते

संजय जैन मुंबई ******************** अपने बचपन की बातें आज याद कर रहा हूँ। कितना सच्चा दिल हमारा तब हुआ करता था। बनाकर कागज की नाव, छोड़ा करते थे पानी में। बनाकर कागज के रॉकेट, हवा में उड़ाया करते थे। और दिल की बातें हम किसी से भी कह देते थे। और बच्चों की मांग को सभी पूरा कर देते थे।। न कोई भय न कोई डर, हमें बचपन में लगता था। मोहल्ले के सभी लोगों से जो लाड प्यार मिलता था। इसलिए आज भी उन्हें में सम्मान देता हूँ। और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ।। जो बचपन की यादों से अपना मुँह मोड़ता है। और उन सभी रिश्तों को समय के साथ भूलता है। उससे बड़ा अभागा और कोई हो नहीं सकता। जो अपने स्वर्णयुग को कलयुग में भूल रहा है।। सगे रिश्तो से बढ़कर होते मोहल्ले के रिश्ते। तभी तो सुख दुख में सदा ही खड़े हो जाते है। और अपनों से बढ़कर निभाते सभी रिश्ते। इसलिए मातपिता जैसे वो सभी लोग होते है। और हमें ये लो...
करे योग रहे निरोग
कविता

करे योग रहे निरोग

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** वो मेरे देश के बच्चे, बुढ़ो, महिलाओं और नौजवानों, राम देव बाबा के योग्य विद्या को तुम जरा पहचानो। राम देव बाबा हर भारतीय को रहे समझाय, जो जन नित्य सुबह योग करे भाय । उसके निकट जल्दी कोई रोग नहीं आय, रामदेव बाबा रोज योग कर रहे और रहे कराय। योग गुरु बाबा रामदेव रहे सबको समझाय, विश्व योग दिवस सम्पूर्ण विश्व हर वर्ष रहा मनाय। रोगों को अपने शरीर से वही रहा भगाय, जो जन नित्य योग सुबह-सुबह करे भाय। उसके शरीर से रोग हो जाय टाटा बाय बाय, उदर, हृदय और मधुमेह रोग उनके निकट कभी न जाय। जो जन नित्य सुबह-सुबह योग करन जाय, जो नित्य सुबह-सुबह करे नियमित योग। वो सदैव रहे स्वस्थ, मस्त और रहे निरोग, जो रहे स्वस्थ, मस्त व निरोग उसका डॉक्टर से जल्दी होत नहीं योग। परिचय :- विरेन्द्र कुमार यादव निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) घोषणा पत्र ...
शिक्षक क्या है
कविता

शिक्षक क्या है

अंजली कुमारी सैनी चैनपुर, सीवान, (बिहार) ****************** शिक्षक हमारे गुरु होते है, जैसे बुजुर्गों ने कहाँ है, की शिक्षक एक भगवान का रुप होते है, और उनका आदेश का पालन करना, हमारा परम कर्तव्य बनता है, उन्हें भेद-भाव का कोई भावना नही होता है, एक विद्यार्थी का जीवन मे, शिक्षक का महत्वपूर्ण योगदान होता है शिक्षक वैसे होते हैं, जो विद्यार्थी पर ज्यादा ध्यान रखते है, और विद्यार्थी को भी वैसा होना चाहिए, की शिक्षक के हर बातों को, ध्यान से सुनना , समझना चाहिए, एक विद्यार्थी के जीवन मे, शिक्षक का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो अपने ज्ञान, धैर्य और प्यार से , देख-भाल कर उसके पूरे जीवन को, एक मजबूत आकार देते है, इस संसार मे, शिक्षक के पदों को, सबसे अच्छा और आदर्श, पदों के रुप मे, माना जाता है, क्योकिं शिक्षक किसी के, जीवन सवारने मे, निस्वार्थ-भाव से सेवा देते है! परिचय : अंजली कुमारी सैनी शिक्षा : ...
लिविंग रिलेशनशिप
आलेख

लिविंग रिलेशनशिप

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ******************                           मराठी नाटकों की अपनी एक अहमियत होती हैं और उनमें व्यवसायिकता भी भरपूर पायी जाती हैं। मुझे भी मराठी नाटक देखने का बहुत शौक हैं और इसी कड़ी में कुछ दिनों पूर्व एक मराठी नाटक देखने का अवसर प्राप्त हुआ। नाटक का नाम था 'झालं गेलं विसरुन जा' अर्थात जो भी हुआ उसे भूल जाओं। वैसे हिंदी में कहावत भी हैं, 'बीती ताही बिसार दे।' नाटक की समीक्षा करने का कोई विचार मेरे मन में नहीं हैं, परंतु नाटक के विषय की ओर सबका ध्यान जरुर आकर्षित करना चाहूंगा। नाटक का विषय था स्त्री-पुरुषों के अनैतिक शारीरिक संबंध। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि विवाह संस्था हेतु स्थापित सामाजिक नैतिक परम्पराओं और मूल्यों को ध्वस्त करते हुए पत्नी के मित्र के साथ स्थापित अनैतिक शारीरिक संबंधों को पति द्वारा बडी सहजता और सरलता से मान्यता देते हुए स्वीकार करना। यहाँ...
गणित मां पापा का
लघुकथा

गणित मां पापा का

नीलम तोलानी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (रात दस बजे का वक्त सोने की तैयारी) नवल अपनी पत्नी सोनिया का हाथ पकड़कर.. नवल : सोनू तुम बहुत अच्छी हो, तुम्हें पाकर मैं धन्य हो गया। आज तुम ना होती, तो ना मैं बीमार मां को गांव से ला पाता ना वो इतनी जल्दी स्वस्थ हो पाती। घर, नौकरी, मां, सब कुछ कितनी अच्छी तरह संभालती हो तुम। सोनिया : वह मेरी भी तो मां है नवल, क्यों ऐसा बोल रहे हो? नवल : थैंक यू सोनिया!! सोनिया : सुनो एक बात कहनी थी, नवल : बोलो ना प्लीज.. सोनिया : तुम तो जानते हो, मैं अपने मम्मी पापा की इकलौती संतान हूं, पापा के जाने के बाद मम्मी बहुत अकेली हो गई है। फिर उम्र का भी तकाजा है। क्यों ना हम उन्हें यहां ले आए, उनका भी मन लग जाएगा। नवल : सोनू यार! कैसी बात कर रही हो? दामाद के घर जाकर भी कोई रहता है क्या? फिर हमारा रूटीन भी डिस्टर्ब होगा... उन्हें कहना कभी-कभी यहां आ जाया ...
पंछी
कविता

पंछी

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** देखकर हालात कहता, है मेरे मन का अनुभव। नींड का निर्माण होना, है असंभव। देखते हो क्या नहीं तुम, घिर उठी बदली गगन में आंकते हो क्या नहीं तुम, क्षणिक देरी है प्रलय में। बहलिये का सर सधा है, आज इस नन्हें सदन में, जीत होगी क्या हमारी, हो रही शंका हर्दय में। स्वपन का साकार होना, है असंभव, नीड़ का निर्माण होना है असंभव। मिलन के इस मृदु क्षणों में क्यों न पूछू प्रश्न नटवर, घन्य यदि जग पा सके कुछ, शव हमारा प्राण प्रणवर। सुन बहे उदगार सत्वर। मिलन का अभिसार होना है असंभव। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र...
शिक्षकों के सम्मान में ऑनलाइन कवि सम्मेलन सम्पन्न
साहित्यिक

