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बेग से मिली मन की विषालता
कहानी

बेग से मिली मन की विषालता

डॉ. सुरेखा भारती *************** दरवाजे के बरामदे में अपने जूते निकालकर, वह बैठक वाले कमरे में ही सौफे पर दोनों पैर पसार कर लेट गया। लेटे-लेटे ही उसने अपने टाॅय को खोलकर एक तरफ पटक दिया। आँखें बंद की और आवाज दी। नीत....नीता ऽ जरा पानी लाना.... नीता हाथ में ग्लास थामे उसी और आ रही थी लो...... मुझे पता था आप आ गए है, मैंने पैरों की आहट जो सुन ली थी। यह कह कर उसने ग्लास रोहित के हाथों में थमा दिया। रोहित उस की ओर देख कर बोला - ‘आज मैें इतना थक गया हूँ,...... दिल्ली वाले बाॅस जो आए थे, उन्हें शहर में शापिंग करवानी थी और किसी अच्छे रेस्टारेंट में जाकर लंच करवाना था। हाँ बिल की पेमन्ट तो मिल जाएगी, पर उनकी बातें सुनते-सुनते मैं बहुत उब गया हूँ....।, रितेश को कहा था की तुम बाॅस के साथ चले जाओ...। तो सुना.. उसने भी बहाना बना दिया - ‘मेरी तबीयत ठीक नहीं हेै, वैसे भी तुम्हे करना क्या है, उनके साथ ...
जुदा कौन करेगा
कविता

जुदा कौन करेगा

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** हकदार बहुत हैं तेरे पर सच्चा हक अदा कौन करेगा महफ़िलो में खोए होंगे सब, तब याद सदा कौन करेगा! जान-जान कहने वाले, बेजान मिलेंगे आशिक बहुतेरे, जरूरत पड़ने पर सोचो, तुमपे जान फिदा कौन करेगा! साथ तुम्हारे गुजर रहे जो वो पल अनमोल ख़ज़ाने मेरे हम दोनों एक बनेंगे तब फिर बोलो जुदा कौन करेगा! जो भी हों मसले बड़े सब बेहिचक कहा करो मुझसे, यदि तुम ही खामोश रही तब सोचो निदा कौन करेगा! तेरे हुस्न की हरारत से ही, मेरी धड़कनें हरकत में हैं, इतने प्यारे महबूब को बताओ, अलबिदा कौन करेगा!   परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आक...
ज़ख्म
हिन्दी शायरी

ज़ख्म

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** ज़ख्म सबके बराबर हैं, तेरे हों या मेरे हों, रेशमी ताकत भी यहां, मजबूर है बताना चाहती थी। चारों तरफ खोफ़ है,सन्नाटा है पर, यकीनन बिखरे हुए पत्तों को जोड़ना चाहती थी। मां आसुओं की पहचान रखती है, दो दिन पहले भी बहे हों तो जान लेती है। वही है जो जिंदगी के हर दर्द जानती है। हर रिश्ते तराशने के गुर जानती है। कोई दौलतमंद नहीं है, और न कोई रंक है। सब सिकंदर हैं यहां वो ये बताना चाहती थी।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका सृजन का अनुवाद, रस-रहस्य, बिम्ब (शोध पत्र), मालवा के लघु कथाकारो पर शोध कार्य, कविता, ऐंकर, लेख, लघुकथा, लेखन आदि का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी ...
मीरा
कविता

मीरा

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ******************** वो छोटी सी मीरा, वो न्यारी सी मीरा जग की दुलारी, माँ की प्यारी सी मीरा! वंशीधर के प्रीत में उलझी सी मीरा जीवन के रहस्यों से सुलझी सी मीरा! सत्य पथ से कभी ना भागी थी मीरा विघ्नों में भी धैर्य ना त्यागी थी मीरा! बेरहम वक़्त की ठेस, सहती थी मीरा रोती भले पर ना कुछ कहती थी मीरा! ना मिले मोहन तो स्वयं छल गई मीरा कृष्ण भक्ति में ही देखो ढल गई मीरा! हंसकर हलाहल विषों का, पी गई मीरा राणा ने ढाए जुल्म फिर भी जी गई मीरा! निज उर की वेदना भी छिपाती थी मीरा आठो पहर कान्हा-कान्हा गाती थी मीरा! . परिचय :- मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने ह...
दर्द ही जीत की जननी
कविता

