स्नेह की ज्योति
प्रिन्शु लोकेश तिवारी
रीवा (म.प्र.)
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प्रिये लेकर दिया यूं चले आओ तुम
पिय के हिय को पावन बनाना तुम्हें।
पिय के हिय से तिमिर कि छाया हटा
हिय में स्नेह कि दीपक जलाना तुम्हें।
यह दीपो का उत्सव अनोखा प्रिये
आओ बाती सा हिय को नाजुक करें।
मन में बैठे पतंगें जो द्वेशों के है।
आओ मिलकर उन्हें भी भावुक करें।
चक्षु दिपे जो डूबी हुई है घृत से
बन बाती उजाला है करना प्रिये।
इस बार दिवाली मे नये ढंग से
हम दोनों को साथ है चलना प्रिये।
चलो स्नेह कि ज्योति जलाते है अब
तिमिर द्वेश कि छायी है सारे धरा पे।
चलो पहले तो अपना ही द्वेश जलाए
फिर स्नेह फैलाते है सारे धरा पे।
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लेखक परिचय :- प्रिन्शु लोकेश तिवारी
पिता - श्री कमलापति तिवारी
स्थान- रीवा (म.प्र.)
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