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कोदरिया में रंग-बिरंगी काव्य गोष्ठी संपन्न
साहित्यिक

कोदरिया में रंग-बिरंगी काव्य गोष्ठी संपन्न

महू: नि.प्र. ग्राम कोदरिया में सरदार पटेल नगर स्थित महू अंचल के लोकप्रिय साहित्यकार धीरेन्द्र जोशी के निवास पर साहित्य मित्र मंडल कोदरिया की रंगपंचमी के अवसर एक रंग-बिरंगी काव्य गोष्ठी संपन्न हुई। धार के मंचीय कवि नरेंद्र मांडलिक अध्यक्ष एवं मालवी कवि रमेश आंजना कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। कवि धीरेन्द्र जोशी के संचालन में कवि श्री राधेश्याम गोयल, डॉ संजय श्रीवास्तव, सुलभा जोशी, सुषमा दुबे, ललिता जोशी, कीर्ति श्रीवास्तव, द्रोणाचार्य दुबे ने होली की हास्य रस से भरपूर कविताओं एवं गीतों का देर रात तक रचना पाठ किया। आभार प्रदर्शन शैलेन्द्र जोशी ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ रंग-गुलाल होली से हुआ तथा समापन स्वादिष्ट स्वल्पाहार से हुआ। कार्यक्रम के दौरान स्वर्गीय श्रीधर जोशीजी की साहित्यकार बेटियों सुलभा जोशी एवं सुषमा दुबे का जन्मदिन के अवसरबी पर सम्मान भी किया गया। कवियों की प्रमुख पंक्तियां ....
मीडिया कितना कारगर
आलेख

मीडिया कितना कारगर

डॉ. विनोद वर्मा "आज़ाद"  देपालपुर ********************** कोलाहल भरे वातावरण में जहां दूरदर्शन और मोबाइल की वजह से परिवार में वार्ता लाप, दादा-दादी के किस्से और कहानियों के साथ अच्छे-बुरे की सीख और समझ से परे आज की नई पीढ़ी होती जा रही है। बच्चों के लिए तो विभिन्न प्रकार के खेल मोबाइल पर चल रहे है उसमे बच्चे रम रहे है। मोबा इल पर जानलेवा खेल खेलकर पूरे विश्व मे कई बच्चे आत्महत्या कर चुके है या अपराध की ओर उन्मुख हो गए। कई परिवारों की आर्थिक स्थिति ठीक नही होने के बावजूद मोबाइल के लिए लड़के-लड़कियां लालायित रहते है। छोटे से लेकर बड़े बच्चों का मोबाइल आप बन्द नही करवा सकते, मोबाइल की मांग पूरी करना ही पड़ेगी ! आपका मोबाइल बच्चों को देना ही पड़ेगा ! नही तो बच्चे चिढ़-चिढ़े होकर अत्यधिक आक्रोश व्यक्त करने लगते है, खाना नही खाएंगे, आपका कोई काम नही करेंगे, समान उठा-उठाकर फेंकेंगे, यहां तक कि वे गुस्से ...
तू मेरी मैं तेरा रहूँ
कविता

तू मेरी मैं तेरा रहूँ

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** ख्यालों में पल - पल तुझे सोचता हूँ मैं ख्वाबों में भी अब तुझे ही देखता हूँ मैं। सुकूँ मिलता है अब तुझे महसूस करके इस दिलो जां में समेटे तुझे घूमता हूँ मैं। बस यही आरजू है तू मेरी मैं तेरा ही रहूँ तेरे दिल की हर धड़कन में गूंजता हूँ मैं। लोग कहते हैं मुझको हूँ भुलक्कड़ बड़ा सब भूलकर भी एक तुझे ना भूलता हूँ मैं। पाकर तुझे जन्मों की तलाश हुई पूरी मेरी और पाने की तलाश में नहीं दौड़ता हूँ मैं। ये हाथ जब उठते हैं दुआओं के लिए मेरे तू मेरी हो हर जन्म, खुदा से मांगता हूँ मैं।   परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आक...
पीकर आंसुओं को
मुक्तक

पीकर आंसुओं को

दीपक्रांति पांडेय (रीवा मध्य प्रदेश) ****************** जो पीकर आंसुओं को भी, स्वयं हीं मुस्कुराती हैं। करें बलिदान इच्छा सब, न जाने सुख, क्या पाती है।। हर एक चौखट की मर्यादा है,जिनके अपने हाथों में। वो रणचंडी, भवानी हीं, यहां नारी कहाती हैं।। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। २) समरसता का भाव लिए, रंगो के पावन छांव तले, होली का यह त्यौहार कहे, जीवन में प्रीत का रंग भरे।। समरसता के पावन पर्व होली की अग्रिम शुभकामनाओं के साथ। ३) इश्क़ में पागल वो आशिक फिर रहा है आज भी। शाह वो मेरा बना और मैं बनी मुमताज भी।। प्यार बेश़क मैने उससे हीं किया था सच है ये। पर ये कैसे भूल जाती, हूँ पिता की लाज भी।। माता पिता को समर्पित। ४) निद्रा का अब, ढोंग रचाकर, मौन कहां तक साधेंगे। बाधाओं को, पीठ दिखाकर, रण से कब तक, भागेंगे। लक्ष हम अपना, साधेंगे,अब तोड़ तमस की सघन घटा। बहुत हुआ अ...
आज होली खेलें अपने आंगन में
कविता

आज होली खेलें अपने आंगन में

आशा जाकड़ इंदौर म.प्र. ******************** आज होली खेलें अपने आंगन में। रंगों का त्योहार मनाएं फागुन में।। टेसू के रंग यूँ बरसाए , तन मन पीला हो जाये। ईर्ष्या-नफरत दूर रहे, मन प्रेम से भर भर जाए। रिश्तो के फूल खिलाए गुलशन में। आज होली खेले अपने आंगन में। हरा रंग हम ऐसे बरसाए , कण-कण हरियाली होजाए । जन-जन की भूख मिटे , घर पर खुशहाली आजाए। मेहनत के फूल खिलाए उपवन में। आज होली खेलें अपने आंगन में। वंशी कीतुम तान सुनाओ, राधा बन हम रंग बरसाएं। रंग पिचकारी भर-भर के , मन का सार संसार लुटाएं। हम तुम दोनों रास रचाए मधुबन में। आज को खेलें अपनी आंगन में। .परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर म.प्र. व्यवसाय - सेन्ट पाल हा. सेकेंडरी स्कूल इन्दौर से सेवानिवृत्त शिक...
कोरोना
आलेख

कोरोना

माया मालवेन्द्र बदेका उज्जैन (म.प्र.) ******************** कोरोना रो_कोना। आने दो स्वागत करो। जी भर भर स्वागत करो। जनता मेरे देश की जनता। स्वदेश का नारा लगा लगा कर स्वदेश को नहीं पहचान पा रही जनता। कितना अपने आप को धोखा देना है। क्या इस शिक्षित युग में अब भी हमारी जनता को अंगुली पकड़कर चलना सिखाना होगा। आजादी के बाद इतने वर्षो में कम से कम हर नागरिक इतना तो शिक्षित हो ही गया होगा की उसे स्वयं के भले बुरे का ज्ञान होने लगा होगा। घर परिवार की परिस्थितियों से निपटने की क्षमता यदि है तो कुछ देश के लिए योगदान भी समझ में आता होगा। हम हर पहलू से सोचे तो सोच यहीं निकल रही है कि हम सब ठीकरे दूसरे के माथे ही फोड़ेंगे। किसी भी दल की सरकार हो। उसमें कितने भी कपट छल वाले लोग भरे हो, हमारी समझ कहां जाती है। यदि हम प्रधानमंत्री के पद तक के दावेदार चुन सकते हैं तो हम इतनी बुद्धि तो रखते ही है कि हम...
ग्राम नेऊ गुराड़िया में विराट कवि सम्मेलन सम्पन्न
साहित्यिक

ग्राम नेऊ गुराड़िया में विराट कवि सम्मेलन सम्पन्न

महू। बीती रात अखिल भारतीय साहित्य परिषद महू इकाई के तत्वाधान में प्रायोजक श्री इन्दरसिंह जी तंवर की वैवाहिक वर्षगांठ पर शानदार विराट कवि सम्मेलन सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्यरूप से नारी को समर्पित कविताओं का पाठ किया गया। आमंत्रित कवियों में धीरेन्द्र जोशी, विनोदसिंह गुर्जर, एस के अस्थाना, भगवानदास तरंग, दामोदर विरमाल, यश कौशल, शिवकुमार शर्मा, डॉ. विमल सक्सेना, देवांशी गुर्जर, विजय पांडे आदि ने अपनी एक से बढ़कर एक कविताएं सुनाई व देर रात तक समां बांधे रखा। इसी बीच प्रायोजक व गांव के वरिष्ठ जनों द्वारा कवियों को सम्माननित किया गया। वरिष्ठ कवि धीरेन्द्र जोशी द्वारा सफल संचालन किया व छायांकन सत्यप्रकाश चौहान द्वारा किया गया। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्...
मेरी रूह हो तुम
कविता

मेरी रूह हो तुम

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मेरा दिल मेरी धड़कन मेरी रूह हो तुम मेरी कलम से निकले अल्फाजों का एहसास हो तुम मैं चुप रहूं या बोल दूं मेरे दिल का जज्बात हो तुम मैं चांद बनूं चांदनी बनकर मुझ पर बिखर जाओ तुम मैं बादल तेरा और मेरी बारिश हो तुम मैं कजरा तेरा कजरे की धार हो तुम एहसास इतना है तो मैं कहता हूं तुम्हें लगता है जैसे आसपास ही हो तुम मेरी हसरत भरी पहली मुलाकात हो तुम जो मैं गुनगुनाता हूं वो प्यारा सा साज हो तुम मेरा प्यार मेरा ईमान मेरा जहां हो तुम हाथ बढ़ाया है तेरी तरफ अब थाम लो तुम आ अब लौट चलें तुझे लेकर अपने घर मेरा दिल मेरी धड़कन मेरा एहसास हो तुम मेरे सीने में उमड़े प्यार का तूफान हो तुम आगोश में समा कर इस तूफान को थाम दो तुम मेरा दिल मेरी धड़कन मेरी रूह हो तुम मेरी कलम से निकले अल्फाजों का एहसास हो तुम।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनी...
फागुन की चौपाल
कविता

फागुन की चौपाल

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** होली उत्सव प्रीत का, यह रंगों का बाजार, निशदिन फागुन प्रीत, के नये पढ़ाये पाठ। अखियों ही अखियों, हुऐं रंगों के संकेत, रह रह कर महके रात भर कस्तूरी के खेत। प्रीत महावर की तरह, इसके न्यारे है रंग, बतियाती पायल हँसे, हँसे ऐड़ियाँ संग। रंगों वाले आईने, भूलें सभी गुमान, जो भीगें वो जानता, फागुन की मुस्कान। दोहे ठुमरी सखियां, फाग अभंग ख्याल, मोसम करता रतजगा, फागुन की चौपाल। . परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। राष्ट्रीय कीर्ति सम्मान स...
नसीबो का नसीबा
लघुकथा

नसीबो का नसीबा

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** लाला जी, थके हारे घर पहुंचे थे। क्या ....बना नसीबो की शादी का लड़के वालों ने हां कि नहीं। या इस बार भी जन्मपत्री नहीं मिली का बहाना कहकर मना कर दिया है। इससे पहले लाला जी को कितने ही रिश्ते मना कर चुके थे। जब भी रिश्ते की बात चलती तब सिर्फ एक ही बात निकलती कि आप इसी गांव के रहने वाले हो या पाकिस्तान से आए हो। आजादी के बाद कितने ही लोगों की जिंदगी इस एक शब्द पर थम गई थी कि आप यहां के रहने वाले हो या पाकिस्तान से आए हो। घर-बाहर तो छूटा ही, काम धंधा भी छूट गया। ऊपर से जिनकी बेटियां थी उसकी शादी करने के लिए कितने सवालों से गुजरना पड़ता था। कुछ यही हो रहा था। नसीबो के साथ ....जिस किसी रिश्ते की बात चल रही थी वही मना कर देता था कि पाकिस्तान से आए हैं वहां से आने वाली किसी भी लड़की को छोड़ा नहीं था, और यह ऐसी सोच थी जिसके लिए कोई भी...
डरो नहीं
कविता

डरो नहीं

श्रीमती मीना गोदरे 'अवनि' इंदौर म. प्र. ******************** कोरोना जग में घूम रहा है हिंसक क्रूर छली कपटी को, डसने पल-पल घूर रहा है चुन चुन दुश्मन मार रहा है डरो नहीं अहिंसक भोले मानव तुम्हारे पास कभी न आएगा नहीं बिगाड़ा तुमने कुछ उसका क्यों तुमको को डसने आएगा बुद्धिमान है वह इंसानो से बिन बात नहीं कुछ करता है सहता रहा अन्याय बरसों तक ललकारा जब, पानी सरसे उतरा है। . परिचय :- नाम - श्रीमती मीना गोदरे 'अवनि' शिक्षा - एम.ए.अर्थशास्त्र, डिप्लोमा इन संस्कृत, एन सी सी कैडेट कोर सागर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय दार्शनिक शिक्षा - जैन दर्शन के प्रथम से चतुर्थ भाग सामान्य एवं जयपुर के उत्तीर्ण छहढाला, रत्नकरंड - श्रावकाचार, मोक्ष शास्त्र की विधिवत परीक्षाएं उत्तीर्ण अन्य शास्त्र अध्ययन अन्य प्रशिक्षण - फैशन डिजाइनिंग टेक्सटाइल प्रिंटिंग, हैंडीक्राफ्ट ब्यूटीशियन, बेकरी प्रशिक्षण आदि सामाज...
रंग वो जो दिखता है
कविता

रंग वो जो दिखता है

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** रंग...! रंग वो जो दिखता है, या रंग वो जो चढ़ता है। दिखता तो नीला या लाल, या राधा के गालों पर गिरधर गोपाल। वो होली का गुलाल या साम्प्रदायिकता का काल वो केसरी जो हनुमान का, या रावण के अभिमान का। प्रदर्शन में मांग का, नेताओं के स्वांग का, होली में भांग का। सुहागन की मांग का। भगत सिंह की आजादी का। कसाब की बर्बादी का। खेतों में हरियाली का। तिरंगे में खुशहाली का। मां की ममता का, सैनिक की क्षमता का। मीरा में भक्ति का, राम में शक्ति का। शहरों में दंगों का, गांव में मन चंगों का। रंग वो जो दिखता है या रंग वो जो चढ़ता है। तिरंगे के तीन हैं। सबके अपने दीन हैं। फिर भी सुख दुःख सहते हैं। हम भारत वासी मिलकर रहते हैं।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा ...
होली का रंग
कविता

होली का रंग

संजय जैन मुंबई ******************** तुम्हें कैसे रंग लगाए, और कैसे होली मनाए? दिल कहता है होली, एक दूजे के दिलों में खेलो। क्योंकि बहार का रंग तो, पानी से धूल जाता है। पर दिल का रंग दिल पर, सदा के लिए चढ़ा जाता है।। प्रेम मोहब्बत से भरा, ये रंगों त्यौहार है। जिसमें राधा-कृष्ण का, स्नेह प्यार बेसुमार है। जिन्होंने स्नेह प्यार की, अनोखी मिसाल दी है। और रंगों को लगाकर, दिलों की कड़वाहटे मिटाते है।। होली आपसी भाईचारे और प्रेमभाव को दर्शाती है। और सात रंगों की फुहार से, ७-फेरो का रिश्ता निभाती है। साथ ही ऊँच नीच का, भेदभाव मिटाती है। और लोगों के हृदय में भाईचारे का रंग चढ़ती है।। . परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचना...
बदली है ऋतु आज
छंद, धनाक्षरी

बदली है ऋतु आज

प्रवीण त्रिपाठी नोएडा ******************** बदली है ऋतु आज, छेड़ती नवीन साज, बासंती हर मिजाज, दिखे हर ओर है। पीला नीला हरा लाल, हर दिशा में धमाल, प्रकृति करे कमाल, बहुरंगी जोर है। कोयल की मीठी तान, गातें हैं भृमर गान, धरती की बढ़ी शान, मानस विभोर है। पल्लव पे शीत ओस, तपन है डोर कोस खुशियाँ देती परोस,प्यारी हर भोर है। होली पर्व आ रहा है, खुमार सा छा रहा है। मौसम भी भा रहा है, डूब जायें रंग में। प्रसून रंग-रंग के, पल्लव नव ढंग के, दृश्य हैं बहुरंग के, झूमिये तरंग में। कबीरा फाग गा रहे, रंग मन को भा रहे, ठंडाई भी चढ़ा रहे, आता मजा भंग में। ढोलक धमक रही, झाँझर झनक रही, बुद्धि भी बहक रही, खुशी हुड़दंग में। संग होलिका दहन, मैल मन का दहन, कुरीतियों का दहन, यह शपथ लें सभी। आपस में न द्वेष हो, दूर सबके क्लेष हों, यत्न अब विशेष हों, दुविधा तज दें सभी। नहीं तनातनी रहे, मित्रता भी बनी रहे, प्रीति नित...
पोथी
दोहा

पोथी

प्रिन्शु लोकेश तिवारी रीवा (म.प्र.) ******************** नयी नयी पोथी मिलै मिलै नये कविराज। एक कविता के चार कवि अहो भाग्य कृतराज। कविता के कछु मूल नहि लुगदी बिचै बजार। पोथी मा कविता चढ़ी कविवर चढे़ कपार। दुइ भाषा कविता लिखिन बनिगे कवि के राज। दुइ पोथी का बाचि के बनिगे बड़ महराज। सब कविअन के एक मती हमरो पोथी होय। केउ पढै़ या ना पढै़ बल-भर मोटी होय। पोथी मा गुन बहुत है बाचि के फेंकए ज्ञान। कउने पोथी मा भरा तनिकौ नहिं है ध्यान। पढि पढि पोथी आजु सब फेंंकै ज्ञान अपार। बाप मरै पानी बिना लड़िका चढ़ा कपार। खिड़की मा पोथी चढ़ी कुर्सी चढ़ा बचैया। गऊ रक्षा पोथी लिहे बाचै गैया गैया। सूरदास तुलसी मरे मरिगें कबिरौ आजु। गूढ़भूत पोथी रची ऐ जड़मति अब जागु। . परिचय :-  प्रिन्शु लोकेश तिवारी पिता - श्री कमलापति तिवारी स्थान- रीवा (म.प्र.) आप भी अपनी कविताएं...
होली आई
कविता

होली आई

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** गीत खुशी के गाओ की होली आई हंसो और हंसाओ की होली आई! मौज मस्तियों का आलम है ऋतुओं, गम सभी भुलाओ की होली आई। बुरा ना मानो रंगों के इस त्योहार में रुठे हुये को मनाओ की होली आई! मिटाकर बीज नफरत बैर द्वेष के सब खुशी के दीप जलाओ की होली आई! भाईचारा अपनापन कायम रहे दिल दिल से दिलमिलाओ की होली आई! भुलाकर गिले शिकवे पुराने से पुराने जी भर के मुस्कुराओ की होली आई!   परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तम...
करोना होली
कविता

करोना होली

डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** होली खेल संग, रंग भर नयन में, पिचकारी छुओ मत नेह बरसाइये। बृज की धरा मन में धारण करो सब, बचाओ देह, मन से रंग जाइये। भय से भरा विश्व, हठ मत करो कुछ, ग़ुलाबों के फूलों से घर को सजाइये। प्यार हो राधा सा, कृष्ण की मुरली हो, नमन कर कष्ट को मिटाइये। गोबर के कंडे घृत हो गऊ का,थोड़ा सा उसमें कपूर भी मिलाइये। बैठ पास होली के रोली का टीका, फ़ीका न हो माथा झुकाइये। घर का बना भात, गुड़ डाल अच्छे से, केसर मिलाकर ढ़ंग से पकाइये। मखाने की खीर में मेवा मुठ्ठी भर, मिट्टी का एक चूल्हा जलाइये। मावा है दूषित, गुजियाँ हों गुड़ की ग़र, जो भी बनें, घर पर खिलाइये। ताला लगा द्वार, अंदर छिपे हम, खोलें न कैसे भी, द्वार मत खटखटाइये। खानी मिठाई अन्य कोई रसीली आदि, देख आज मेरे वाट्सअप पर आइये। हाथ मत मिलाओ, गले मत लगाओ, नमस्ते नमो नमः सबको सिखाइये। अंगोछा गले डाल,...
रंग भरी पिचकारी लेकर
गीत

रंग भरी पिचकारी लेकर

रीतु देवी "प्रज्ञा" (दरभंगा बिहार) ******************** फूल सजाकर इन अंगों में, सजनी लगे सजीली हो। रंग भरी पिचकारी लेकर, लगती बड़ी रसीली हो।। मीठी लगती तेरी बोली, तू है सबकी हमजोली। रसिक भाव की बनी स्वामिनी, मन मति की निश्छल भोली।। संग सहेली झूमझूम कर, लगती छैल ,छबीली हो। रंग भरी पिचकारी लेकर, लगती बड़ी रसीली हो।। आयी है तू लेकर टोली, मस्ती की होगी होली। हर मनसूबे अब हों पूरे, खा लें हम भांग नशीली।। इठलाती सदा हंँसी देकर, लगती बड़ी हठीली हो। रंग भरी पिचकारी लेकर, लगती बड़ी रसीली हो।। खुशियों से भर दो तुम झोली, आँखों से मारो गोली। तुम हो जाओ मेरे प्रियतम, आज सजे सपने डोली।। हाथ अपने सारंगी लेकर, गाती बड़ी सुरीली हो। रंग भरी पिचकारी लेकर, लगती बड़ी रसीली हो।।   परिचय :-  रीतु देवी (शिक्षिका) मध्य विद्यालय करजापट्टी, केवटी दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी ...
ऐसी होली हो
कविता

ऐसी होली हो

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** भारतवासी एक बनें। राहें सबकी नेक बनें। खेतों में हरियाली हो। सबके घर खुशहाली हो। होली में सब द्वेष जलें। दिल में केवल प्यार पले। साथ में पूरी बस्ती हो। दीवानों की मस्ती हो। भेदभाव का अंत हो। बारहों मास बसंत हों। रंगों की बौछार हो। सतरंगा त्यौहार हो। सबकी ऐसी होली हो। रंग संग हमजोली हो। तन रंगे मन रंग जाए। रंग न जीवन भर जाए। ऐसे सब त्यौहार मने। मकसद केवल प्यार बने। . परिचय :- धीरेन्द्र कुमार जोशी जन्मतिथि ~ १५/०७/१९६२ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म.प्र.) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम. एससी.एम. एड. कार्यक्षेत्र ~ व्याख्याता सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा, सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के प्रति जन जागरण। वैज्ञानिक चेतना बढ़ाना। लेखन विधा ~ कविता, गीत, ग...
क्यों भूल गए आज
कविता

क्यों भूल गए आज

भारत भूषण पाठक देवांश धौनी (झारखंड) ******************** क्यों भूल गए आज। नववर्ष है अपना आज।। कल तक तो खूब चिल्ला रहे थे। अँग्रेज़ी नववर्ष पर इठला रहे थे।। आज क्यों हो मौन। कहो न आज नववर्ष की शुभकामनाएं। क्यों न दे रहे आज शुभकामनाएं।। आज शान्त क्यों हो। आज क्लान्त क्यों हो।। आज ही तो नववर्ष है। देखो लताएं भी मुस्कुरा रही है। डालियां भी इठला रही है।। आज कहाँ है तुम्हारा वो ध्वनि विस्तारक यन्त्र। मौन क्यों हो आज साथ दे रही प्रकृति के सब तन्त्र।। देखो क्या आनन्दमय सा चहुँओर वातावरण है। मन आनन्दित तन आनन्दित और आनन्दित उपवन है।। देखो मैं ये नहीं कह रहा मत मनाओ आंग्ल नववर्ष। पर देखो यह अपना आनन्दमय पुनीत नववर्ष। हिन्दी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। परे हो विश्व से आतंक की घटाएं। पूरित हो सबकी सम्पूर्ण अभिलाषाएं.... . परिचय :- भारत भूषण पाठक देवांश लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' ...
होली खेलूं कैसे
कविता

होली खेलूं कैसे

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** तुम बिन मांग सूनीहुई, सूना दिन सूनी रात, आंखें गंगा जमुना बहती, बुझ गई सारी मन की आस, रंगीन दुनिया बेरंग हुई, अपने मन को बहलाऊँं कैसे? किसे रंग लगाऊँ सजनवा? बताओ होली खेलूं कैसे? कहा था होली पर आऊंगा, सब के लिए कुछ ना कुछ ना, लाऊंगा, मुन्नी के लिए गुड़िया, तुम्हारे लिए चूड़ियां लाऊंगा, आए तो तीन रंग में लिपटे, मन को ढांढस बंधाऊँ कैसे? मैं होली खेलूं कैसे? पापा तो जैसे पत्थर हो गए, शून्य में देखा करते हैं, उदासी चेहरे पर छाई, मुंह से कुछ ना कहते हैं, गर्व है शहादत पर उनके, पर दिल को समझाऊं कैसे? मैं होली खेलूँ कैसे? मैं होली खेलूँ कैसे....? . परिचय :- श्रीमती शोभारानी तिवारी पति - श्री ओम प्रकाश तिवारी जन्मदिन - ३०/०६/१९५७ जन्मस्थान - बिलासपुर छत्तीसगढ़ शिक्षा - एम.ए समाजश शास्त्र, बी टी आई. व्यवसाय - शासकीय शिक्षक सन् १९७७ ...
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस व फागोत्सव पर काव्यनिशा सम्पन्न
साहित्यिक

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस व फागोत्सव पर काव्यनिशा सम्पन्न

महू। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एवं होली के पूर्व फागोत्सव के अवसर पर कोदरिया महू में अभा साहित्य परिषद, महू इकाई द्वारा कवि सम्मेलन आयोजित हुआ। एवं परिषद द्वारा महिला शिक्षिकाओं का सम्मान भी किया गया। दीपक जी पगारे के मुख्य आथित्य व शिवकुमार जी शर्मा के संयोजन में काव्यनिशा देर रात तक चली जिसमे सभी कवियों द्वारा होली व प्रेम गीत के साथ हास्य व शेरों शायरी की प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से दामोदर विरमाल द्वारा की गई। आमंत्रित कवियों में देवांशी गुर्जर - महाकाल की बेटी हूँ। रमेश जैन "राही" - क्या होते है कसमे वादे। एस के अस्थाना - कुछ लिखता हूँ कुछ। डॉ विमल सक्सेना - ना हिन्दू खतरें में है ना मुसलमान। डॉ. रामपाल वर्मा - कुछ मंदिर बनाये बैठे है कुछ। चंदना जी कोदरिया - चलो आज वादा करते है। दामोदर विरमाल - आओ खेलें होली। डॉ. जगदीश चौहान - बन्द करो वो बाबियाँ जहां। बिंदु क...
होली है
कविता

होली है

जनार्दन शर्मा इंदौर (म.प्र.) ******************** बुरा ना मानो होली है। ढोलक कि मादक थाप पर, हाथो में रंग लिये चली टोली हैं टेसू के फुलो से रंगी ये धरती, ठंडी बयार की ठिठोली है। प्रेम के रंगो से रंग दो आज कान्हा प्यार की होली है। उड़े रंग गुलाल कहे सखी सबसे, बुरा ना मानो होली है। पत्नी होती गुस्से में लाल, पीली ,पति चढ़ाये भांग गोली बच्चे करते मस्ती पास, पड़ोस के चेहरे गुस्से से लाल हो,हो,हाहा अआ कि आवाजो पे नचवाए ढोली हैं बुरा ना मानो होली है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ससुराल में गये जमाई, सालीया देख हैं मुसकाई, जिजाजी की रंगो से, सब करती पुताई, हैं बरबस ही देती गारी, नही निकलती बोली है। बुरा न मानो होली है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। दल बदल का खेल बुरा है, नेताओ का हाल बूरा हैं बातो का किचड़ उछाले, सत्ता हथियाने कि होड़ में अब तो खुलेआम, लगती नोटो कि बोली है। बुरा न मानो होली है.... . पर...
फागुन बसंती
गीत

फागुन बसंती

रागिनी सिंह परिहार रीवा म.प्र. ******************** बसंती बहारो में, फागुन के महीन, अब लौट भी आओ तुम, होली के फुहरो में.... इतने सारे रंग पहले नहीं देखे, जब होली आयी तोरंगो के रंग देखे अब लौट भी आओ तुम, होली के फुहरो में.... ब्रज की गलियो मे, गोकुल नगारियो में, निधिवन में खेलेगे,मोहन संग होली अब लौट भी आओ तुम होली के फुहारो में.... राधा संग खेलेगे, ललिता संग खेलेगे, गोपियां संग खेले, वृंदावन में होली अब लौट भी आओ तुम होली के फुहारो में.... मीरा की निराशा मैं, पपिहे की तरह टेरु, बन-बन डोलूं मैं, हर सास तुझे टेरु अब आ जाओ मोहन फागुन के महीन में। बसंती बहारो में, फागुन के महीन में, अब लौटे भी आओ तुम होली के फुहारो में.... . परिचय :- रागिनी सिंह परिहार जन्मतिथि : १ जुलाई १९९१ पिता : रमाकंत सिंह माता : ऊषा सिंह पति : सचिन देव सिंह शिक्षा : एम.ए हिन्दी साहित्य, डीएड शिक्षाशात्र, प...
महिला दिवस
कविता

महिला दिवस

सरिता कटियार लखनऊ उत्तर प्रदेश ******************** बनी हूँ टपोरी में रा जेंडर है छोरी हटके हूँ थोड़ी कोई डारे ना डोरी निकले दिवाला जिसकी लूटूं मै खोली उसकी हो खाली मेरी भर जाये बोरी टोपी पहनाने में बाज़ी हमने मारी जीती हमेशा हमसे ये दुनिया हारी डरने लगी है हमसे दुनिया सारी नटखट नखरीली हूँ थोड़ी बेचारी जिसने भी देखा उसको लगती हूँ प्यारी विरली अनोखी सीधी सादी हूँ नारी . परिचय :-  सरिता कटियार  लखनऊ उत्तर प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी क...