दर्द ही जीत की जननी

दीपक अनंत राव "अंशुमान" केरला ******************** दर्द एक दुआ है दर्द एक ऐलान है दर्द दिल की छ्वी दर्द से ही दुनिया पनपती है जब दुनिया में एक बच्चा जन्म लेता है वो रोता है कराहता है चिल्लात्ता है दर्द का अनुभव उसे महसूसता है आहिस्ता-आहिस्ता वो चैन का सास भी अपनाता है माँ के दर्द की दुआ है वो कटपुतली सौ गुना ऊर्जा जो उसे खुदा ने दी थी वो देकर, सहकर दर्द के साथ वो अपने लाडले को जन्म देती है बेहद खुशी से उसे टटोलता है॥ आदमी की शुरुवात भी दर्द से आदमी की पहचान भी दर्द से साया जैसे उनके साथ चलते-चलते दर्द के साथ उन्हें मिट्टी से मिला देती हैं काश दुनिया में दर्द न होते तो कितना सूना लगेगा हमारी ज़िन्दगी दर्द से खुशी का मतलब हम समझते दर्द से ही किसी की राहें बनती है दर्द से ललकारें बनते है दर्द से ही आज़ादी का मंत्र निकालता है दर्द से ही कोई आशिक बनता ...
चौखट पर बैठी मेरी माँ
कविता

चौखट पर बैठी मेरी माँ

कृष्ण शर्मा सीहोर म.प्र. ******************** चौखट पर बैठी मेरी माँ कर रही है इंतजार मेरा, बॉर्डर से आये उसका बेटा, यही सोच के रास्ते निहार रही माँ। कॉटन की साड़ी लाऊंगा तेरे लिए माँ यही कहकर निकला था घर से, सब लोगो से यही बोल बोल कर, खुश हो रही है मेरी माँ। चौखट पर बैठी मेरी माँ। लायेगा इमारती, जलेबी मीठे में, खिलायेगा वो अपनों हाथो से, उसी मीठे की आश में, चौखट पर बैठी ही मेरी माँ। रातो में बार-बार उठ बैठ जाती है, किबाड़ की आहट सुनते ही, खोलकर देखती हे किबाड़ फिर से, दुःख में जाकर फिर लेट जाती है माँ। चौखट पर बैठी मेरी माँ। एक बहु भी लायेगा केहता था वो, बहु की नज़र उतरने के लिए, आश में आज भी बैठी है मेरी माँ। बापू से कहता था जीत लाऊंगा मैडल सारे सजा लेना छाती पर तुम, गर्व से करना मेरी बातें, हर सपना पूरा कर जाऊंगा। इन सपनो के सपने लिए आज भी चौखट पर बैठी है मेरी माँ। . ...
बाँटो विश्व प्रेम
कविता

बाँटो विश्व प्रेम

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** इतना बाँटो प्यार, प्यार मे सारा जीवन लय हो। आज घृणा की नहीं देश मे विश्व प्रेम की जय हो। बिना प्यार प्यासा हर पनघट, नयन नयन मे आज उदासी। आंगन आंगन मे सूनापन प्यार हुआ जब से सन्यासी। रुठ गया सुख चैन दिलो का, यह दुनिया शमशान हो गई। एक प्यार की वर्षा के बिन, सब धरती वीरान हो गई। कटुता रहे न शेष कहीं भी इतना तो निश्चय हो। आज घृणा की .... जाने क्या तूफान आ गया आज सभी मे स्वार्थ समाया। कुछ ऐसा ठहराव आ गया, अपना ही हो गया पराया। दुखियों की सेवा में तेरा, दया भाव अक्षय हो। विश्व प्रेम की जय हो। मानव का कल्याण करों यदि मानव का जन्म पाया। मानवता का मान घटाया, उसनें जीवन व्यर्थ गँवाया अभी भूल मान कर बंदे, आज हर्द्रय मे पीर जगाओं। जितना जग पीड़ित है उससे बढ़कर प्यार लुटाओं। हर दिल प्यार भरा हो, अब तो हर दिल ममता मय हो। आज घृणा की नहीं देश में विश्व...
परिंदा हूँ मैं
कविता

परिंदा हूँ मैं

विजय पाण्डेय महूँ जिला इंदौर ******************** रूठना मनाना मुझें, आता नहीं। किसी को कभी मैं, सताता नही। वक्त का मारा, परिंदा हूँ मैं। उड़ना भी चाहूँ मैं , उड़ पाता नहीं। जिंदगी के रन्ज गम, सह पाता नहीं। रूठना मनाना मुझें, आता नहीं। गैरों के घर मेरा, आशियाना बना हैं। कब टूट जाए ये, मैं जताता नहीं। जो खुद ही तपन में, जलता रहा हैं। वो और का आशिया जलाता नहीं रूठना मनाना मुझें, आता नहीं। किसी को कभी मैं, सताता नहीं। धर्म भी कोई मैं, निभाता नहीं। मैं आरति बंदन, गाता नही। मैं मन्दिर,मस्जिद, बताता नहीं। किसी को कभी मैं, सताता नहीं। . परिचय :- विजय पाण्डेय पिता- श्री रामलखन पाण्डेय माता- मानवती पाण्डेय जन्म तारीख : १६/०६/१९८४ जन्म स्थान : लदबद बाणसागर शहडोल, मध्यप्रदेश वर्तमान निवास : महूगाँव महू जिला इंदौर शिक्षा : बी.ए व्यवसाय : नौकरी लयुगांग इंडिया पीथमपुर आप भी अपनी कविताए...
विश्व-वेदना
कविता

विश्व-वेदना

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** फैल गई है पूरे विश्व मे कोरोना वायरस महामारी। क्षण क्षण पल पल कोहराम मची है महाविनाश की आहट भारी मानवता खतरे में है यह वायरस है अति प्रलयंकारी ज्ञान विज्ञान में जो चढे बढे है उनकी भी नही चलती होशियारी। फैल चुकी है पूरे विश्व मे कोरोना वायरस महामारी छुआछूत से फैल रही है मानवता पर यह संकट भारी चीन राष्ट्र की कुचक्र चाल से सिसक रही मानवता सारी राष्ट्र धर्म पुकार रही है यह समय अति है विस्यमकारी विश्व गुरु फिर राष्ट्र बनेगा जन जन का उद्धार करेगा अध्यात्म योग संबल बनेगा सत्य सनातन फिर उभरेगा मानवता का दर्द मिटेगा फिर से सुख शांति बढ़ेगा वायरस का अब अन्त निकट है वह छन आयगा मंगलकारी . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा ...
स्याणे री पिलसण
आंचलिक बोली

स्याणे री पिलसण

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** देखि के न्याणेयां शोर मचाया, बोले ! डाकिया आया-डाकिया आया। स्याणे सोचेया .... जरूर मेरी पिलसण ल्याया, डाकिये चिट्ठी हाथ्थो थमाई, स्याणे रे पोपल़े मुंए रौणक आई। बोल्या, सुकर आ, मेरी पिलसण आई, डाकिये ने समज्याया....बाबा ! चिट्ठी बंको री.... आज्जां तेरी पिलसल नी आई। सुणि के स्याणी,बऊ, पाऊ, स्याणे रे बक्खो गए आई। बऊए चिट्ठी पड़ी के सुणाई.... बोली --बंको ते करिसी कारड, तिन्न लख लौन आ लऊरा। ना मूल़ ना ब्याज ...चार साल ते एक्क बी पैसा नींयां टाउरा। ऐते करिके लीगल नोटस आ आउरा, सुणि के स्याणे रा सिर चकराया, बोल्या--देखो लोको ! ल्वादा री करतूत, सारे पैसे नसेयां च फुक्कै, तेबेई करजे रा सिरो परो चड़ेया पूत। लाम्बा साअ लेई स्याणा ग्लाया,,,,, मैं सोचेया बुढ़ापा पिलसण आई, पर ये थी नलैक पाऊए री कमाई।। परिचय :-...
एक दिन वो मुस्कायेगी
कविता

एक दिन वो मुस्कायेगी

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हाँ! हूँ जानता मैं की, वो फिर से मुस्कायेगी, खिल उठेंगे, अधर कमल, नेह के सुर सजाएँगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... अलसाई - सी भोर में, रश्मि चुनर लहरायेगी, तज खुमार, जलज खिले, वात अतर बिखरायेगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... भृमर टटोले कुसुमरज, तित्तरी रँग उड़ाएगी, कोकिल कुहू के लता लता, पिहू पिहू राग सुनायेगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... गोधूली रज से भीगी संझा, जब चितचोर सँग निहारेगी, निशि पिछौरी तब उर्वी ओढ़े मन ही मन जब लजाएँगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... उजयारी में ताके, पी जब, जा वलय बंध समाएगी, हिय में उठे हिलोरें जब, नयन कमल कुम्हलायेगी. हाँ! तब तो वो मुस्कायेगी... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित औ...
मनाएँ कैसे हम त्योहार
कविता

