बेग से मिली मन की विषालता
डॉ. सुरेखा भारती
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दरवाजे के बरामदे में अपने जूते निकालकर, वह बैठक वाले कमरे में ही सौफे पर दोनों पैर पसार कर लेट गया। लेटे-लेटे ही उसने अपने टाॅय को खोलकर एक तरफ पटक दिया। आँखें बंद की और आवाज दी।
नीत....नीता ऽ जरा पानी लाना....
नीता हाथ में ग्लास थामे उसी और आ रही थी लो...... मुझे पता था आप आ गए है, मैंने पैरों की आहट जो सुन ली थी। यह कह कर उसने ग्लास रोहित के हाथों में थमा दिया। रोहित उस की ओर देख कर बोला - ‘आज मैें इतना थक गया हूँ,...... दिल्ली वाले बाॅस जो आए थे, उन्हें शहर में शापिंग करवानी थी और किसी अच्छे रेस्टारेंट में जाकर लंच करवाना था। हाँ बिल की पेमन्ट तो मिल जाएगी, पर उनकी बातें सुनते-सुनते मैं बहुत उब गया हूँ....।, रितेश को कहा था की तुम बाॅस के साथ चले जाओ...। तो सुना.. उसने भी बहाना बना दिया - ‘मेरी तबीयत ठीक नहीं हेै, वैसे भी तुम्हे करना क्या है, उनके साथ ...
























