मन ठहरा मन बहता
शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी, बालोद, छत्तीसगढ़
********************
टिक न सके ये क्षण भर,
मन चंचल मन बावरा,
राममय शांत कभी,
कभी रासमय सांवरा,
बहे तो सलिल सरिता-
जो उद्यत मिलने सागर को,
स्वच्छन्दता सा वेग धारे,
तोड़ बंधनों के गागर को,
पर संघर्षो में चंचलता,
व्याकुलता में हो परणीत,
खो देता विस्तार स्वयं का,
भूलकर जीवन के गीत,
बहता मन ठहर जाता ,
अवसाद लिए, प्रमाद लिए,
घिर जाता निराशाओं में,
अंतर्द्वद्व का नाद लिए,
सुख-दुख कुछ नही रे बंदे,
मन की गति, मन का कहना,
जीवन चलता रहता पल-पल,
तुम धारा संग सीखो बहना,
मन आतम मिले तो राह चले ईश्वर की,
न मिले तो ये कहता,
भाव उद्दीग्नो में बहे चले,
रे मन ठहरा रे मन बहता,
परिचय :- शैलेन्द्र चेलक
निवासी : पेंडरवानी, बालोद, छत्तीसगढ़
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने ...

