मनाएँ कैसे हम त्योहार

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** देश के ऊपर मज़हब हाबी मचा है हाहाकर भारत माँ मायूस मनाएँ कैसे हम त्योहार पशुओं से भी बदतर अक्सर हो जाता इंसान मिथ्या मज़हब की घुट्टी पी बन जाता शैतान यक्ष प्रश्न है यही देश में पर देगा कौन जवाब खून खराबा मचा सड़क पर गुलशन हुआ उज़ार मनायें कैसे........ संस्कृतियों में क्यों ऐसा संघर्ष यहाँ पर होता है मठाधीश मस्ती करते हैं आम आदमी रोता है दिल्ली के दंगो ने ले ली जाने कितनी जान पुलिस नपुंसक बनी रही था शासन भी लाचार मनायें कैसे...... क़ौमी एकता गंगा जमुनी का नारा बेमानी है दिल में लोंग़ो के बसती है चाल अगर शैतानी है जाति पाँति का भेद मिटे लाओ ऐसा क़ानून मज़हब की दीवार गिरा दो जोड़ो दिल के तार मनायें कैसे हम त्यौहार..... . परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभा...
समय रास्ता दिखायेगा
कविता

समय रास्ता दिखायेगा

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** समय रास्ता दिखायेगा साँझ ढलती है उसे ढलने दो, नियति छलती है तुम्हें छलने दो। बुझते दीपों और टूटे तारों को सुबह का ख्वाब समझकर दिलों सें पलने दो। चलने दो अपनी राह अपने सपनों को, काँटे बनेंगे फूल इक दिन दर्द खुद मिट जायेगा। ये समय ही नयी सुबह का रास्ता दिखायेगा। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न सीमेंट संस्थानों से समबद्ध हैं। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताए...
प्रियेतमा
कविता

प्रियेतमा

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** मन की निर्मल पावन उज्जवल विमल प्रेम रस पाती कों प्रियेतमा तुम भूल ना जाना अपनें जीवन सांथी कों जेसे नभ चर गगन बिना मृत जलचर अमृत नीर बिना तेसे तुम बिन मन तड़फत हैं प्रांण जाए नही पीर बिना तुम रूठी तों सबकुछ रूठा कलम सुहाय ना पाती कों प्रियेतमा तुम भूल ना जाना अपनें जीवन सांथी कों जान सका ना मैं भी तुमको तुम भी मुझको समझ ना पाई ना जाने क्यों प्रेम विवश हों मैने तुम संग प्रीत लगाई अपनें मन की विरह आग में झोंक रहा हूँ बाती कों प्रियेतमा तुम भूल ना जाना अपनें जीवन सांथी कों मन के घौर अंधेरों में तुम दिव्य रोशनी लायी थी जो कुटिया थी टूटी फूटी तुमने महल बनाई थी अब तुम मुझसे क्यों रूठी हों प्रति उत्तर दो पाती कों प्रियेतमा तुम भूल ना जाना अपनें जीवन सांथी कों . परिचय :- विमल राव सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव अ.भा.वंशावली संरक्...
कैलाश यात्रा
लघुकथा

कैलाश यात्रा

डॉ . भावना सावलिया हरमडिया (गुजरात) ******************** गाय दुहने के बाद माँ चिराग को आवाज देती हैं... बेटा, शिव के अभिषेक का दूध तैयार है, अरे हाँ, आज इक्यावन रूपये लेते जाना, शिव के चरणों में अर्पण कर देना। चिराग - जी मम्मी और कुछ ? बस भोलेनाथ सबको कुशल रखें। चिराग रोज मंदिर न जाकर अभिषेक का दूध एक वृद्धा बुढ़िया को पिलाके आशीर्वाद प्राप्त करता था। आज दूध के साथ फल लेकर गया था। पहली बार सोई हुई बुढ़िया को जगाकर फल और दूध का नास्ता खिलाके बहुत खुश था। शायद बुढ़िया का वह आखिर दिन होगा। शाम को वह कैलाश सिधार जाती है। दूसरे दिन माँ चिराग को शिव के अभिषेक के लिए पुकारती है तो वह कहता है... "आज भोलेनाथ मंदिर में नहीं है, कल से कैलास यात्रा के लिए गये हैं।" . परिचय :- डॉ . भावना नानजीभाई सावलिया माता : वनिता बहन नानजीभाई सावलिया पिता : नानजीभाई टपुभाई सावलिया जन्म तिथि : ३ ...
कुछ लिख रही हूँ
लघुकथा

कुछ लिख रही हूँ

डॉ. अलका पांडेय मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** पति थका हारा आफिस से आता है पत्नि को आवाज़ देता है... सोनम ज़रा एक गिलास पानी और चाय देना आज बहुत थक गया हूँ, सर दर्द कर रहा है, चाय दे कर थोड़ा सा बाम सर में मल दो थोडा सो जाऊँगा तो आराम हो जायेगा। सोनम मैं कुछ लिख रही हूँ। आप पानी लेकर पी लो मैं बस यह लिख कर आप को चाय बना कर लाती हूँ फिर बाम लगा कर सर दबा दूंगी। पति जी पानी लेकर पी लेते हैं और कमरे में आकर कपडे बदल कर हाथ मुँह धोकर भगवान को अगरबत्ती भी जला देते है पर सोनम चाय लेकर नहीं आती। वो फिर आवाज़ देते है क्या हुआ चाय नहीं बनी... अरे बना रही हूँ, ला रही हूँ आप आराम करो ला रही हूँ... काफ़ी देर बात सोनम चाय लेकर आती है तो पति देव पूछ ही बैठते हैं... आप सारा दिन क्या लिंखती रहती है क्या कोई किताब लिख रही है? सोनम नहीं किताब नहीं सारा दिन मुझे फ़ुरसत नहीं मिलती है, फ़ेस बुक, वाट...
जिन्दगी
कविता

जिन्दगी

सीमा रानी मिश्रा हिसार, (हरियाणा) ******************** जिन्दगी की उलझनों को सुलझाने की कोषिष न करो उलझनें उलझती चली जाएँगी रहने दो उसे उसी हाल में वक्त के झोंके से देखो खुद-ब-खुद सुलझ जाएँगी। वफा की उम्मीद न करो बेवफाओं की इस दुनिया में वफा करने की कोशिश करो किसी के अँधेरे जीवन में खुशियों की चाँदनी सब ओर छिटक जाएगी। गुज़र गए जो पल उस पर क्यों करे विमर्ष? न बीते पल का शोक न कल का हर्श। ऐसा नहीं की रोनेवालों में तुम अकेले हो छुपकर, घुटकर जीनेवालों के लगे यहाँ मेले हैं। तुम्हारे समक्ष इस जीवन से जुड़े विकल्प ही विकल्प हैं निश्चित करो तुम्हें पूर्ण करना कौन-सा संकल्प है। हाँ! अपने पथ-प्रदर्शक बनो तुम स्वयं ही यह आशा न करो कोई और तुम्हें मंज़िल तक पहुँचाएगा। . परिचय :- सीमा रानी मिश्रा पति : डाॅ. संतोष कुमार मिश्रा पता : हिसार, (हरियाणा) पद : शिक्षिका आप भी अपनी कविताएं...
कविता कवि की साधना है,
कविता

कविता कवि की साधना है,

पं. प्रशान्त कुमार "पी.के." हरदोई (उत्तर प्रदेश) ******************** कविता कवि की साधना है, वीणापाणी की वन्दना है।। कविता ही कवि की आशा है, कविता कवि की परिभाषा है। कविता है कवि की बोलचाल, कविता है निज कवि की ढाल। कविता है कवि के मन की पीड़ा, कविता सच बोलने का है बीड़ा। कविता वेदना कवि के मन की, संवेदना है कवि के निज मन की। कविता माध्यम है भावों का, पल पल हर पल संभावों की।। कविता प्रेरणा कल्पना है, निर्माण की हर परिकल्पना है।। कविता विश्वास है कवियों का, कविता आभास है कवियों का।। कविता है परिश्रम कवियों का, कविता परिणाम है कवियों का।। कविता में कवियों का भाव सार। कवि के इसमें हैं सद्विचार।। कविता है जन्मी सर्वप्रथम, कविता सच कह दे ले न दम। कविता को सहारा कवि ने दिया, कविता ने कवि को है दिया।। कविता ही कवि की पूजा है, साथी न शिवा कोई दूजा है। कविता कवि के हैं अश्रुपात, कविता...
वो नव प्रभात फिर आएगा
कविता

वो नव प्रभात फिर आएगा

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** जब फिर से नई सुबह होगी बच्चे स्कूल को जाएंगे फिर से जिंदगी दौड़ेगी और बाजारों में फिर रौनक होगी लेकिन क्या वो अनजाना भय न होगा क्या फिर से पहले सा सब होगा मन की उलझन क्या खत्म होगी आपस की दूरी कैसे कम होगी???? इसका हल भी हमें ही पाना है खुद को मजबूत बनाना है विश्वास की नई बेल पर उम्मीदों के फूल उगाना है चल उठ मुसाफिर जीवन की नई राह पकड़,,,, उस नव प्रभात की बेला का पूरे दिल से तू स्वागत कर चेहरे पर एक मुस्कान लिये नव पथ पर तू आगे बढ़........ जो बीत गया उसे भूलकर अपने आप को सशक्त कर वर्तमान को स्वीकार कर इस नव प्रभात का स्वागत कर,,, स्वागत कर...... परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप...
कोरोना से कर्मयुद्ध
कविता

कोरोना से कर्मयुद्ध

मुकेश सिंह राँची (झारखंड) ******************** माना हालात अभी प्रतिकूल है, रास्तों पर बिछे महामारी के शूल हैं, घर पर बैठे-बैठे रिश्तों पर जम गई धूल है, पर ये युद्धकाल है, तू इसमें अवरोध न डाल, तू योद्धा है, चिंता न कर, होगी जीत न होंगे विफल, तू बस अपना कर्म कर, घर से बाहर न निकल। माना आशाओं का सूरज डूबा, अंधकार का रेला है, ना डर अँधेरी रात से तू, आने वाली प्रभात की बेला है, तुझसे बँधी हैं उम्मीदें सबकी, सोच मत तू अकेला है, तू खुद अपना विहान बन, कर दे दस अँधेरे को विफल, तू बस अपना कर्म कर, घर से बाहर न निकल। इस विपदा से जीत बस एकमात्र तेरा लक्ष्य हो, संकल्प कर, अपने मन का धीरज तू कभी न खो, रण छोड़ने वाले होते हैं कायर, तू तो परमवीर है, मास्क, सेनिटाइजर, हाथों की धुलाई और सामाजिक दूरी, ये तुम्हारे तरकश के चार तीर हैं, युद्ध कर तू है सबल, तू बस अपना कर्म कर, घर से बाहर न निकल। हम...
घर
कविता

घर

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** बचपन की मस्ती की यादों का घर। दादा के पैरो की जन्नत हैं ये घर।। कुछ वक्त मिला हैं अनजाने में। बीता दो ये वक्त, इतिहासो में ।। वर्षो की कशमकश में क्या पाया क्या खोया। इसमें अपनो की पहचान भर दो।। सीख लो हर पहलू जीवन का। जहाँ भूल वही से सुधार करो।। घर में उल्लास, उमंग, उत्साह भर दो। कुछ दिन साथ घर में ही रह लो।। कुछ दिन घर में उत्सव समझ लो। कुटिया हो, या हो महल ---------।। जमकर इसमें रंग भर दो। अपनी अलग पहचान कर दो।। अधरों पर मुस्कान भर दो। घर को अपने रोशन कर दो।। . परिचय :- नाम : गोरधन भटनागर निवासी : खारडा जिला-पाली (राजस्थान) जन्म तारीख : १५/०९/१९९७ पिता : खेतारामजी माता : सीता देवी स्नातक : जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था भाग -०३
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था भाग -०३

लेखक विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** रिश्ते आदमी को जन्म से ही अपने आप मिल जाते है। भले ही रिश्तों का कोई आकार प्रकार ना हो, परन्तु रिश्ते धीरे-धीरे अपने आप जुड़ते जाते है और श्रृंखलाबद्ध हो जाते हैI अटूट बंधनों में बंध जाते हैं। कुछ रिश्ते अचानक कोई लॉटरी खुल जाए ऐसे भाग्योदय जैसे उस लॉटरी में खुले इनाम की तरह मिल जाते है। जैसे परिवार में किसी की शादी तय होती है और वरमाला पड़ते ही अचानक कई सारे रिश्ते जुड़ जाते है। कुछ रिश्ते पुष्प जैसे होते है, खिलते जाते है, बहार लाते रहते है, महकते जाते है और हमेशा खुशबूं ही बिखेरते रहते है। गुलाब की पंखुड़ियों में अक्षरों से लिपट जाते है। कुछ रिश्ते पत्थर जैसे जडवत रहते है। अक्षरशः गले में पत्थरों की माला जैसे बोझा बन लटकते रहते है और उन्हें जबरन ढोते रहना पड़ता है। कुछ रिश्ते मन में चिडचिडाहट पैदा करने जैसे होते है। बिलकुल हैरान परे...
दिखता हैं ख़ौफ़
ग़ज़ल

दिखता हैं ख़ौफ़

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिखता हैं ख़ौफ़ कितना, आज फिजाओं में, घोला जहर हैं किसने, बहती इन हवाओँ में... दूर से ही वो पूछते है, खैरियत कि कैसे हो? हैं झिझक ये के सी, हमसे मिलने मिलाने में... खुदगर्जी कहे उनकी, या समझें की बेबसी, दो कदम सँग ना आये, यु रिवाज निभाने में... हर शख्स आज हैं डालें, नकाब सा चेहरे पे, हया इतनी कब से हैं आईं, बेहया जमाने मे... इब्तिदा-ए-इश्क़ ये, मुक़ाम बाकी हैं "निर्मल", दम भर, जा गुजर, ना ज़ोर बेकस जमाने मे... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपन...
सत्य
कविता

सत्य

डॉ. स्वाति सिंह इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक धोबी के प्रश्न से, सीता मैली हो नहीं सकती। किसी के मन के मैल को सीता, धो नहीं सकती। सीता सत्य है, सीता सत है, विश्वास यह, खो नहीं सकती। सीता राम है, राममय है, वर्चस्व अपना यह खो नही सकती। सलाखों के अंदर गैलेलीयो को रखने से पृथ्वी का आकार बदल नहीं सकता, पृथ्वी गोल है, पृथ्वी गोल है, इसमें कुछ बदल हो नहीं सकता। सूली पर चढ़ाने से यीशु का, ईश कम नहीं हो सकता। मानव का मसीहा अमर है, गौरव, उसका कम हो नहीं सकता। यहां तो तोहमत से महरूम नहीं न युसुफ, न मरियमl वक़्त का तकाज़ा है बाकी कुछ नहीं। सत्य, सत्य है अंधेरा होने से, उजाला उसका, कम हो नहीं सकता। धुंध में कुंद हो नहीं सकताl सत्य परेशान हो सकता है, पराजित हो नहीं सकता। . परिचय :- डॉ. स्वाति सिंह निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी विभाग) सें...
जला दिए हैं
कविता

जला दिए हैं

एम एल रंगी पाली राजस्थान ******************** जला दिए हैं ९ दिये ठीक रात ९ बजे ९ मिनिट तक, हमने सोचा था की भाग जायगा कोरोना, जैसे भाग जाते है गधे के सिर से सिंग ...!! भागा ही नही वो तो अभी भी है कायम, गलती से भी अब यारो मत बतियाना, और मत बैठना किसी के भी ढिग ..!! रहना होगा अभी हमको घरों में ही, त्रासदी भयंकर है भारी,कर दी अगर, जरा सी चूक तो लग जायँगे लाशो के ढिंग .!! वैर-भाव को छोड़ो अब तो हे धर्मधुरंधरो, देश बचा लो अब तो, इंसानियत को धारो, तुम्हारा तो कुछ भी गया न फिटकरी न हींग .!! लानत है, जिल्लत है, चायना वालो तुम पर, फैला दी पूरे विश्व मे ये कैसी महामारी, हाय लगेगी तुम्हे और मरेंगे तुम्हारे भी जिंग-पिंग .!! तुम क्या समझो वायरस हमला करके, पल में बन जाउंगा विश्व - किंग .!! इस मुगालते में मत रहना भूलकर भी, खोल त्रिनेत्र जाग गया अगर इस सृष्टी...