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आखरी चाय
कहानी

आखरी चाय

 दीपक कुमार दिवाकर मधेपुरा (बिहार) ******************** आज सुबह सुबह मोहल्ले के लोग अपनी-अपनी बालकनियों से चेहरे पर उदासी और दिलो में डर लिए बस राजीव के दरवाजे की तरफ नज़र टिकाये हुए उस एम्बुलेंस को देख रहे थे, जिसमे राजीव को बिठाया जा रहा था। उसने अपने पत्नी रीमा की और देखते हुए कहा क्या तुम फिर से अपनी हाथो की चाय पिलाओगी ना? यह पूछते वक़्त उसकी लाल खुश्क आंखों पे आंसू थे,शायद उनकी आंखों की उम्मीदे टूटती हुई नजर आ रही हो। दिलासा देते हुए रीमा कहती हैं, "हाँ राजीव हम फिर से साथ बैठकर चाय पियेंगे" ये कहते हुए मानो उनका दिल बैठा जा रहा हो। तभी पीपीइ किट पहने हुए चिकित्साकर्मी एम्बुलेंस का दरवाजा बंद कर अस्पताल की ओर चल पड़े। तीव्र ज्वर से तड़पते राजीव की साँसें उखड़ सी रहीं थी, ऑक्सिजन नली के सहारे मिल रही उधार की साँसों ने मानो उसका जीवन कुछ पल के लिये थाम रखा हो। उधर दूसरी ...
एक भावनात्मक पत्र
आलेख

एक भावनात्मक पत्र

डॉ. विनोद वर्मा "आज़ाद"  देपालपुर ********************** प्रियवर, आप और घर पर सब कैसे है? अपना और परिवार का ध्यान रखे। इस वैश्विक महामारी के दौर में घर मे ही रहे, सुरक्षित रहे। इस सदी में पहला ऐसा मौका आया है की घर-परिवार के बीच लम्बे अरसे तक साथ रह सके। अतः प्रतिदिन पकवान बनाएँ, नई-नई डिश, रेसिपी बनाकर, बनवाकर खाएं और प्रेम पूर्वक, आदर सम्मान के साथ खिलाएं, स्वास्थ्य रक्षकों, सफाई कामगारों, पुलिस प्रशासन आदि का सम्मान, सत्कार करें। यही हमारी आप सबकी सांस्कृतिक पहचान और पुरातन संस्कार है। कहावत है - १. धन तो हाथों का मेल है २. रुपया-पैसा तो नाचने - गाने वाले भी कमा लेते है। ३. भिक्षावृत्ति भी धन दिला देती है। क्यों कहा जाता है धन हाथों का मेल है? क्यों कहते है रुपया-पैसा तो नाचने गाने वाले भी कमा लेते है? क्यों कहा गया है - भीख मांगकर भी धन जोड़ा जा सकता है? जब हम स्नान करते है तब साबुन क...
मत रोने की आदत रखिये
ग़ज़ल

मत रोने की आदत रखिये

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** मत रोने की आदत रखिये। जीवन की कुछ, कीमत रखिये। हो सकता है, हाथ तंग हो ? दिल में मगर, मुहब्बत रखिये। उठी जीभ और चली लट्ठ सी, थोड़ी बहुत, शराफत  रखिये। बाद मौत के, ज़न्नत कैसी ? दुनिया को ही, ज़न्नत रखिये। "प्रेम" से पूछा, कब आओगे? बोले, जिस दिन दावत रखिये। . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्र...
दानवता स्वीकार
कविता

दानवता स्वीकार

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** समर्पित - अवनि से अम्बर तक प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से मानव जाति के अधिकृत अतिक्रमण पर। उद्देश्य - प्रकृति-जीव संरक्षण। पशु-पक्षी पर बाज ना आये, करके अत्याचार। मानवता की अति कर्मगति, धरा देय चित्कार। अंध मार्ग औचित्यहीनता, हुआ बहु विस्तार। स्व स्वारथ निज सुविधा हेतु, रौंदे तिमिर हज़ार। छीन लिए मासूम खगों से, उनके घर- संसार। स्वास् वास् अब शुद्ध नहीँ, हवा में ज़हर घुलाया है। मानव के अधिकारों ने कुछ, ऐंसा तांडव मचाया है। जीवन से बढ़कर हो चले, वैनाशिक आविष्कार? मैं मानव हूँ और हैं केवल, मेरे ही अधिकार। इस विकार से कर चुका, दानवता स्वीकार। मति भ्रमित कर ली स्वयंमय, करके अंगीकार। सर्वाधिकार सुरक्षा पर, लगातार प्रहार? राष्ट्र हितैषी नीति की पगबेड़ि, बने हर बार। ऐंसे मानवाधिकार को, बार-बार धिक्कार। इसी हेतु कर्तव्...
कहर
कविता

कहर

निर्मला परिहार पाली (राजस्थान) ********************** मेरा देश लहलहता था। फूलों की वादियों से। अचानक यह क्या हो गया? इस कदर मची है त्राहि-त्राहि चारों ओर। दरबार कभी जिनका बंद ना हुआ। वह मंदिर मस्जिद गिरजाघर शांति से बैठे आज। कहर ये कैसा छा गया? अचानक ये क्या हो गया? कि मातृभूमि का लाल। रात दिन हर पहर। गली-गली दे रहा है पहरा। दूजी तरफ वो मां का लाल, अस्पताल में बेफिक्र कर्तव्य निभाता। अचानक ये क्या हो गया? जो मानव कभी रुका नहीं शांति से बैठा आवास में। विडंबना की स्थिति में। सरकार का सहयोग सही। क्योंकि कोरोना का कहर है ऐसा सांसे छीन ली जीव की। तो क्यों ना हम सब। इस मुश्किल दौर में। मातृभूमि और मां के लाल की, तरह अपना कर्तव्य निभाएं। घर पर रहे! सुरक्षित रहे। रास्ता बस यही एक सही संकल्प लिया यह। पुनः देश लहराएगा।। . परिचय :-  निर्मला परिहार आयु : २३ वर्ष शिक्षा : बी.एड. द्वितीय वर्ष छात्रा...
जहर का प्याला
कविता

जहर का प्याला

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** होठों पर है जहर का प्याला एक तुम्हारा नाम कान्हा जब मीरा के मन को भाता है स्मृति में सब आ जाता है जाने ऐसा क्यों होता है सब कुछ मन बिसराता है प्रेम भरी लगती है दुनिया प्रेम पुजारी मीरा का मन जाने क्यों कान्हा में खो जाता है एक तुम्हारा नाम कान्हा जब मीरा के मन को भाता है जहर का प्याला पी जाती है प्रेम दीवानी मीरा हो जाती है।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा साहित्यिक : उपनाम नेहा पंडित जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल,हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) इंदौर, कवि कुंभ देहरादून, सौरभ मेरठ, काव्य तरंगिणी मुंबई, दैनिक जागरण अखबार, अ...
अंकिता ने किया लगातार ६० मिनिट नृत्य
गुण श्रेष्ठता, संगीत

अंकिता ने किया लगातार ६० मिनिट नृत्य

भवानीमंडी। देश की कत्थक नृत्य की उभरती नृत्यांगना अंकिता वाजपेयी ने २९ अप्रैल विश्व नृत्य दिवस के अवसर पर घर पर ही शाम ७ से ८ बजे (६० मिनट) तक लगातार बिना रूके कोरोना जागरूकता व कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में फेसबुक लाइव पर नृत्य प्रस्तुति दी। चेहरे पर वही ताजगी रही। अंकिता वाजपेयी ने नृत्य प्रस्तुति से पूर्व कहा कि सारे देश को कहना है सबको घर पर रहना है, करो नमस्ते, मोदी जी हमारे, जीतेगा इंडिया, घर पर ही रहो ना, कोरोना से डरो ना, देश अपना होगा प्रकाशवान, मैं देश नहीं मिटने दूँगा, ये मत कहो खुदा से, कोरोना फैल जाता हैं जैसे अनेक कोरोना जागरूकता गीतो पर नृत्य प्रस्तुति दी।   आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल...
दावानल
कविता

दावानल

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** आग जिस्म के तहखाने में लगी सारे जिस्म में फैल रही है। निकलने लगी है, चिंगारियां, आँखों की खिड़कियों से। सावधान सावधान, निजाम चलाने वालों लग रहा है, आग बेकाबू हो कर फैलने वाली है। चिंगारियों की जगह कुछ ही देर में निकलेगी आँखों से आग की लपटें धधक उठेगा सारा जिस्म आग से। खोजो, खोजो आग लगने के कारण खोजो वरना, सारा निज़ाम आग की चपेट में आ जायेगा। फिर कुछ न बचेगा न निज़ाम न भूख। बचेगी, सिर्फ राख इतिहास की राख। निज़ाम - प्रशासन व्यवस्था दावानल - जंगल की आग . परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० स...
पतंग
लघुकथा

पतंग

मनीषा शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मुझे आज भी याद है संक्रांति का वह दिन जब मैं और मां छत पर पतंग के देख रहे थे खुले आसमान में उड़ती रंग बिरंगी पतंगों को देखकर मन आनंदित हो गया। मैंने मां से कहा काश मै भी एक पतंग होती नीले आसमान की सैर करती, रंग-बिरंगे चटक रंगों से अपने आप को सजाती संवारती। तब मां ने कहा गुड़िया औरत भी तो एक पतंग ही है जो सजती है, संवरती है और अपने अरमानों से उड़ान भरती है पर पतंग की डोर हमेशा किसी और के हाथ में होती है और डोर थामने वाला पिता, भाई, पति और पुत्र है जो हमेशा अपनी इच्छा से पतंग की उड़ान तय करता है और अपनी उंगलियों पर पतंग को नचाता है पर बिटिया अब जमाना बदल रहा है हर चीज ऑटोमेटिक हो रही है तो तुम भी स्वतंत्र पतंग बनना अपनी उड़ान अपनी शर्तों पर उड़ना। मां की वही बात आज भी जीवन में प्रेरणा देती है....। . परिचय :-  मनीषा शर्मा जन्म ...
कामयाबी का मंजर
कविता

कामयाबी का मंजर

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** क्यों हार हुई उस गलती को तुम फिर से अपने अंदर देखो, ना इधर देखो, ना उधर देखो सिर्फ भविष्य में कामयाबी का मंजर देखो सोचो क्यों आगे बढ़ती है, लहरों से नौका लड़ती है। तब जाकर नौका उस, दरिया को पार करती हैं। भूल जाओ सब को बस खुशियों का समंदर देखो, ना इधर देखो, ना उधर देखो सिर्फ भविष्य में कामयाबी का मंजर देखो मंजिल की करो तालाश तुम, खुद पर रखलो विश्वास तुम। कभी आये जीवन में मुश्किल तो, ना होना कभी निराश तुम, तुम जीतोगे हर मुश्किल से, बस अपने आप मे सिकंदर देखो। ना इधर देखो, ना उधर देखो सिर्फ भविष्य में कामयाबी का मंजर देखो सुख दुःख तो मेहमान हैं, जीवन मे सदा ही आते हैं कभी देते है जी भर खुशियां, कभी सबको यही रुलाते है। क्यों हार हुई उस गलती को तुम फिर से अपने अंदर देखो, ना इधर देखो, ना उधर देखो सिर्फ भविष्य में कामयाबी का मंजर देखो ...
पत्र जो लिखा पर भेजा नहीं
कविता

पत्र जो लिखा पर भेजा नहीं

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** एक पत्र भगवान के नाम लिखा था मैने भगवान से गुजारिश ये किया था मैने हे भगवान मेरी माँ मुझे वापस दे दो बदले में तुम मुझसे चाहे ले लो हे भगवान मेरे पिता मुझे वापस दे दो बदले में तुम मुझसे चाहे जो ले लो मैं माँ की गोद में एक बार सोना चाहती हूँ पिता से खिलौना की जिद करना चाहती हूँ हे भगवान एक बार मेरी विनती सुन लो बदले में चाहे तुम मेरे प्राण ले लो माँ पिता आज भी बसते हैं दिल की क्यारी में वो पत्र आज मुझे मिली पुरानी डायरी में . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० सम्मान से सम्मानित  आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताए...
लाकॅडाउन से छूटा नशा
कविता

लाकॅडाउन से छूटा नशा

राधा शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** माना करोना को करना है हमे बहार लगी है जिन्हें बुरी आदते तम्बाकू,गुटका और शराब छोड़ बुराई आज रे नशा बुरा इक काज रे लाकॅडाउन का है ये फायदा सिखा रहा तुम्हें सही कायदा छोड़ रे बन्दे अब ये काम नशे से होता काम तमाम तम्बाकू,सिगरेट और शराब बन्द पड़ी सब दुकान मन से इसको दूर भगाना इस पर भी तो रोक लगाना छूट जायेगी लत ये बन्दे नशे के काम बहुत है गन्दे थूक-थूक घर किया खराब अब पियो न तुम ये शराब करती घर को यह बर्बाद दारू सिगरेट हो या तम्बाकू मन को रोककर कर लो काबू मानो तुम ये मेरी बात रहना हो यदि सबके साथ नशे से दूरी बनालो आज . परिचय :- राधा शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, ...
सूरज ने
कविता

सूरज ने

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** पूर्व दिशा में उदित हुआ तो तिमिर भगाया सूरज ने! भूमंडल पर रश्मि पुंज का शिविर लगाया सूरज ने! गई निशा कजरारी काली, हुए प्रकाशित जड़-चेतन। छाई शुभ सुखदाई लाली, जाग उठे सोए जीवन। झूम उठे जन, मधुर जागरण गीत सुनाया सूरज ने। भूमंडल पर रश्मि पुंज का शिविर लगा या सूरज ने! उड़े गगन में विहग प्रफुल्लित, ईश-वन्दना विरत हुए। हुए अग्रसर व्योम मार्ग पर, आलस के क्षण विगत हुए। जीव जगत को कर्तव्यों का पाठ पढ़ाया सूरज ने! भूमंडल पर रश्मि पुंज का शिविर लगाया सूरज ने! सुमन बनीं कितनी ही कलियाँ, सूर्य मुखी ने किया प्रणाम। उत्साहित थी अधिक चपलता, उदासीन हो गया विराम। नयन-नयन को सुन्दरता की ओर बुलाया सूरज ने। भूमंडल पर रश्मि पुंज का शिविर लगाया सूरज ने। . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज...
कैंसर के कारक
आलेख

कैंसर के कारक

योगी मनोज गर्ग इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** साथियों, पिछले दो दिनों में लगातार भारतीय सिनेमा के दो सितारों का कैंसर से असमय ही देहांत हो गया है। बिगड़ी हुई जीवनशैली में पिछले वर्षों में कैंसर रोग बहुत तेज़ी से पूरे विश्व मे बढ़ते जा रहा है। भारत मे प्रतिवर्ष लगभग १०-१२ लाख लोग कैंसर से ग्रस्त हो जाते है। पंजाब में तो कैंसर के इतने पेशेंट है कि वहाँ से चलने वाली एक ट्रेन का नाम ही कैंसर ट्रेन रख दिया गया है। हर कुछ घर छोड़कर मिलते जाते कैंसर रोगियों की बढ़ती संख्या भयावह स्थिति की और इशारा करती है। क्या कारण है इस भयानक रोग के ....??? क्या सिर्फ तम्बाखू और शराब से ही कैंसर होता है? भारत मे तो बहुत कम महिलाएं इनका सेवन करती है फिर फीमेल कैंसर पेशेंट की संख्या पुरुषों के बराबर क्यों?? एग्रीकल्चर में घातक केमिकल्स का बढ़ता उपयोग बिना केमिकल के अब फल, सब्ज़ी, अनाज की खेती होती ही नह...
सुनो प्राणप्रिय
गीत

सुनो प्राणप्रिय

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सावन का मोर संग लहरों का शोर संग पतंग का डोर संग चांद का चकोर संग रातों का जो भोर संग नाता ज्यों सुहाना है सुनो प्राणप्रिय तुम्हे मुझे संग संग ऐसे ही निभाना है। नदी का किनारों संग फूलों का बहारों संग डोली का कहारो संग नैनों का इशारों संग मौसम का नजारों संग नाता ज्यों सुहाना है सुनो प्राणप्रिय तुम्हे मुझे संग संग ऐसे ही निभाना है। मन का जो मीत संग जग का जो रीत संग पाती का जो प्रीत संग बाती का जो दीप संग स्वाति का जो सीप संग नाता ज्यों सुहाना है सुनो प्राणप्रिय तुम्हे मुझे संग संग ऐसे ही निभाना है। गीत का संगीत संग प्यासे का जो नीर संग पंछियों का जो नीड़ संग काजल का जो दीठ संग आंसू का जो पीर संग नाता ज्यों सुहाना है सुनो प्राणप्रिय तुम्हे मुझे संग संग ऐसे ही निभाना है। जग बैरी रूठे चाहे सांसों की ये माला टूटे शूल मिले चाहे मुझे ...
अंगा री हड़ताल
आंचलिक बोली

अंगा री हड़ताल

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** एक्क दिन सबीं अंगा ने बैठक बुलाई... सोचि बचारी के, गल्ल गलाई। ऐ पेट नहीं करदा, काम्म ना कार,,,,, जेब देखो, खाई के रोटी, मारुंआं डकार। सारा दिन हांए, मरदे-खपदे।। थकि के हुई जाउंआं बुरा हाल। पैरा ने आपणी तौंस जमाई, हांए, हांडि फिरि के करुंए कमाई। हाथ्थां ने भी दुखड़ा सुणाया... खाणे-पिणे रियां चिजां ल्याओ, तेब ऐस पापी पेटो तिकर पहुंचाओ, पर बसर्म पेटो ने कदि जस नी गाया। नाक, कान्न, जीब बी तुनके, आकड़ि के बोले,,,,, आलसी पेटो जो देयो दो-चार छुनके। दान्दा ने भी दांद द्खाए... ऐ-पेट, खसमां जो खाए।। करि के हड़ताल...बोले.. मोटा पेट हाए-हाए। चंउं दिन्ना बाद, अंगा री अक्ल ठकाणे आई।। पैर अकड़े, हाथ्थ सुकड़े, कान्ने सुणणा बंद। हाखिं री बी हालत माड़ि, जीब सुकिगी सारी। सिर चकराया, कांदा नाल टकराया।। पंजुए दिन्...
जय मां बगलामुखी
कविता

जय मां बगलामुखी

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** पीतांबरा है नाम तुम्हारा। दसमहाविद्या में आठवां स्थान तुम्हारा।। सिद्धिदात्री तुम कहलाती। वाक् सिद्धि को सिद्ध कर जाती।। वाद-विवाद में विजय दिलाती। शत्रु का स्तम्भन कर जाती।। पीतरूप मां को है प्यारा। जन-जन को लगे हैं न्यारा।। पाप पाखंड को दूर है करती। शत्रु की जीवा को हरती।। "वीर रात्रि" की जो साधना करता। छत्तीस अक्षर मन में धरता।। कमी कोई रहने ना पाएं। तंत्रिका-मंत्रिका सिद्ध कर जाएं। बगला सिद्ध विद्या वह पाएं। एकाक्षरी मंत्र जो सिद्ध करे जाएं। हर संकट से मां बचाएं। बुद्धि-सिद्धि जय मां से पाएं। वीरवार को ध्यान जो करता। मां से उसको ज्ञान है मिलता।। . परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते...
मै कामगार हूँ
कविता

मै कामगार हूँ

गोविंद पाल भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बहुत उम्मीदें बांधी थीं हमने तुमसे हम भी देखे थे कितने सारे सपने, अपना समझकर सत्ता पर बिठाया पर तुम नहीं निकले कभी अपने। समझने की कभी कोशिश नहीं की कैसे बनायें रखें हमारा स्वाभिमान, जब बुनियादी हक ही हमें न मिले तो समझो ये मानवता का अपमान। हम तो कामगार है हम कामचोर नहीं पर हमें उचित रोजगार और काम दो, खैरात बांट बांट कर पंगु बना दिये हो अब हमें कामचोर का न बदनाम दो। अशिक्षित अनपढ़ और गंवार हूँ भले ही पर मैं आत्मसम्मान के लिए लड़ता हूँ, हो सकता है तुम ढेरों पुस्तक पढ़े होंगे पर मैं तो जिन्दगी का किताब पढ़ता हूँ। हैसियत की बातें मत करो तुम मुझसे पूंजी है मेरी जिंदादिली की खुद्दारी, उॠण होने के लिए बहाता हूँ पसीना नहीं कर सकता हूँ धरती माँ से गद्दारी। पर शोषण के खिलाफ ऊंगली उठाता हूं जो हक के लिए संघर्ष करना है जरूरी, इंसानियत का तका...
तुम कब जाओगे…! अतिथि…!
आलेख

तुम कब जाओगे…! अतिथि…!

अर्चना मंडलोई इंदौर म.प्र. ******************** अतिथि! तुम्हारा जब आगमन हुआ था, तो हम सबने यही सोचा था कि मेहमान हो कुछ दिन ठहर कर चले जाओगे। लेकिन अब तो बार-बार पूछना पड रहा है.... अतिथि तुम कब जाओगे? तारीख पर तारीख और फिर तारीख! लेकिन तुम तो बेशर्म की तरह यहाँ पैर पसारे जमने की कोशिश कर रहे हो। तुम अपने खौफनाक डरावने चेहरे की छाप मेरी जमीन पर डाल तो चुके हो पर तुम ये भी जान लो कि तुम मेरी जमी और मेरे अपनों को बहुत आहत कर चुके। क्या तुम नहीं जानते ये हौसलो की जमी है, तुम्हे मूँह की खानी ही होगी। जब तुमने अपने आने की आहट दी थी, तब मेरा मन अज्ञात आशंका से धडक उठा था। अंदर ही अंदर मै मेरे अपनो के लिए काँप गई थी। हम सतर्क भी थे, हमने वितृष्णा से तुम्हारा तिरस्कार भी कर दिया था। फिर भी तुम न जाने कैसे बेदर्दी से मेरे अपनो को लील गए। मेरी आशंका निर्मूल नही थी ! तुम नहीं गए ! तुम्हें भगाने के ...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था भाग : ०८
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था भाग : ०८

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** दोपहर एक बजे के लगभग उज्जैन से इस घर के दामाद और मेरे पिताजी पंढरीनाथ उनके घर छत्रीबाजार न जाते हुए सीधे इधर इस बाड़े में ही आ गए। पुत्र प्राप्ति का तार मिलने के बाद तुरंत यहां आते हुए रास्ते भर वे प्रसन्नचित्त ही होंगे। लेकिन यहां इस बाड़े में सर्वत्र ख़ामोशी का माहौल था। उन्हें विचित्र लगा। पर उन्हें अन्दर आंगन में आते देख एक बार फिर से औरतों का जोर से रोना शुरू हो गया। उन्हें कुछ समझ में नहीं आया। पर अगले ही क्षण उनकी नजर मंदिर से सटे बरामदे में रखी मृत देह पर पड़ी। आशंकित मन से, हाथ की थैली एक ओर फेंक कर वें तुरंत उस ओर तेज कदमों से चल कर गए। देखा तो उनके होश उड़ गए। उनकी पत्नी की मृत देह जमीन पर रखी थी। 'शा ..लि...नी ...! 'उन्होंने जोर से चिल्लाने का प्रयास किया, परन्तु सदमे से उनके शब्द गले में ही अटक गए। वें नीचे जमीन पर बैठ गए। मृतद...
मेरी आरज़ू
ग़ज़ल

मेरी आरज़ू

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ अरकान- मु-त-फ़ा-इ-लुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन   मेरी आरज़ू रही आरज़ू युँ ही उम्र सारी गुज़र गई। मैं कहाँ-कहाँ न गया दुआ मेरी बे-असर ही मगर गई।। की तमाम कोशिशें उम्र भर न बदल सका मैं नसीब को। गया मैं जिधर मेरे साथ ही मेरी बेबसी भी उधर गई।। चली गुलसिताँ में जो आँधियाँ तो कली-कली के नसीब थे। कोई गिर गई वहीं ख़ाक पर कोई मुस्कुरा के सँवर गई।। वो नज़र जरा सी जो ख़म हुई मैंने समझा नज़र-ए-करम हुई। मुझे क्या पता ये अदा थी उनकी जो दिल के पार उतर गई।। मेरे दर्द-ए-दिल की दवा नहीं मेरा ला-इलाज ये मर्ज है। मुझे देखकर मेरी मौत भी मेरे पास आने में डर गई।। ये तो अपना अपना नसीब है कोई दूर कोई करीब है। न मैं दूर हूँ न करीब हूँ युँ ही उम्र मेरी गुज़र गई।। ये खुशी निज़ाम कहाँ से कम कि हैं साथ अपने ...
मेहनतकश
कविता

मेहनतकश

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ना ठौर कि हैं, आज फ़िकर, कल का भी,ना था कोई गम, चल पड़े ले पल के स्वप्न, कल की फिर, क्यो सोचें हम... मेहराब बन के, क्यो सजे, जब तृप्ति हो बन नीव हम, आज यहां, पल जाने कहा, निर्माण नव की शान हैं हम... ये आशिया तुम्हें ही मुबारक, हमें हैं यही, जहाँ का सुकू, हूँ ओढ़ता, खुला नील गगन, मिला जमी पे,गोदी सा सुकू... तन खारा सिंधु साथ मेरे, हमें जहाँ से, कोई आस नही, दिन भले हो मशक़्क़त भरा, पर रात हम सुकू के धनी... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविता...
कोरोना काल
कविता

कोरोना काल

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** हिंदी साहित्य जगत में अब तक आया है चतुर्थ काल भक्ति रीती वीर और आधुनिक काल यह पंचम काल बनकर उभरा है यह भयावह विस्मयकारी कोरोना काल यह किसी? प्रकृति की नियति है की मानव है कैद महाभूल में भविस्य काल की अंधकार में। वुहान सहर चीन राष्ट्र ने। पूरी मानवता को झोंक चुका लॉकडौन की हाहाकार और अंधकार में। पंचम सुर में बज रहा यह कोरोना की दुखद भयावह राग। हाय यह कैसा आया? कोरोना का दुखद काल मानव मानव से संसंकित है वेहद दुखद यह संतप्त घड़ी है दिख रही सामने आने वाली भूख मेरी और विपदा की घड़ी है जागो जागो है त्रिपुरारी घट घट के वासी फिर से तू विश पान करो कोरोना का संघार करो अमृत कलश को छलकवो है अभ्यंकर हे नटराज फिर दे दो अभय दान मिट जाए यह मानवता का दुखद काल तेरे चरणों मे है इस अकिंचन का सहस्त्रो प्रणाम। . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्या...
तुम कितना हमको भूल सके
कविता

तुम कितना हमको भूल सके

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** खुशियों संग आबाद रहीं पर कुछ यादें नाशाद रही, हमें छोड़ जो हुए बेवफा हर पल उनकी याद रही। यादें तो काफिला बनाकर बढ़ती ही चली आती हैं, कर के गुज़रे लम्हों का उजाला नयी रौशनी लाती हैं। नींद में झकझोरते हैं हमको उनकी खुश्बू के झोंके, वही सुहाने ख्वाब दिखाने खुल जाते खामोश झरोखे। उनको पाकर के ज़ेहन में लहराते हैं प्यार के साये, वक्त थमे दिल कहता है बीते पल फिर जी जायें। धुआँ है ग़र माज़ी तो क्या वो भी है यादों का हरम, रोज़ वहाँ भी देखा हमने हो जाना पलकों का नम। मगर कहाँ ये मेरी किस्मत यादें मुझे सुला जायें, और मेरी हस्ती, बस्ती अपनी मस्ती में भुला जायें। मैंने तो यादों की रातें काटी हैं अपनी ही आँखों में, तुम कितना हमको भूल सके पूछो अपनी ही साँसों से। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शा...
संघर्ष
कविता

संघर्ष

मंगलेश सोनी मनावर जिला धार (मध्यप्रदेश) ********************** कोरोना से युद्ध हुआ, संघर्ष में कई दिन बीत गए। घर में बैठे हार गए, और रोजे वाले जीत गए।। हमने अपना विश्वास रखा, लॉक डाऊन और कर्फ्यू पर, खुला बाजार, लगी भीड़, गली, नगर चौराहों पर। तुष्टिकरण की राजनीति में सारा हर्ष समाप्त किया, रमजान की शुभकामनाएं मिली, माँ दुर्गा और भगवान को बिसरा दिया।। मजदूर, श्रमिकों, किसान की खातिर, लॉक डाऊन पर विचार होना ही था। ३ मई को निश्चित हुआ, संकल्प को दृढ़ तोलना ही था।। सौंपकर कमान प्रदेशों को मनमर्जी का रास्ता खोल दिया, देशभक्ति के ह्रदय में खंजर सस्ती राजनीति ने घोंप दिया। योद्धाओं के बलिदानों का थोड़े दिन और मान रखा होता, खुलना ही था लॉक डाऊन, सभ्य समाज का ध्यान रखा होता।। नही हटेंगे प्रतिबंध, संदिग्ध गलियों और चौबारों से, फिर भी कितना पालन होगा देकर छूट त्यौहारों में। त्यौहार ही मनाना हो तो घर में...