शिक्षकों के सम्मान में ऑनलाइन कवि सम्मेलन सम्पन्न

                                  दिल्ली। साहित्य संगम संस्थान दिल्ली के तत्वाधान में आयोजित शिक्षकों के सम्मान में ०६/०९/२०२० को दोप. १ बजे से गूगल मीट पर कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें आमंत्रित कवियों में पुणे महाराष्ट्र से आद सोनी गौतम जी, बरेली उत्तर प्रदेश से आद डॉ दीपा संजय दीप जी, लखनऊ उत्तर प्रदेश से आद अर्चना वर्मा जी, आजमगढ़ उत्तर प्रदेश से आद जयहिंद सिंह हिंद जी, जबलपुर मध्यप्रदेश से आद छाया सक्सेना जी, भिवानी हरियाणा से आद विनोद वर्मा जी, भिंड मध्यप्रदेश से मनोरमा जैन पाखी जी, मेदनी नगर झारखंड से आद राम प्रवेश पंडित जी की उपस्थित हुए, प्रमोद पाण्डेय जी, तकनीकी समस्या के कारण असम से आद सुचि संदीप सुचिता जी उपस्थित नहीं हो पाये, इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आद तेजराम नायक तेज जी रायगढ़ छत्तीसगढ़, विशिष्ट अतिथि आद डॉ राकेश सक्सेना जी एटा उत्तर प्रदेश कार्यक्रम के अध्यक्ष आद राज...
शराफ़त
ग़ज़ल

शराफ़त

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** रिवायत को शराफ़त से निभाया ही नहीं जाता। उधर मैं भी नहीं जाता, इधर वो भी नहीं आता। उसे मैं सामने पाकर निगाहें फेर लेता हूँ, वही उसको नहीं भाता, वहीं मुझको नहीं भाता। जताता है वही अक़्सर सफ़र में होंसला अपना, कभी कोई मुसाफ़िर जब तलक ठोकर नहीं खाता। किनारे चाहते हैं रोज़ ही मझधार से मिलना, मग़र लहरों का पानी दूर इतना चल नहीं पाता। कभी मिलकर ये सूरज, चाँद तारे बात करते हैं, भला हमसे जमाने का अँधेरा हट नहीं पाता। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रच...
नारी का सम्मान करो
कविता

नारी का सम्मान करो

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ******************** समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को बंदिशों में जकड़ी एक भोली भाली नारी को समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को! तरह-तरह के छल दुनिया में छल से छली गई जीत भरोसा उसका,छली बेंच रहे व्यापारी को समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को! नौ दिन देवी समझें फिर जुल्मों अत्याचार करें मंदिर में प्रतिबंधित देखा है भाग्य की मारी को समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को! जिसका जो भी मन सब कहकर चलते बनते हैं जब तब कड़वे ताने सुनते पाया उस संसारी को समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को! नारी का सम्मान करो,कभी नहीं अपमान करो देख रहा भगवान अत्याचार संग अत्याचारी को! समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को नारी से है देश महान,जिससे बढ़ती देश की शान आंचल में ममता,दया,पलकें अश्कों से भारी को समझ सको तो समझो औरत की लाचारी को! परिचय :- मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू द...
मेरे सपने
कविता

मेरे सपने

डॉ. मिनाक्षी अनुराग डालके मनावर जिला धार (मध्य प्रदेश) ******************** अभी तो मेरे सपनों की बहुत बड़ी उड़ान बाकी है बहुत कुछ पा लिया और बहुत कुछ पाने की ख्वाहिश बाकी है... हर वक्त मन में एक हलचल सी रहती है जैसे सागर में लहरों का शोर अभी और बाकी है कभी-कभी लगे कि बहुत कुछ है जीने के लिए मेरे पास.... लेकिन कभी लगे ऐसा जैसे अभी तो अपनी पहचान बनाना बाकी है... कभी दिल कहता है कि छोड़ दे उम्मीदें लगाना लेकिन कभी लगे ऐसा जैसे अभी तो आसमान से तारे तोड़कर लाना बाकी है... शायद इसीलिए मेरे सपनों की अभी एक और उड़ान बाकी है अभी एक और उड़ान बाकी है परिचय : डाॅ. मिनाक्षी अनुराग डालके निवासी : मनावर जिला धार मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय ...
गूढ़ रहस्य
लघुकथा

गूढ़ रहस्य

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** पापा आप हर बात में अपनी सलाह क्यों देते रहते हैं? आपका अपना ही अलाप बजता रहता है। तभी दूसरा बेटा भी आ गया। पापा हर मामले में अपनी टाँग अड़ाना जरूरी है। शर्मा जी, चुपचाप दोनों बेटों की बातें सुन रहे थे, जो उन्हें किसी शूल की भाँति चुभ गई थी। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा था। अब तो हर रोज का यही काम था। सुबह से ही घर में कलह शुरू हो जाता था। शर्मा जी ने बड़े जतन से घर की एक-एक चीज जोड़ी थी। वह किस तरह उन्हें बर्बाद होते देख सकते थे। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए उन्होंने अपनी सारी जमा-पूँजी खर्च कर दी थी। पत्नी के साथ मिलकर उन्होंने अपनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह समय पर पूरा किया था। पर उनसे कहीं ना कहीं भारी चूक हो गई थी। जो आज अपने ही परिवार में उन्हें उपेक्षा झेलनी पड़ रही थी। रोज की तरह, वह सुबह पार्क की तरफ चल पड़े। गेट पर ह...
शिक्षकों से मिला हमें
कविता

शिक्षकों से मिला हमें

संजय जैन मुंबई ******************** दिया मुझे शिक्षकों ने, हर समय बहुत ज्ञान। तभी तो पढ़ लिखकर, कुछ बन पाया हूँ। इसलिए मेरी दिल में, श्रध्दा के भाव रहते है। और शिक्षकों को मातपिता से बढ़ाकर उन्हें सम्मना देता हूँ। जो कुछ भी हूँ मैं आज, उन्ही के कारण बन सका। इसलिए उनके चरणों में, शीश अपना झुकता हूँ।। शिक्षा का जीवन में लोगों, बहुत ही महत्त्व होता है। जो इससे वंचित रहता है जीवन उनका अधूरा होता है। शिक्षा को कोई न बाट और न छिन सकता है। जीवन का ये सबसे अनमोल रत्न जो होता है। धन दौलत तो आती और जाती रहती है। पर ज्ञान हमारा संग देता जिंदगीकी अंतिम सांसों तक।। जितना तुम पूजते अपने मात पिता को। उतना ही गुरुओं को भी अपने दिल से पूजो तुम। देकर दोनों को तुम आदर, एक तराजू में तौलो तुम। दोनों ही आधार स्तंम्भ है, तुम्हारे इस जीवन के। जो हर पल हर समय, काम तुम्हारे आते है। तभी तो मातपिता और, शिक्षक दिवस...
विरह-वेदना
कविता

विरह-वेदना

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** आतुर विरह की स्वर बून्दो में भर प्रियतम की अधरों पर बरस। हे ऋतुओ की रानी विरह वेदना को कर सरस पावस की अगणितकण बरस-बरस। प्रिया है ब्याकुल-आतुर विरह की वेदना बून्दो में भर तू प्रियतम की सूखी अधरों पर बरस। कोयल की कुक-चातक की पिऊ-पिऊ आवाज श्रावण की मास विरह -वेदना की। असह्य आग तू कर सरस विरह की वेदना कर सरस। पावस की कण तू बरस बरस। प्रिया की भीगी कपोलो बिंदी सी बून्दो की चमक। भीगी गात-अपलक नयन विरह की वेदना में मगन। प्रिया कर रही- अपनी प्रियतम की मिलन की जतन। परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौल...
अरे राम, अरे राम राम !!
कविता

अरे राम, अरे राम राम !!

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** मुसकानों के ऐसे काम ! अरे राम, अरे राम राम !! मौसम की हृष्ट-पुष्ट बांँहों की अंँगडा़ई, बूंद-बूंद यौवन में मादकता सरसाई; टेर पपीहे की अविराम! अरे राम! अरे राम राम !! नदियों के कूल- कछारों में, तटबन्धों में, गदराई पुरवा के बदराये छन्दों में व्याकुल अभिसारी आयाम ! अरे राम ! अरे राम राम !! कलियों की मदिर चाह करे नये-नये यत्न, गलियों में गूंज रहे भंँवरों के यक्षप्रश्न; प्रणय-पत्रिकाओं के नाम ! अरे राम ! अरे राम राम !! परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविता...