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इंतजार
कविता

इंतजार

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मुझे पता है बेकार है इंतजार तेरा, अब ये भी ना करूं तो क्या करूं। मुझे पता है दोस्त है तू मेरा, तेरी दोस्ती का एहसास ना करूं तो क्या करूं।। मुझे पता है प्यार है तू किसी और का, तेरे प्यार का इंतजार ना करूं तो क्या करूं। मुझे पता है दोस्त है दोस्ती है मेरी, इस वफा का इंतजार ना करूं तो क्या करूं। मुझे पता है ये सिर्फ एहसास है मेरा, इस तन्हाई में तेरा इंतजार ना करूं तो क्या करूं। मुझे पता है तू किसी और की अमानत है नहीं मिल सकता इस जन्म में मुझे, अगले जन्म की दुआओं में तेरा इंतजार ना करूं तो क्या करूं। मुझे चाहने से पहले आजमाने से पहले कुछ कहने से पहले दूरियां बना ली मुझसे, अब इन दूरियों का गम भी ना करूं तो क्या करूं। मुझे पता है बेकार है इंतजार तेरा, अब ये भी ना करूं तो क्या करूं।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा साहित्यिक ...
इंसान बड़ा बन गया हैं
कविता

इंसान बड़ा बन गया हैं

मारोती गंगासागरे नांदेड (महाराष्ट्र) ******************** शोनो-शौकत और पैसों से इंसान सुधर गया है उतना ही वह वह अपने-अपनो से दूर गया है इंसान आज बड़ा बन गया है भूल गया सब रिश्तें-नाते छोड़ दिया उसने देहात जितना वह आगे बड़ा गया है उतना ही इंसानियत में नीचे गिर गया है इंसान आज बड़ा गया है नीति छोड़कर अनीति अपनानी हैसियत से ज्यादा की कमाई माता-पिता को छोड़ दिया है अरे ईसने तो सच्ची दौलत ठुकरायाँ है इसलिए तो आज इंसान बड़ा गया है खुदको छोड़कर मोबाइल निहारता है आज के दौर में इंसान मशीन बन गया है रात -दिन मेहनत करके भूखा सो जाता है इसलिए तो मैं कहता हूँ कि इंसान आज बड़ा बन गया है . परिचय :- मारोती गंगासागरे निवासी - नांदेड महाराष्ट्र आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं,...
बेटियाँ
कविता

बेटियाँ

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** बेटियाँ घर की रौनक है बेटियाँ घर की शान है जिस घर में बेटी नहीं वो घर बहुत सुनसान है फूलों की खुशबू है सँझा का दीपक है जिनके घर में बेटी नहीं वो पिता बहुत महान है बेटी दो कुल की जननी बेटी माँ की परछाईं जिस घर की बेटी करे पढ़ाई वो घर जग में नाम कमाए बेटी को पढ़ा लिखा कर देश का करो कल्याण बेटी पढ़े तो मिल जाये मात पिता सबको सम्मान . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० सम्मान से सम्मानित  आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hin...
हक़ीक़त
लघुकथा

हक़ीक़त

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** गीजर खराब हो जाने से मधु ने रॉड लगाकर बाल्टी में पानी गरम करने रखा, कचरा गाड़ी आ जाने से फ्लेट की सीढ़ियों से उतरकर कचरा डालने नीचे सड़क तक गई। सीमित समय मे बहुत से काम निपटाने की हड़बड़ी से घबराई हुई मधु पुनः सीढ़िया चढ़कर ऊपर पहुँची तो देखती है सीढ़िया विभाजित है। नीचे उतरकर दूसरी तरफ से सीढ़ियां चढ़ती है फिर वही मंजर! तीसरे फ्लेट की तरफ भागती है फिर चौथे फ्लेट.....इसी तरह हर सीढ़ी गन्तव्य तक पहुँचने से पहले टूट चुकी हैं। जहाँ पहुँचना है वो जगह हर बार दिखाई दे रही है पर रास्ता नहीं सूझ रहा। याद आया उसे पानी गरम करने रखा था, बेटा उठकर वॉशरूम में कहीं अनजाने हाथ ना लगा ले! सोच कर रूह काँप गई। मधु पूरी तरह पसीने में लथपथ, ठंडी पड़ गई। धड़कन बढ़ी हुई, बोलने की कोशिश में जबान लड़खड़ाई। बेचैन, उद्विग्न, चीख कर लगभग रोती हुई उठ बैठी। ओ..ह!! ये सपना ...
मेरा सपना सच हो जायें
कविता

मेरा सपना सच हो जायें

रूपेश कुमार (चैनपुर बिहार) ******************** काश मेरा सपना सच हो जायें, जीवन के बहुमुल्य समय सत्य हो जायें, सबको अपना लक्ष्य प्राप्त हो जायें, मन को छू लेने वाली कोई बात हो जायें, काश मेरा सपना सच हो जायें, विज्ञान की प्रगति से दुनिया को आलोकित किया जायें, भौतिकी, रसायन , जीव की जीवनदान मिल जायें, मनुष्यों मे जग-ज्योत जलाया जायें, काश मेरा सपना सच हो जायें, साहित्य से समाज का ज्योत जलाया जायें, राजनीतिक की स्तंभ को रोशनी दिखाया जायें, जीवन के दृव्य-दृष्टि को नई पहचान दिलाया जायें, काश मेरा सपना सच हो जायें, मौत के मुह से कैसे बचा जायें, साँसो के साँस से कैसे बचा जायें, नवजीवन को नव नवल नई नयन मिला जायें, काश मेरा सपना सच हो जायें, जीवन मे प्यार को प्यार मिला जायें, आँखो से ओझल होकर दुनिया मिला जायें, आरजू - गुस्त्जू से याद मिला जायें, काश मेरा सपना सच हो जायें, जीवन मे गणि...
लाचारी
कविता

लाचारी

डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** जो राशन मिला था ख़तम हो गया। गरीबों पर हाय क्या सितम हो गया। भूख लगती अधिक, दोष उनका नहीं, कल मिले न मिले ऐसा मन हो गया। बंद पाउच हुए,पान गुटका ख़तम। कोरोना ने ढाया...ये कैसा सितम। तम्बाखू रुलाती..कहीं आती नहीं। ज़िन्दगी बिन उसके...भाती नहीं। दीन नेता हुए,अब दिखते नहीं हैं। न निकलें घरों से, मिलते नहीं हैं। वोट बस्ती के उनको लुभाने लगे। घर भरे हैं जहाँ, फिर भराने लगे। चंद पैकेट लेकर निकलते हैं वो। बनके हीरो कोरोना मचलते हैं वो। खींच फोटो....दनादन डाला करें। आपदा है विकट, मुंह काला करें। मोहल्ले में बांटों, ये व्यवस्था रहे। मन शुद्ध हो, सच्ची आस्था रहे। झाँकी न तुम यूँ दिखाया करो। कभी मेरी गली में आया करो। मुँह सुरसा हुआ, देश खाने लगा। कोरोना अब सच में रुलाने लगा। काम भी है जरूरी...मिलता रहे। पेट खाली और होंठ सिलता रहे? बना ठीक दूर...
कोलाहल
कविता

कोलाहल

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** श्रेष्ठ अभिनेता श्री इरफ़ान खान हमारे बीच नही रहे। उनका अभिनय कौशल रजत पट व हमारे ह्रदय पर सदा अंकित रहेगा। कहते है कलाकार अपनी कला में सदैव जीवित रहते है। कला उन्हें अमरत्व प्रदान करती है। शब्द सुमन उन्हें अर्पित है। बाहर का कोलाहल थमे तो, मन की बात सुनू। जब मौन मुखर हो कर बोलेगा, अंतस के कपाट खोलेगा। आत्मा से बोलेगा, मैं, धीरे धीरे गलेगा। नेति नेति जानेगा, परमात्मा से मिलेगा। दिव्य प्रकाश में घुलेगा। होगा बंद आवागमन परम पद पायेगा। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० सम्म...
आत्मविश्वास
लघुकथा

