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बिजली का बिल- ४४० वोल्ट है छूना है मना …
व्यंग्य

बिजली का बिल- ४४० वोल्ट है छूना है मना …

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल बिजली का करंट सिर्फ पागलखाने में या बिजली के तारों में ही नहीं दिया जाता, बल्कि आपके घर में हर महीने बिल के रूप में भी आता है। यह पागल का इलाज करने के लिए नहीं, बल्कि आपको पागल बनाने के लिए है! पहले यह बिल दो महीने में आता था। लेकिन सरकार को लगा कि लोग कम पागल हो रहे हैं, इसलिए इसकी आवृत्ति बढ़ाकर मासिक कर दी गई। सरकार की महावारी की तरह यह भी हर महीने बिना नागा के आता है- इसमें मीनोपॉज़ की कोई गुंजाइश नहीं! वैसे सरकार भी लोगों की चिल्लपों से बड़ी परेशान थी। जब बिजली का बिल दो महीने में आता था तो सुरसा के मुँह की तरह दिखाई देता था। इसलिए उसे हर महीने कर दिया गया, ताकि बिल आधा लगे। लेकिन जैसे ही बिल आधा हुआ, लोगों का बजट गड़बड़ा गया। बचे हुए पैसों से गृहिणियाँ अपनी शॉपिंग करने लगीं, ब...
गजानंद स्वामी
आंचलिक बोली, भजन

गजानंद स्वामी

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी रिद्धी सिद्धि के तै स्वामी, तोरेच गुन ल गावत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो,पँवरी म माथ नवावंत हँव !! हे गणपति, गणनायक स्वामी, महिमा तोर बड़ भारी हे ! माथ म मोर मुकुट सजत हे, मुसवा तोर सवारी हे !! साँझा बिहिनिया करँव आरती, लडवन भोग लगावंत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! माता हवय तोर पारबती अउ पिता हवय बम भोला ! दिन दुखियन के लाज रखौ, बिनती करत हँव तोला !! पान-फूल अउ नरियर भेला, मै हर तोला चघावंत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! अंधरा ल अखीयन देथस अउ बाँझन ल पुत देवइयाँ बल,बुद्धी के तै हर दाता, सबके बिगड़े काम बनइयाँ !! हे गणराज, गजानंद स्वामी मै हर तोला मनावंत हव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! परिचय :- प्रीतम कुमार साह...
जागना-चेतना-मरना
कविता

जागना-चेतना-मरना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जागना संगीत छन रहा हो अँधेरे की जाली से रोशनी के मानिन्द राग. तुम हो जाओ विराग. संगति को रहने दो निर्लिप्त. नादब्रह्म मौन पोर-पोर से अनुभव करो जागने का आनंद I चेतना जिज्ञासा मरती है मायूसी छोड़कर. प्रेम मरता है उदासी छोड़कर. मनुष्य मरता है राख छोड़कर और स्मृतियाँ शून्य. हाँ, तारीखें मरती हैं तारीखें छोड़कर यूँ रिसता है कालपात्र और सबकुछ समा जाता है धरती के रहस्यमय हृदय में. मरना घराना अलग आलापचारी अलग लयकारी अलग आघात की गति और वज़न अलग. फिर भी यह एक ही बंदिश आ रही है अलग-अलग रागों में नए-नए रूप धरकर. अलग भावस्थिति अलग स्वर-रचना शब्दार्थ-गायन का अलग स्वर-विलास अलग विस्तार. मुक्त करो, मुक्त करो खुद को इस बंदिश से अन्यथा मैं मर जाओगे जन्मों तक यूँ ही मरने क...
वोट बैंक के खाते से
गीत

वोट बैंक के खाते से

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वोट बैंक के खाते से बस, खेलें नेता होली है। अवसरवादी राजनीति में, रोज़ पदों की डोली है।। धुत्त नशे में अब नेता हैं, कालिख मुख गद्दारी की। हुड़दंगी दल बदलू नाचें, हद होती मक्कारी की।। ढोल -मजीरे स्वयं बजाती, बड़ी प्रजा यह भोली है। घर-घर राजदुलारे जाते, भूल गये सब मर्यादा। दीप-तले ख़ुद अँधियारा है, कुचल गया चलता प्यादा।। फिरती झाड़ू उम्मीदों पर, लगे जिगर में गोली है। दल्लों की भरमार हुई है, आप जान लो सच्चाई । पिचकारी ई डी की चलती, रँगें जेल की अँगनाई।। मुखिया आँख बँधीं पट्टी है, शैतानों की टोली है। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति...
गणेश-वंदना
स्तुति

गणेश-वंदना

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** हे! विघ्नविनाशक, बुद्धिप्रदायक, नीति-ज्ञान बरसाओ। गहन तिमिर अज्ञान का फैला, नव किरणें बिखराओ।। कदम-कदम पर अनाचार है, झूठों की है महफिल। आज चरम पर पापकर्म है, बढ़े निराशा प्रतिफल।। एकदंत हे ! कपिल-गजानन, अग्नि-ज्वाल बरसाओ। गहन तिमिर अज्ञान का फैला, नव किरणें बिखराओ।। मोह, लोभ में मानव भटका, भ्रम के गड्ढे गहरे। लोभी, कपटी, दम्भी हंसते हैं विवेक पर पहरे।। रिद्धि-सिद्दि तुम संग में लेकर, नवल सृजन सरसाओ। गहन तिमिर अज्ञान का फैला, नव किरणें बिखराओ।। जीवन तो अब बोझ हो गया, तुम वरदान बनाओ। नारी की होती उपेक्षा, आकर मान बढ़ाओ।। मंगलदायी, हे ! शुभकारी, अमिय आज बरसाओ। गहन तिमिर अज्ञान का फैला, नव किरणें बिखराओ।। भटक रहा मानव राहों में, गहन तिमिर का आलम। आया है पतझड़ जोरों पर, पीड़ा का है मौसम।। प्रथम पूज...
वर्षा की बूंदे
कविता

वर्षा की बूंदे

रतन खंगारोत कलवार रोड झोटवाड़ा (राजस्थान) ******************** काले-काले मतवाले बादल, वर्षा का पैगाम है लाये। उमड़-घूमड़ और इठलाकर, प्रेम का यह संदेश सुनाये।।१।। आते-जाते जब बादल गरजे, बिजली भी अपना रूप दिखाए। गरज और चमक जब मिले साथ में, मानव-जन और हर जीव घबराए।।२।। अद्भुत, छटा निराली इसकी, कभी प्रेम तो कभी डर लग जाए। छमक-छमक कर मोर नाचे, बूंदें ऐसी की हीरे और मोती बिखराए।।३।। वर्षा की बूंदे जब धरा से मिली, कण-कण उसका महका गया । ऐसी छटा बिखरी नभ में, कोयल, पपिहा गीत है, गाये।।४।। हरियाली की चुनर ओढ़े, प्रकृति ने सोलह शृंगार किये। अदभुत, अनोखा रूप इसका, वर्षा के संग-संग जिए ।।५।। परिचय : रतन खंगारोत निवासी : कलवार रोड झोटवाड़ा (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
जंगल हर दिन रोता है
कविता

जंगल हर दिन रोता है

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** एक दिन मैं गुजर रहा था, शाहाबाद के जंगल से। पहाड़ों को काटकर बनाई गई, खुबसूरत डामर की सड़क पर। अद्भुत मनोहर कांतार, पर्वत के शिखर से तलहटी तक सघन आच्छादित सुरम्य। नदी, झरने, घाटी, जलाशय से भरा पूरा परिवार। असंख्य जीव,जन्तु,पशु,पक्षी, भ्रमर, तितलियाँ, फूल,फल, चारों दिशाओं में व्यापक विस्तार। मुझे देखकर सिसकने लगे पेड़, महुआ, पलास, शीशम, छिला। दहाड़े मारने लगे शमी,नीम और कानन के सब पहरेदार। असीम अरण्य रुदन सुनकर मैं भयग्रस्त कम्पित हृदय से विनीत स्वर में पूछा.. हे! विपिन क्या, कोई प्रलय का आभास हुआ या दावानल कही जल उठी। बियाबान में क्रंदन कैसा..? क्यों कोमल किसलय रो उठी। यह सुनकर मेरी मीठी बात, कुछ धीरज धरकर चुप हो फिर अटवी बोला मेरे से, ना प्रलय का आभास हुआ ना दावानल से डरता मैं। मेरे कंद,मूल,...
अब स्वीकर करो हमको
कविता

अब स्वीकर करो हमको

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अब स्वीकर करो हमको जीने का अधिकार मिला है, हम करते हैं स्नेह तुमसे ... आक्रमक नहीं है हम, असीम ... अनंत प्रेम, मानव से फिर क्यूँ प्रहार होता हम पर!! सदा निवेदन रहा हमारा हमे आजादी से जीने दो! खुली हवा में हम सबको स्वच्छंद किलोल करने दो!! शीतल मलय बन समा पाए तुम्हारे हृदय स्थल में, इतनी सी अभिलाषा है मन मे हमको भी थोड़ा स्नेह दे दो!! हम हैं निश्छल-कोमल, पावन मृदुलता से भरे हुए, बस एक बार अपने दिल मे थोड़ी सी जगह देदो!! यह क्रोध नफरत का सैलाब जो तुमसे होकर हम पर गुजरता है, उसको स्नेह के बंधन मे अब तो बंध जाने दो !! स्नेह-करुणा पाकर तुमसे जी उठें हम इस जग में, माणिक्य मोतियों की भाँति हमको भी समाज मे सजने दोl मैं ऋणी रहूँगा आजीवन, अविराम, तुम्हारा कर्म बनकर, दुआ ही दुआ दे...
श्री विघ्न हर्ता गणेश
भजन

श्री विघ्न हर्ता गणेश

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गणपति मंगल दायक हो तुम, सब के विघ्न हरो। शरणागत है शरण तुम्हारी, जीवन सुलभ करो। गणपति मंगल…. दीनबंधु, दीनानाथ, दयानिधी सब पर दया करो। सिध्द विनायक, जन गण नायक चिन्ता हरण करो। अनन्त भुवन के अधिपति हो तुम, मंछा पूरण करो। देकर वांछित फल सब को, मन हर्षित करो। गणपति मंगल… निर्मल मन हो, कपट न छल हो, भावना ऐसी भरो। मधुर हो वाणी, हस्त हो दानी, सक्षम ऐसा करो। राग द्वेष, मद निकट न आवे ऐसी दृष्टि करो। जन जन हो सुखी धरा पर, ऐसी वृष्टि करो। गणपति मंगल…. परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक :१४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि म...
पारदर्शिता गर चाहते हो
कविता

पारदर्शिता गर चाहते हो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** पतिव्रता मशीन की नीयत पर संदेह रखना बेमानी है, जरा याद करो अपने समय पर तुमने भी की बहुत सारी मनमानी है, मानाकि आप फूंक-फूंक कर कदम रखते थे, आपकी करतूतें लोगों को पता न होती थी तो सबका स्वाद शनैः शनैः चखते थे, अपना गुनाह स्वीकार नहीं रहे हो, गर्वोक्ति पल पाकर कितनों को क्या क्या नहीं किये और कहे हो, आप अपनी करतूतें भूल सकते हो पर समय का पहिया सब याद रखता है, आप ऐसे भी नहीं रहे जो गुनाह करने से कभी भी झिझकता है, मैं यह भी जानता हूं कि ये जो आपके भाई बंधु है जिसे अपना घोर विरोधी बताते हो, संवैधानिक तरीके वालों के हाथ चला न जाए सारी व्यवस्थागत जिम्मेदारियां तो दिन में कोस रात में क्यों गले लगाते हो, अपराध या ज्यादतियां करने वाला भले ही भूल सकता है अपना कर्म, मगर समय संजोये रहती सार...
बेरहम
कविता

बेरहम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** सिफारिश-ऐ-दौर चला है अपनों की जगह कोई ओर चला है। खुदगर्ज-ऐ-दौर चला है निस्वार्थी मनुज की जगह मतलबखोरों का क्षण चला है। बेवफ़ा-ऐ-दौर चला है महोब्बत की जगह रूप सम्मोहन का काल चला है। मलाल-ऐ-दौर चला है हमदर्द की जगह बेदर्द इंसा का वक़्त चला है। जहालत-ऐ-दौर चला है संज्ञान की जगह अविद्या का अंधकार का चला है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते ...
ऐसा बाग लगाओ माली
गीत

ऐसा बाग लगाओ माली

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** ऐसा बाग लगाओ माली, खुशबू बहे जमाने में। लूट सके सो जी भर लूटे कमी न पड़े खजाने में।। उड़ें तितलियाँ रंग बिरंगी, चिड़े चिड़ी डालों पर खेलें। मदमाते मधुकर कुछ गायें, पेड़ों से लिपटीं हों बेलें।। मद्धिम-मद्धिम चलें बयारें, मस्ती की झर उठें फुहारें, कोई कसर न रहे प्रेम की, परिभाषा बतलाने में।। ऐसा बाग .... ।।१।। थके पखेरू भली नींद लें, सुबह मिले कलरव सुनने को। थिरक उठे संगीत प्रीति का, गीत चलें सपने चुनने को।। महक उठे धरती का कण-कण, बीते मदिर राग में क्षण-क्षण, पत्ती-पत्ती खुली हवा में, लग जाए इतराने में।। ऐसा बाग .... ।।२।। कलियों को खिल जाने देना, फूलों को मुस्काने देना। जो भी आना चाहे साथी, खोलो फाटक आने देना।। चौकीदारों से कह देना, सबके कोप तलक सह लेना, कोई रोक-टोक मत...
एक औरत
कविता

एक औरत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** कितना गम दबाती मन मै, कितना गम वह पी जाती, ओरौ के खातिर जीती है वह, औरों के खातिर ही मर जाती? पल-पल जीती पल-पल मरती हर क्षण गिरकर फिर संभलती, अपने साहस अपने बल पर, गिरती पड़ती फिर उठती। मान, अपमान, नफरत,तिरस्कार, सब सहती जाती जीवन में। कभी सोचती कभी उलझन है, कभी उलझन को सुलझाती! कभी खुद उलझन में पढ़ जाती, हंस देती सब सह कर वह तो, नही खोलती मन का राज। हर नारी की गाथा है यह, हर नारी की परीक्षा है, चाहे रानी महारानी हो जग में, चाहे गरीब भीलनी वन की हो। चाहे सीता सतवंती नारी हो, चाहे प्यारी राधा रानी हो , चाहे सती सावित्री मीरा हो, अग्नि परिक्षा नारी की हो। "नारी की गाथा नारी की पहचान बखान कर रहा इतिहास है आज" परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (...
चित्रण
कविता

चित्रण

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चित्र पट सा चित्रित होता रवि रश्मि का चित्रांकान पीत, श्वेत, रक्तिम रश्मि का फैला आगन चीर सुनहरी लाल चुनरी निलाभ किनारी गगन की आती जाती नभ पटल मे सुन्दर नारी रत्न सी लहराती, फहराती आंचल चहू ओर दसो दिशा ऐ करती चन्चल। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह...
तीजा के तिहार
आंचलिक बोली, कविता

तीजा के तिहार

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) आवत होहीं गियाँ ओ, मोर भाई, ददा मन लेवाए ल। पोरा अउ तीजा के तिहार म, मइके जाहूँ मनाए ल।। मने-मन कुलकत हँव, फुरफुंदी बनके उड़ावत हँव। कपड़ा ल जोर डारेंव, बिहनिया ले सोरियावत हँव।। घेरी-बेरी निकल के देखत हँव, गली-खोर, अँगना म। बारह महीना के परब ए, बंधागेंव मया के बंधना म।। दाई के मँय ह दुलौरिन बेटी, ददा के सोनपरी आँव। भाई के मँय ह मयारु बहिनी, परुवार के जुड़ छाँव।। डेहरी म खड़े हे मोर बाबू, ए दे आगे मोला लेगे बर। जावत हँव लइका मन ल धरके, ए जी संसो झन कर‌।। भात रांध के तंय खाबे, हरिबे घर-कुरिया म अकेल्ला। कहूँ मोर सुरता आही त, ससुरार भागत आबे पल्ला।। बड़े किसान के तंय बेटा, बइला मन ल सुग्घर सजाबे। बइला दउँड़ खेल म जीतके, बइला के आरती उतारबे।। दीदी अउ बहिनी मन संग, सुख-दुख के गोठ गोठियाहूँ। माथा ...
जब नानी मरती है
व्यंग्य

जब नानी मरती है

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ********************  "मेरे बराबर काम करोगी तो नानी याद आ जाएगी"- मैने बेटी को उलाहना देते हुए कहा। "किसकी नानी मम्मी? आपकी या मेरी? आपकी नानी को हम जानते नहीं और अपनी नानी तो यहां हैं हीं। फिर याद करने की जरूरत ही क्यों?" मुस्कराते हुए बिटिया बोली। गलती का एहसास होते ही मैंने अपनी जीभ काट ली। बिटिया ठीक ही तो कहती हैं। काम और नानी का क्या संबंध? भला हो इन लिखने वालों का जिन। होंने नानी की वृद्धावस्था का ख्याल न कर उन्हें भी मुहावरों की लाइन में लगा दिया। नानी के आराम करने के दिन हैं या काम की लाइन में लगने के? "जरा से काम का नाम सुनते ही इनकी नानी मरने लगती है। "बिट्टू रुआंसा होकर बोला- "मम्मी क्यों वे वक्त नानी को कोसती रहती हो।नानी मर जाएंगी तो छुट्टियों में किसके घर जाएंगे? तुम्हें अपनी मम्मी के लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए।" बेटा नसीहत दे रहा है पर...
बिटिया
कविता

बिटिया

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** माँ से बिटिया का स्नेह होता है लाजवाब बिटिया को सुलाती अपनी गोदी में लगता है जैसे फूलों के मध्य पराग हो झोली में। माँ की आवाज कोयल सी और बिटिया की खिलखिलाहट पायल की छुन-छुन सी लगता है जैसे मधुर संगीत हो फिजाओं में। माँ तो ममता की अविरल बहती नदी बिटियाँ हो जैसे कलकल सी आवाज निर्मल पावन जल की लगता है जैसे पूजते रहे सदियों से इन्हे। माँ होती चांदनी सी बिटिया हो सूरज की पहली किरण दोनों देती है रौशनी अपने-अपने पथ/कर्तव्य की लगता हो जैसे भ्रूण-हत्या का अंधकार हटा रही हो माँ-बेटी से जन्म लेते है कई रिश्ते ये होती है समाज का आधार दोनों के बिना होता है जीवन सूना लगता है जैसे इनमे बसती जीवन की सांस। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज...
आज गोकुल में बाजे बधावा
कविता

आज गोकुल में बाजे बधावा

प्रो. डॉ. विनीता सिंह न्यू हैदराबाद लखनऊ (उत्तरप्रदेश) ******************** आज गोकुल में बाजे बधावा जनम लिए नंद कुमार आज गोकुल में बाजे बधावा नन्द जी के आँगन, यशोदा जी के आँचल खेलें जग पालन हार जिसे देख दानव डर जाते दुष्ट दलन जाके निकट ना आते दुष्ट दलन जाके भय से काँपे तेरी दाँट से रह्यो घबराय, हे मैया जग पालन हार देव आदि जाको पार ना पाये ऋषि मुनि जिसे बाँध ना पाये तैने ऊखल से दियो बांध, हे मैया जग करतार ग्वाल बाल मिल मोद मनायें घर घर नाचें मंगल गायें ब्रिज नर नारी हर्षाए, जनम लिए जग पालनहार ब्रिज नर नारी हर्षाए, जनम लिए धन-धन भाग नंद बाबा के धन्य भाग यशोमति मैया के जाकी गोद में करें किलकार, हो खेलें जग पालन हार परिचय :- प्रो. डॉ. विनीता सिंह निवासी : न्यू हैदराबाद लखनऊ (उत्तरप्रदेश) व्यवसाय : नेत्र विशेषज्ञ सेवा निवृत, भूतपूर्व विभागाध्यक्ष नेत्र विभ...
तिहार तीजा पोरा
आंचलिक बोली, कविता

तिहार तीजा पोरा

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता भादों महीना के तिहार तीजा पोरा! दाई, बहिनी मन ल रहिथे अगोरा! बछर म आथे बेटी माइ के तिहार, मइके जाए के करत रहिथे जोरा!! बरसत पानी करिया बादर छाय हे! भाई ह बहिनी ल तीजा ले आए हे! दाई के मया अउ ददा के दुलार ल, ठेठरी, खुरमी संग म धर के लाए हे!! भाई ल देख के बहिनी मुसकावत हे! मने मन म मइके ल सोरियावत हे! ले अब सुरु होगे तीजा के तियारी हे, गुलगुला भजिया, अइरसा बनावत हे!! मइके आके सुख दुख गोठियावत हे! जम्मों तिजहारिन करू भात खावत हे! नीरजला उपास रहे जम्मों उपासनिन, भोला शंकर कना माथ ल नवावत हे!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
दीवारें
कविता

दीवारें

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** दीवारें वही घर बनाती हैं जो मिलकर खड़ी होती है। तनहा पड़ी ईंटों की कोई पहचान नहीं होती।। नींव भले गहरी हो पर नफ़रते जब उनमें बोती है। गगनचुंबी नाम हो कर भी कभी आसमान नहीं होती।। तोड़ द्वेष की दीवारें आज नया विश्वास लिखें, हाथ दिलों पर रख कर प्यार का एहसास लिखें। लकीरें खींच कर रिश्ते मोहब्बत के बदनाम किए, दीवारों से ऊपर उठकर नभ में उड़ते परवाज़ लिखें। दीवारें चौकस ही रहीं जब तलक दरवाजा एक दिखे, खुशियां महफूज ही रही जो इरादे सबके नेक दिखे। निज स्वार्थ की खातिर झरोखे तुम ही बनाया किए, वो निगेहबान दीवार भी छलनी कैसे दर्द को लिखें। दीवारें सख्त जो है ये पुरानी सोच तुम्हारी दिखे, खड़ी कहां इनको करें ये जरूरत हमारी दिखे। घर भी इन्हीं से और नफरत भी इन्हीं से है, आओ सजाकर इनको प्यार का संदेश लिखें। परिचय :- सूर्यप...
भंवर
कविता

भंवर

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक ऐसे समय में जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है एक ऐसे समय में जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं एक ऐसे समय में जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है और भविष्य अनिश्चित अति असुरक्षित दिख रहा है एक ऐसे समय में जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है एक ऐसे समय में जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है एक ऐसे समय में जब सिद्ध किया जा रहा है कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है कि इस रात की कोई सुबह नहीं और मुर्गों की बांगों की गूंज भी लगातार माहौल को खदबदा रही है एक ऐसे समय म...
संकल्प
गीत

संकल्प

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** संकल्पों को शीश झुकाकर, संस्कार को ग्रहण करो। सद्गुण की माला फेरो तुम, सत्कर्मों को वरण करो।। मर्दन करके सदा दंभ का, एक नया इतिहास गढ़ो। पौरुष से जीतो इस जग को, सत्य राह पर सदा बढ़ो।। कुंठित मन के भाव त्याग कर, नित उत्तम आचरण करो। अंतर्मन विश्वास जगा कर, साहस संयम धैर्य रहे। शोषित जन के दग्ध हृदय में, शीतल जल भी स्निग्ध बहे।। दीनों के तुम बनो मसीहा, तन की पीड़ा हरण करो। स्वारथ के बादल उमड़े हैं, मानवता की ज्योति जगा। चीर-हरण रोको धरती का, चंदन माटी माथ लगा।। दुष्ट दानवों का वध करके, वीरों का अनुसरण करो। मायावी आँधी को रोको, छल- प्रपंच से सदा बचो। निष्ठाओं की डोर पकड़कर, कोमल सुर संगीत रचो।। सद्भावों की बाजे सरगम, यह प्रण तुम आमरण करो। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवास...
मैं सौमित्र
पुस्तक समीक्षा

मैं सौमित्र

सुधा गोयल द्वारा लिखित उपन्यास ‘मैं सौमित्र’ की समीक्षा लेखक :- नील मणि मवाना रोड (मेरठ) *************** विदुषी, प्रबुद्ध, सुविख्यात लेखिका श्रीमती सुधा गोयल जी ने अपने उपन्यास ‘मैं सौमित्र’ में रामचरित मानस के पात्रों का ‘मानवीकरण चिंतन’ कर वाकई साहस पूर्ण कृत्य किया है। प्रस्तुत हैं उपन्यास के कुछ अंश- मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अनुज लक्ष्मण इतना दीन हीन कैसे हो सकता है? जिसकी अपनी कोई इच्छा ना हो। बच्चे का स्वभाव अक्सर अपने जन्म दाता अर्थात माता पिता के ऊपर जाता है। यानी दशरथ और सुमित्रा। क्या सुमित्रा वास्तव में राजपुत्री थी या दासी? इस किताब की खोज यहाँ से प्रारंभ हुई। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया और अग्निदेव स्वयं खीर लेकर प्रकट हुए। कौशल्या, केकैयी राजा को प्रिय थी। इसी से आधी खीर कौशल्या को दी। तदनंतर सुमित्रा आ गई। तो बची खीर के दो भाग कर एक केकैयी को दिया। फिर बची...
समाधान जरूरी है
आलेख

समाधान जरूरी है

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** आज सूर्योदय होने से पहले ही घर के आंगन में प्रातः काल की ताज़ा हवा का आनंद लेने के लिये मैं अपने दैनिक कार्य से एक दम फ्रि हो गया और जैसे ही घर से निकले के लिए कदम बढ़ाया तो आंगन मे देखा गमले में फूल खिल उठा था और उससे थोड़ी ही दूर में ऊपर से रस्सी से बंधा हुआ आज का अखबार दिखाई दिया मैं थोड़ा सा चिंता मे डुब गया। क्योंकि पेपर वाला रोज़ की तरह विलंब न करके समय से पहले ही अखबार पहुंचा दिया था। फिर क्या अखबार हाथ में आते ही मै खुद को पढ़ने से भला रोक पाता? तभी देखा कि गहरे काले काले मोटे अक्षरों से हेड लाइन को देख मैं तो शून्य सा हो गया लिखा यूं था कि- 'अविचारी वाहन चालक' हेड लाइन पढ़ते ही मैं आग बबूला हो गया। मन को थोड़ा शांत किया और मैंने सोचा कि आज सही समय आ गया है जवाब देने का, अक्सर सोसल मीडिया में चंद टी.आर.पी.पाने के चक...
मिथ्या फड़फड़ाहट
कविता

मिथ्या फड़फड़ाहट

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** क्यों? अब टूट गया अहम का वहम तुम तो कहते थे सब कुछ मैं ही हूं। मेरे इशारे पर ही सब चलता है मैं न चाहूं तो यहां पत्ता भी न हिलता है क्या ? अब भी कोई पूछता मांगता है? शायद नहीं क्योंकि जिद्दी व्यक्तित्व हर किसी को रास नहीं आता है। बीत गया न वक्त चली गई न सत्ता आहत कर रहे है न अपने क्या अब भी बचा है अहम का वहम? परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित क...