आत्मविश्वास

रीतु देवी "प्रज्ञा" (दरभंगा बिहार) ******************** किसान दीनालाल के खेत में रबी की फसल पक गयी है। कोरोनावायरस के कारण पूरे राष्ट्र में लाकडाउन लगा है। एक सच्चे देशभक्त होने के कारण मजदूरों को फसल काटने के लिए नहीं कह रहे हैं। फसल कटाई के लिए बहुत चिंतित है। "दादाजी आप सवेरे-सवेरे क्यों चिंतित हैं? आपके चेहरे पर बारह बज रहे हैं।" उनका बारह वर्ष का पोता रोहन पूछा। "खेत में रबी की फसलें सूख गयी है। अगर इसको यूं ही कुछ दिन छोड़ देंगे तो सारी मेहनत पर पानी फेर जाएगी। क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मजदूरों से कटवा नहीं सकता। मैंनें कभी फसल काटी नहीं है। "दीनालाल उदासी स्वर में बोले। "ओहो दादा जी! रोहन के रहते हुए आप क्यों चिंतित हो जाते हैं। चलिए खेत, हमलोग स्वयं फसलें काटकर ले आएं। मैंनें मजदूर चाचा जी सबको फसल काटते ध्यान से देखता रहता। "राहुल आत्मविश्वास के साथ बोला। "पर रोहन त...
कुत्‍ते की पूँछ
कहानी

कुत्‍ते की पूँछ

राजेन्‍द्र कुमार श्रीवास्‍तव सीहोर, (म.प्र.) ******************** ''मैंने क्‍या किया.....?'' सदा की तरह यह आश्‍चर्य मिश्रित प्रश्‍न दागकर इतराते हुये, शरीर को गठीली रस्‍सी की भाँति ऐंठते दूसरे रूम में बुदबुदाते चली गई वह। मैं विचारों के दलदल में सिर धुनता हुआ छटपटाता रह गया। अपनी औलाद की जि़न्‍दगी के महत्‍वपूर्ण फैसले में सहायता के वजाय अड़ंगा डालकर उसे तनिक भी अफसोस नहीं। मैं उस क्षण को कोस रहा हूँ, जब ऊपरवाले ने किसी प्रायश्चितके तहत हमारी जोडी़ मिलाई! लगभग पैंतीस सालों में फैले दाम्‍पत्‍य जीवन का सम्‍भवत: ऐसा कोई पल नहीं है, जब मन-माफिक पत्नि-पति का एहसास हुआ हो। ‘’तो फिर बच्‍चों का जन्‍म.......?’’ यह प्रश्‍न कोई भी पूछ सकता है। ‘’जोरजवरजस्‍ती में भी तो......।‘’ जब कभी रिश्‍तों में असन्‍तुलन आता है। कुछ परस्‍पर विरोधाभाषी स्थिति निर्मित होती है। तो उसके निराकरण के लिये, एक-दूसरे को सम...
मजदूर की मजदूरी
कविता

मजदूर की मजदूरी

मंजुला भूतड़ा इंदौर म.प्र. ******************** बिना श्रमिक हो जाते हम मजबूर, समझते हैं उस को केवल मजदूर। मेहनतकश की मेहनत से ही है, हमारे जीवन में खुशी। कोशिश करें समझें मजबूरी, करें सही आंकलन और दें उचित मजदूरी। मजदूर चाहता है दो वक्त की रोटी, तन को कपड़ा और सिर पर छत। नहीं है जिसके बिना सम्भव प्रगति, समझें हर जरूरत और रखें अच्छी दोस्ती। परिचय :-  नाम : मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य आदि सामयिक, सृजनात्मक एवं जागरूकतापूर्ण विषय, विशेष रहे। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों तथा सामाजिक पत्रिकाओं में आलेख, ललित निबंध, कविताएं, व्यंग्य, लघुकथाएं संस्मरण आदि प्रकाशित। लगभग १९८५ से सतत लेखन जारी है । १९९७ से इन्दौ...
दिल आईना
कविता

दिल आईना

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** दिल के आइने से देखा तू रकीब बन पड़ा है, उजाड़कर घरौंदा किसी का, सुकून पा रहा है। दिल न था तो पत्थर ही सही पिघला-पिघला सा था, तुम्हारी बेपरवाही से तनहा-तनहा सा था। हजारों जख्म देकर तुम इजाद थे, मरहम के इंतजार में हम बेकरार थे। . परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने चलभाष पर या गूगल पर www.hindirakshak.com खोजें...🙏🏻 आपको यह रचना अच्छी लगे तो ...
ऐ कवि तुम अङ्गार लिखो
कविता

ऐ कवि तुम अङ्गार लिखो

भारत भूषण पाठक देवांश धौनी (झारखंड) ******************** अब श्रृंगार नहीं, सिर्फ अङ्गार लिखो। ऐ कवि प्रेम नहीं बस प्रहार लिखो। तुम रूप माधुर्य नहीं सिर्फ वेदना लिखो। ऐ कवि तुम प्रणय नहीं अब परित्याग लिखो! तुम राग दीप नहीं भर्तसना का मल्हार लिखो! तुम प्रार्थना नहीं अब केवल तिरस्कार लिखो! लिखो टूटी हुई तुम, चूड़ियों की गाथा। रचो काव्य सहस्त्रों तुम अपमानित हुई मनुजता पर! . परिचय :- भारत भूषण पाठक 'देवांश' लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी - ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला दुमका (झारखंड) कार्यक्षेत्र - आई.एस.डी., सरैयाहाट में कार्यरत शिक्षक योग्यता - बीकाॅम (प्रतिष्ठा) साथ ही डी.एल.एड.सम्पूर्ण होने वाला है। काव्यक्षेत्र में तुच्छ प्रयास - साहित्यपीडिया पर मेरी एक रचना माँ तू ममता की विशाल व्योम को स्थान मिल चुकी है काव्य प्रतियोगिता में। आप भी अपनी कविताएं, कह...
वो लड़की
कविता

वो लड़की

निशा शर्मा जिला चापा छत्तीसगढ़ ******************** सुनी ना किसी ने भी उसकी जुबानी होती है क्या एक लड़की की कहानी चंचल, अलबेली, अपने माँ की दुलारी घर की सुमन, पापा की लाडो प्यारी! तेज आवाज सुन घबराती वो लड़की अकेले में कुछ गुनगुनाती वो लड़की! मिले जो उसपे नाज करती वो लड़की ऊंची नही आवाज करती वो लड़की! दो कुलों की लिहाज करती वो लड़की घर में सुखद आगाज करती वो लड़की! . परिचय :- निशा शर्मा निवासी : जिला चापा छत्तीसगढ़ आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें ...
खटकती हैं
कविता

खटकती हैं

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** हर बात हर बार खटकती हैं। मेरे लबो पर हर बात अटकती है।। कभी साँसे अटकती हैं, कभी यादे भटकती हैं । हर बात हर रोज अटकती हैं। झूठों पर सटकती हैं।। जब भी सटकी, हर बात ही खटकी। जो नहीं सोता नींद वहीं भटकती हैं। जिसको हैं सोना नींद वहाँ सटकती हैं।। जहाँ मंजर हो विकट, छते वही टपकती हैं। ये ही बात खटकती हैं।। जहाँ फसले हो हरी-भरी, बून्दे वही टपकती हैं। ये बात ही खटकती हैं.....।। . परिचय :- नाम : गोरधन भटनागर निवासी : खारडा जिला-पाली (राजस्थान) जन्म तारीख : १५/०९/१९९७ पिता : खेतारामजी माता : सीता देवी स्नातक : जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रका...
घर एक मंदिर
कविता

घर एक मंदिर

वीणा वैष्णव "रागिनी"  कांकरोली ******************** घर एक मंदिर है, इसे मंदिर ही बना रहने देना। घर मंदिर होता, एक उदाहरण तू भी बन जाना। मात-पिता प्रभु मान, सिस तू चरण झुका देना। खून से सींचा उसे, बस तू थोड़ा प्यार भर देना। कैदखाना नहीं यह पागल, यह है स्वर्ग समान। अनजाने में ही कुछ नादान, कर रहे हैं अपमान। शून्य जैसा सबका जीवन,ना कीमत शून्य की। संग सदा अपनो रह, अनमोल स्वत: बन जाना। संबंधों की गहराई को, सदा ही महसूस करना। ईश्वर की श्रेष्ठ रचना, थोड़ा विवेक काम करना। चिंता चिता एक समान, यह सदा याद रखना। खुद की खुशी खातिर, मां बाप को ना दर्द देना। प्यार से पाला तुझे ,चिंता और कोई न जताना। दिखावा सब करेंगे, हकीकत तो वहां ही पाना। करती वीणा एक विनती, जीवन ना नर्क बनाना। बहुत सहा उन्होंने, अंत समय कुछ सुख देना। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव "रागिनी" वर्तमान में राजकीय उच्च माध्...
माँ तो बस माँ होती हैं
कविता

माँ तो बस माँ होती हैं

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** जो रखती आँचल के छाव तले, जन्न्त हो जिसके पाँव तले, अब ये मत पूछ वो क्या होती है, माँ तो बस माँ होती हैं.... तुझे कोई जो, दुःख सताये है, उसकी आँखों से आंसू आये है। हाथ पकड़कर चलना, बोलना जिसने तुमको सिखलाये है। कभी उसकी प्रेम न बयां होती हैं, माँ तो बस माँ होती है.... क्यों उसको तुम रुलाता है, क्यो उसको तुम सताता है, मन ही मन वो मुस्काती है, जब तुझको गले लगाती है। उसकी क्रोध में भी सब दया होती हैं, माँ तो बस माँ होती है.... उस जग जननी की प्राण तो, तेरे ही अंदर बस्ती है, तुहि उसकी दुनिया है, और तुहि उसकी हस्ती है। दुःख हर ले तेरी जीवन की, उसकी आँचल में वो हवा होती हैं, माँ तो बस माँ होती है.... सुना है बहुत न्यारी हैं, जिसने तुमको दुलारी है हर दुःख पर वो तो भारी हैं, इस जग में सबसे प्यारी हैं। दवा से बढ़कर भी तो उसकी आशीर्वाद और दु...
लॉक डाउन में कुछ इस प्रकार मनाया समर्थ भट्ट का प्रथम जन्मदिवस
सामाजिक

लॉक डाउन में कुछ इस प्रकार मनाया समर्थ भट्ट का प्रथम जन्मदिवस

इंदौर। लॉक डाउन के चलते अनुशासन में रहकर मनाया समर्थ भट्ट का प्रथम जन्मदिवस.... नाना-नानी, दादा-दादी, बुआ-फूफा जी, चाचा-चाची, मामा-मामी, मासा-मासी, भाई-बहन सभी ने वीडियो के माध्यम से अपने भाव व्यक्त किए। किसीने गाना गाया, किसी ने नृत्य किया, किसी ने कविता पाठ किया और सभी ने इस प्रकार प्यार और उल्लास के साथ अपना आशीर्वाद भेजा। सभी ने मिलकर जन्मदिन को खास और अविस्मरणीय बना दिया। इस तरह परिवारजनों ने अनुशासन में रहकर लॉक डाउन का पालन किया। सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद.... घर में रहो सुरक्षित रहो। . आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अ...
हमें छोड़कर कैसे तुम जाओगी गंगा
कविता

हमें छोड़कर कैसे तुम जाओगी गंगा

श्रीमती श्यामा द्विवेदी वाराणसी (उ.प्र.) ******************** बड़े तपों से धरती पर आयी हो गंगा! हमें छोड़कर कैसे तुम जाओगी गंगा? हमने तुमको किया है कलुषित, शुचिता भी कर बैठे दूषित। लज्जित हैं अपनी करनी पर, अब न करेंगे तुम्हें प्रदूषित। बिना तुम्हारे बहुत असंभव है ये जीवन, हमें छोड़कर कैसे तुम जाओगी गंगा? गौमुख से सागर तक तुम बहती हो गंगा जीवन के पथ को निखार चलती हो गंगा। उद्धार सभी का करें तुम्हारी लहर लहर तन मन को भी शीतल करती हो गंगा। पर उपकार हमें सिखाती रही सदा, क्या हमें छोड़ के यूँ ही चली जाओगी गंगा? ऋषियों की माँ जान्हवी गंगा सागर तक धार प्रवाही गंगा। शिव के जटा जूट की गंगा, स्वर्गातीत भागीरथि गंगा। जीवन के संस्कार तुम्हीं से, पाप रहित व्यवहार तुम्हीं से तुम संस्कृति का भान हो गंगा हमें छोड़कर कैसे तुम जाओगी गंगा? अगर गयीं तो नहीं भरेगा कुंभ का मेला, बिना तुम्हारे संगम हो...
नैनों की बात
कविता

नैनों की बात

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** नैनों की क्या बात कहूँ नैना ये क्या कर देते हैं चाहूँ मैं जो बात छिपाना महफिल में सब बयाँ कर देते हैं किसी की खुशियाँ होठों पर ला कर रौनक तमाम कर देते हैं चाहूँ मैं जो बात छिपाना महफिल में सब बयाँ कर देते हैं दवा नहीं पाते दर्द किसी का मोती की तरह आँशु छलका देते हैं चाहूँ मैं जो बात छिपाना महफिल में सब बयाँ कर देते हैं . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० सम्मान से सम्मानित  आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindiraksha...
मैं मजदूर हूं
कविता

मैं मजदूर हूं

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं, समुद्र की छाती चीरकर, बांध बनाया, अपने हाथों से, सृष्टि का निर्माण किया, चट्टानों को काटकर,राह बनाई, रेगिस्तान को, हरा भरा किया, फिर भी आत्म सम्मान, से दूर हूं। हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं। अन्न उगाता हूं धरती से, पर भूखा रह जाता हूं, औरों के तन ढकता वस्त्रों से, बिना कफन मर जाता हूं, पेट की आग बुझाने को, मैं मजबूर हूं, हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं। निर्धन का खून चूस-चूस कर, अपना घर ही भरते हैं, नागों जैसा फन फैलाए, मजदूरों को डरते हैं, जिंदगी का बोझ कंधों पर उठाता हूं, हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं। जिनका वर्तमान गिरवी, भविष्य अंधकार है, धरा बिछौना छत आसमां, ना कोई बहार है, बोल ना पाता मालिक के आगे, अपना सर झुकाता हूं, हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं। . प...
परेशां धरती
कविता

परेशां धरती

राधा शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** धरती बोली इक दिन गगन से ये प्रकोप कब मिट पायेगा गगन से आवाज़ आई जब सूर्य तपन बढ जाएगा हवा में फैला रोग कीटाणु खुद से मर जाएगा फिर रोइ धरती कुछ खोइ खोइ सी धरती बोझ महामारी का अब सह ना सकूंगी ए गगन अब मै कुछ कर ना सकूंगी तेरे पास तो है चाँद सितारे मेरी तो दुनिया ही ये मानव सारे कुछ चिता मे जल रहे है तो कुछ दफन हो रहे है अब तू ही बता ए गगन करोना से बिमार मानव मेरी गोद में सो रहे है जब कभी डगमगा जाती हूँ तो भूकंप सा कहलाती हूँ जब सूखा पडे आकाल तब खुद ही बिखर जाती हूँ भेज ए गगन ऐसी कोई दवा शुद्ध हो जाऐ ये जहरीली हवा फिर हो धरती पर चहल-पहल तेरे गगन में भी हो हवाई की पहल सूनी पडी मेरी गलियां सूना सा सारा शहर . परिचय :- राधा शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो...
कलम लेखन से संवरते अक्षर, उदय होते नए विचार
आलेख

कलम लेखन से संवरते अक्षर, उदय होते नए विचार

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए लेखन भले ही सरल प्रक्रिया हो गई हो। कलम के माध्यम से जो विचार और अक्षर निखरते है उसकी बात ही कुछ और होती है। इस और ध्यान ना देने से हैंडराइटिंग ख़राब होने की वजह भी यही रही है। व्याकरण त्रुटि ना के बराबर रहती है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल के साथ -साथ हैंडराइटिंग को भी जारी रखें। क्योकि कलम से कागज पर लिखी जाने वाले लेखन विधा कम्प्यूटर युग में खो सी जाने लगी। सुन्दर अक्षरों की लिखावट के पहले अंक मिलते थे। साथ ही सुन्दर लेखन की तारीफे होती थी जो जीवन पर्यन्त तक साथ रहती थी, स्कूलों, विभिन्न संस्थाओं द्धारा सुन्दर लेखन प्रतियोगिता भी होती थी। अब ये विधा शायद विलुप्ति की कगार पर जा पहुंची। लेखन विधा को विलुप्त होने से बचाने हेतु लेखन विधा के प्रति अनुराग को हमें जारी रखना होगा। ये लेखन एक सागर के सामान...
निर्झरणी
कविता

निर्झरणी

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मै नारी हुं, निर्झरणी हुं, कल कल करती सरिता पावन हुं। मन से रेवा, तन से गंगा, अनुरागी हुं, मनभावन हुं।। परमेश्वर ने मुझको सृष्टि की रचना का आधार रखा। आदि शक्ति का रूप बनाकर उमा रमा फिर नाम दिया।। मानव जाति जन्मे तुझसे, मुझको यह वरदान दिया। नवजीवन देती, परमेश्वर की सत्ता की परिचायक हुं।। मन से रेवा तन से गंगा अनुरागी हुं मनभावन हुं। मै जीवन के तपते रेगिस्तानो में रिश्तों की बगिया महकाती हुं। मै वसुधा हुं, पीड़ा सहकर जीवन का पुष्प खिलाती हुं।। लेकर मर्यादा सागर की सिमट सिमट मै जाती हुं। मै सुर भित मंद पवन सी सृष्टि की अधिनायक हुं।। मन से रेवा तन से गंगा, अनुरागी हुं मनभावन हुं। उत्कृष्ट कृति मै परमेश्वर की फिर क्यों कमतर आंकी जाती हुं। सतयुग में अग्निपरीक्षा देती, द्वापर में जुएं में हारी जाती हुं।। पुष्पों सा कोमल मन ले क्यों कलयुग...
तृष्णा
कविता

तृष्णा

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खिलना चाहता हूँ मैं भी, पर गमलो में उगे पौधों, की तरह की नही, ख्वाहिश है जंगलों-सी फैलने की, ना कोई ओर ना छोर कोई, शांत योगी से, फुसफुसाते हवा सँग, उगना चाहता हूँ, बरगद की तरह, सुनता पंछियों की कलरव, झांकते नीड़ से पांखी, देते सुकू पथिक को, जो भर दे साँसे जहाँ में... चहचहाना चाहता हूँ, चिड़ियों की मानिद, जी भर, उड़ना चाहता हूँ, परिंदों के सँग, पींगें भरता, जमी ओ आसमा के, मिलन-रेखा तक... महकना चाहता हूं, फूल बहार की तरह नही, स्वच्छंद बेलो की तरह टेसू, कचनार ओ अमराइयों की तरह... बहना चाहता हूँ, पर नदी की नही, सागर ओ झरनों के मानिद, चट्टानों को चीरती, बन्धनों को तोड़ती उन्मुक्त, बेखौफ लहरों की तरह, थाह लेना चाहता हूँ, अंनत मन की गहराईयों तक... बरसना चाहता हूँ, पर बदली सा नही सावन की झड़ी सा, तपती धरा पर, बंजर जमी पर, सूखे अधरों पे, ...
बहाना था
ग़ज़ल

बहाना था

कृष्ण कुमार सैनी "राज" दौसा, राजस्थान ******************** तिरे लब पर हमेशा ही कोई रहता बहाना था तुझे भी है मुहब्बत यह मुझे यूँ आज़माना था मुझे तुम मिल गये मानो सभी कुछ मिल गया मुझको तुम्हारा प्यार ही मेरे लिये जैसे खज़ाना था हमेशा की तरह बारिश में मिलने रोज़ आता था मुहब्बत का यक़ीं हर रोज़ यूँ तुमको दिलाना था जले हों लाख दिल सबके मुहब्बत देखकर मेरी मुझे कुछ ग़म नहीं था प्यार बस तुझ पर लुटाना था हवा से उड़ गए लाखों घरौंदे हम गरीबों के कभी जिन में हमारा खूबसूरत आशियाना था लगा है रोग सबको प्रेम का जिसका मदावा क्या मगर यह "राज" सबके सामने भी तो जताना था मदावा --इलाज परिचय :- कृष्ण कुमार सैनी "राज" निवासी - दौसा, राजस्थान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर...