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मैं ही राम, मैं ही रावण
कविता

मैं ही राम, मैं ही रावण

********** जीत जांगिड़ सिवाणा (राजस्थान) हां रावण हूं मैं रावण हूं, धर्मशास्त्र का परमज्ञाता, शिव उपासक ब्राह्मण हूं, हां रावण हूं मैं रावण हूं। कुटिल नहीं मैं सरल हूं, अमी की धारा अविरल हूं, नहीं अपना मैं हित साधता, शिव को ही मैं श्रेष्ठ मानता, अनुशासन की मूरत अटल, परम धर्म परायण हूं, हां रावण हूं मैं रावण हूं। मैं हूं चार वेदों का ज्ञाता, तांडव स्तोत्र का रचयिता, मेरा बल मेरी ही शक्ति, प्रिय शंकर को मेरी भक्ति, मैं साहसी, मैं पराक्रमी, शास्त्र शस्त्र का मैं दर्पण हूं, हां रावण हूं मैं रावण हूं। मेरा राज था मेरी ही लंका, चहुंओर था मेरा ही डंका, फिर भी सीता का कभी, किया नहीं चरित्र कलंका, स्वयं की मुक्ति के हित में, राम को युद्ध निमंत्रण हूं, हां रावण हूं मैं रावण हूं। बार बार न मुझे बनाओ, बार बार न मुझे जलाओ, अगर राम तुम बन न पाओ, रावण ही बनकर दिखलाओ, संयम मुझ सा बरत बताओ, फिर...
फिर आओ राम…
कविता

फिर आओ राम…

********* दीपक्रांति पांडेय (रीवा मध्य प्रदेश) ज्ञान का ध्वज फहराओ राम, ले अवतार पुनः इस जग में, धर्म पाठ सिखलाओ राम, धरा पाप में डूबी जाए, ज्ञान, दीप, बुझता जाए, चारों दिशा पाप मंडराए, कलह बसा, सभी के मन में, मग्न हुए सब डीजे धुन में, सत्य मार्ग दिखलाओ राम, प्रेम राग सिखलाओ राम, ज्ञान का ध्वज फहराओ राम, ले अवतार पुनः इस जग में, एक बार फिर आओ राम...फिर आओ राम...फिर आओ राम... लेखिका परिचय :- नाम - क्रांति पाण्डेय, साहित्यिक नाम - दीपक्रांति पाण्डेय जन्मतिथि - ०६/०६/१९९४ माता स्वर्गीय - श्रीमती चंद्र कली पांडेय, पिता - श्री उपेंद्र कुमार पांडेय शैक्षणिक योग्यता - बी.ए.,एम ए.,एवं एम.फिल.(हिन्दी), माखनलाल यूनिवर्सिटी से पी.जी.डी.सी.ए. 2017 में, पी.एच.डी. अभी आरंभ हुई है। शा.विज्ञापन. महाविद्यालय रीवा से २०१६ में एन.सी.सी. पूर्ण। उपलब्धियां - आकाशवाणी रीवा द्वारा २०१३ एवं २०१४ से ...
धरा सी मैं
कविता

धरा सी मैं

********** प्रेक्षा दुबे उज्जैन ( म. प्र.) इस धरती सा हृदय लिए कुछ इस जैसी मैं जीती हूँ बाहर हो गर बारिश भी फ़िर भी अंदर से जलती हूँ कोई मेरा नहीं जहां मे सबकी अपनी सी लगती हूँ जो धूप सभी को मिल जाए तो सूरज से मैं तपती हूँ मेरे रहस्य हैं जग से परे इतिहास सभी का रखती हूँ सुख दुख त्याग सभी मैं अपना कष्ट मैं सारे सहति हूँ ना आम कोई ना खास मुझे सब पर ममता मैं रखती हूँ पर पाप जहाँ में जब भी बढ़े तो प्रलय रूप मे धरती हूँ कोमल सा मैं मर्म लिए स्त्री स्वरूप मैं पृथ्वी हूँ लेखिका का परिचय :- प्रेक्षा दुबे निवासी - उज्जैन ( म. प्र.) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindiraksh...
जिंदगी क्या है….
कविता

जिंदगी क्या है….

********** संजय जैन मुंबई फूल बनकर मुस्कराना जिन्दगी हैl मुस्कारे के गम भूलाना जिन्दगी हैl मिलकर लोग खुश होते है तो क्या हुआl बिना मिले दोस्ती निभाना भी जिन्दगी हैl। जिंदगी जिंदा दिलो की आस होती है। मुर्दा दिल क्या खाक जीते है जिंदगी। मिलना बिछुड़ जाना तो लगा रहता है । जीते जी मिलते रहना ही जिंदगी है।। जिंदगी को जब तक जिये शान से जीये। अपनी बातो पर अटल रहकर जीये। बोलकर मुकर जाने वाले बहुत मिलते है। क्योकि जमाना ही आज कल ऐसे लोगो का है।। मेहनत से खुद की पहचान बनाकर, जीने वाले कम ही मिलते है । प्यार से जिंदगी जीने वाले भी कम मिलते है। वर्तमान को जीने वाले ही जिन्दा दिल होते है।। प्यार से जो जिंदगी को जीते है। गम होते हुए भी खुशी से जीते है। ऐसे ही लोगो की जीने की कला को। हम लोग जिंदा दिली कहते है।।   लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मु...
आजकल की युवा पीढ़ी
कविता

आजकल की युवा पीढ़ी

********** दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) आजकल की युवा पीढ़ी को क्या हो गया? जागती रहती है तबतक, जब ज़माना सो गया। जहां जाने में भी कतराते थे वो संस्कारी बच्चे, वही जगह आजकल इनका ठिकाना हो गया। आजकल की युवा पीढ़ी को क्या हो गया? जागती रहती है तबतक, जब ज़माना सो गया। पिता की मार और मां की फटकार, नाना-नानी का दुलार, और दादा-दादी का प्यार। अक्सर वही से मिलता था जिसे कहते है संस्कार। मगर इनको अब अकेला ही छोड़ दो... मगर इनको अब अकेला ही छोड़ दो... इनको किसी का साथ नही स्वीकार। व्हाट्सएप, फेसबुक से गहरा दोस्ताना हो गया। आजकल की युवा पीढ़ी को क्या हो गया? जागती रहती है तबतक, जब ज़माना सो गया। आजकल के मां-बाप भी कम नही है। जो हादसे हो रहे है वो बिल्कुल सही है। ब्लुव्हेल और पब्जी की लगी है बीमारी। टिकटोक पर दिखा रहे खूब कलाकारी। परिवार भी इन आदतों का दीवाना हो गया। आजकल की युवा पीढ़ी को क्या...
मैं माँ भारती का भारत हूँ
कविता

मैं माँ भारती का भारत हूँ

********** भारत भूषण पाठक धौनी (झारखंड) मैं माँ भारती का भारत हूँ। उनके आशीर्वाद का स्वप्न साकार हूँ मैं। मैं माँ भारती का भारत हूँ।। चल पड़ा हूँ अपनी  ही वो डगर। करना विजित जहाँ है मुझे सकल समर। मैं माँ भारती का भारत हूँ। अँग्रेजों की अँग्रेज़ी न भूला दूँ तो तुम कहो। मैं तो निकला हूँ लेकर साथ अपने हिन्दी माँ को। अपना न ले यह जबतक यह जग प्रेम से संग मेरे हिन्दी माँ को।। मैं माँ भारती का भारत हूँ। मातृस्वरूपा हिन्दी का उपासक हूँ मैं माँ भारती के आँगन में खेला मातृस्वरूपा हिन्दी का संग्राहक हूँ।। . लेखक परिचय :-  नाम - भारत भूषण पाठक लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी - ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला दुमका(झारखंड) कार्यक्षेत्र - आई.एस.डी., सरैयाहाट में कार्यरत शिक्षक योग्यता - बीकाॅम (प्रतिष्ठा) साथ ही डी.एल.एड.सम्पूर्ण होने वाला है। काव्यक्षेत्र में तुच्छ प्रयास - साहित्...
सड़क का गढ्ढा
व्यंग्य

सड़क का गढ्ढा

********** जितेंद्र शिवहरे महू (इंदौर) मुख्य बाजार की सड़क से गुजरना हुआ। वहीं कुछ दूरी पर लोगों की भीड़ जमा थी। सड़क के इर्द-गिर्द बहुत से लोग खड़े थे। सभी की आखें नीचे सड़क पर थी। मुझे भी उत्सुकता हुई। मैंने वहां भीड़ के नजदीक जाकर देखा। सड़क के बीचों-बीच एक गहरा गढ्ढा हो गया था। राहगीर जैसे-तैसे बचते बचाते निकल रहे थे। दो पहिया वाहन तो गढ्ढे के आसपास से निकल जाते मगर चार पहिया वाहन युं ही सड़क की दोनों ओर पंक्ति बध्द खड़े थे। चार पहिया वाहन स्वामियों को अमिट विश्वास था कि कोई न कोई उस गढ्ढे को भरने अवश्य आयेगा। तब वे आराम से निकल जायेंगे। इसलिए वे निश्चिंत होकर अपनी-अपनी कार में बैठे थे। कुछ लोग गाड़ी से नीचे उतर कर सड़क किनारे भुट्टें की दुकानों पर टूट पड़े थे। मैंने साहस कर कहा- "अरे भाई कोई म्यूनिसिपल ऑफिस को फोन करो। वहां से कोई आयेगा तब ही पेंच वर्क शुरू होगा।" मेरी बात वहां सुन...
कैलाश विजयवर्गीय एवं चिंटू वर्मा विश्व बुक ऑफ रेकॉर्ड लंदन द्वारा सम्मानित
आलेख

कैलाश विजयवर्गीय एवं चिंटू वर्मा विश्व बुक ऑफ रेकॉर्ड लंदन द्वारा सम्मानित

*********** विनोद वर्मा "आज़ाद"  देपालपुर बात उन दिनों की है जब धार्मिक गतिविधियों के प्रचार - प्रसार की शुरुआत को कोई ५,६ साल ही हुए थे। उस काल मे चुनिंदा जगह नवरात्रि में गरबे, भजन, कवि गोष्ठियां,कवि सम्मेलन, आर्केस्ट्रा आदि होना प्रारम्भ हुए थे। ऐसे वक्त में नगर के एक उदीय मान बालक जिसकी उम्र लगभग १७ वर्ष थी ने हिम्म त जुटाई और अपने कुछ मित्रों को साथ लेकर अति प्राचीन देवी माता मंदिर पर प्रथम भजन संध्या का आयोजन किया, जिसमे एक सशक्त राजनेता ने उस भजन संध्या में अपनी युवा संगीत मंडली के साथ भजनों की शुरुआत की। छोटा सा मंच ओटले पर बना हुआ, वही माता एवम बहनों की अपार भीड़, पुरुषों का भी भारी जनसमूह इस भजन संध्या में भजनों की बयार का आनन्द लेने उप स्थित था। रात्रि ३ बजे तक भजन संध्या में माता के भजनों एवं राष्ट्रीय गीतों के साथ "मां तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी-प्यारी है ...
उठालो कलम
गीत

उठालो कलम

********** सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल म.प्र. समांत :- आ पदांत :- गया है “उठालो कलम समय ये कैसा आ गया है, हर शहर मेँ मानव भय से घबरा गया है, चहकतीँ थीँ चिडियाँ, जिन घरोंदे मेँ, अब तक, वहाँ पर शमशान का सन्नाटा छा गया है, जिन बडी ऊम्मीदोँ से बनाये थे हमने घरोंदे, बरसोँ से कोई वहाँ, झाकने भी नहीँ गया है, जिस माँ से घंटोँ होती थी, बच्चोँ की बातचीत, दो मिनिट बात के लिये, कोई, तरसा गया है, छिटक दो सारे दुख, अपना कर किसी गैर को, ईश्वर पर अटूट विश्वास का समय आ गया है.”   लेखक परिचय :-  नाम :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संक...
प्लास्टिक मुक्त भारत
कविता

प्लास्टिक मुक्त भारत

********* कल्पना ओसवाल इंदौर मध्यप्रदेश प्लास्टिक मुक्त भारत सभी मिलकर शपथ ले, हम प्लास्टिक को जड़ से खत्म करेंगे राह है मुश्किल,लेकिन नामुमकिन नही, आदत को बदलो, कदम बदलेंगें, पॉलिथीन का साथ अब हम छोड़ देंगे कपड़े और कागज का उपयोग करेंगे जो पर्यावरण को न करे दुषित, सभी मिलकर शपथ ले, हम प्लास्टिक को जड़ से खत्म करेंगें, गंगा यमुना सरस्वती की यही पुकार, पूजा है हमको, स्वच्छ हमें रखो, माँ माना तो चरण को,स्वच्छता से छुओ हवा करे शोर,मेरे संग रहना है तो, मेरे साथ हाथ से हाथ मिलाकर चलो, स्वच्छ वातावरण में जीवन की डोर को बढ़ाकर चलो, सभी मिलकर शपथ ले, हम प्लास्टिक को जड़ से खत्म करेंगे, देश बचाओ अभियान में हम साथ खड़े है, हर साथी को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे, प्लास्टिक को अलविदा कर,जीवन को आगे बढ़ाएंगे वक्त की को चाह है वो पूरी कर, हम प्लास्टिक को जड़ से खत्म करेंगे।। . लेखिका परिचय :-  श्रीमती कल्पना ओसव...
सुंदरता की….
गीत

सुंदरता की….

********** संजय जैन मुंबई नही होती सुंदरता किसी के भी शरीर में। ये बस भ्रम है अपने अपने मन का। यदि होता शरीर सुंदर तो कृष्ण तो सवाले थे। पर फिर भी वो सभी की आंखों के तारे थे।। क्योंकि सुंदर होते है उसके कर्म और विचार में। तभी तो लोग उसके प्रति आकर्षित होकर आते है। वह अपनी वाणी व्यवहार और चरित्र से जाना जाता है। तभी तो लोग उसे अपना आदर्श बना लेते है।। जो अर्जित किया उसने अपने गुरुओं से ज्ञान। वही ज्ञान को वो सुनता है दुनियां को। जिससे होता है एक सभ्य समाज का निर्माण। फिर हर शख्स को ये दुनियां, सुंदर लगाने लगती है। इसलिए संजय कहता है, जमाने के लोगो से। शरीर सुंदर नही होता सुंदर होते है उसके संस्कार।। लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक स...
मैं क्यों नहीं चीख पाता इन दिनों
कविता

मैं क्यों नहीं चीख पाता इन दिनों

********* विवेक सावरीकर मृदुल (कानपुर) मैं जानता हूं रे कि चीखने का समय है ये पर करूं क्या! आज तो मेरा कंठ रूद्ध है तुम देखते हो क्या कोशिश कर? कहता आया हूं मैं यही ताज़िंदगी एक अप्रिय स्थिति से जान बचाकर।। देखो उंगली उठानी है मुझे उनकी मुखालिफत में जो सड़कोंऔर चौराहों पर बहा देते हैं किसी का भी खून पर क्या करूं उंगली अकेली कहां है वो और चारों के साथ है उसके उठने और झुकने पर किसी न किसी अनजाने षड़यंत्र का हाथ है।। अरे मैं सचमुच चढ़ाना चाहता हूं त्यौरियाँ, लाना चाहता हूं पेशानी पर बल उनके खिलाफ जो बाजार पाट रहे हैं मिलावट के जहर से मैं अब भी चैक करता हूं एक्सपायरी डेट दवाओं और सीलबंद खाद्यपदार्थों की पर वो लिखी होती है बहुत महीन फिर ये सोचकर कि ले रहे है इसे मेरी बगल में खड़े कॉरपोरेट कल्चर में नहाए शार्ट्स और स्वेट शर्ट्स पहने अनगिन लोग मैं हो जाता हूँ मुतमईन बेशक़, मैं रोना चाहता हूं अनाम...
सिलिकॉन सिटी के सेक्टर ए में मातारानी के गरबों की धूम
धार्मिक

सिलिकॉन सिटी के सेक्टर ए में मातारानी के गरबों की धूम

इंदौर : सिलिकॉन सिटी के सेक्टर ए में इन दिनों मातारानी के गरबों की धूम मची हुई है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी कॉलोनी के रहवासीयों द्वारा महारास गरबा का कार्यक्रम "महिला मित्र मंडल नवदुर्गा उत्सव समिति" के तत्वाधान में धूमधाम से मनाया जा रहा है। जिसमे बड़ों के साथ प्रतिदिन बच्चों के खेल प्रतियोगिता एवं नौ दिन शानदार गरबे की प्रस्तुतियां होती हैं। दुर्गाअष्टमी को हवन कीर्तन के साथ माताजी को छप्पन भोग भी लगाया गया जिसके दर्शन लाभ लेने सैंकड़ों की संख्या में क्षेत्र के श्रद्धालु पधारे, इसी के चलते नवमी को कंजिकाओं का पूजन व कन्या भोज होगा व भंडारे का आयोजन किया जाएगा संध्या काल ४ बजे माताजी का चल समारोह निकाला जाएगा व मूर्ति विसर्जन होगा। ततपश्चात रात ८ बजे रामलीला का मंचन समिति के बालक बालिकाओं द्वारा किया जाकर रात्रि ९ बजे रावण दहन किया जावेगा। https://www.youtube.com/watch?v=Hy44U1Uh...
काश की कोई
कविता

काश की कोई

********** रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. काश की कोई ऐसा हमसफ़र होता जो तन्हाई में भी साथ होता,,,,, जिससे न कुछ छिपा होता,, वो हर मर्ज की दवा होता..... जो समझ सकता अनकहे जज्बातों को, और महसूस करता दिल के अहसासों को।।। सोचो कितना हसीन सा फिर वो सफर होता जिसमे हर पल आपका अजीज हमसफ़र होता,,, फिर न मंजिल की फिक्र होती, न मुश्किलों का कोई असर होता।।। काश की ऐसा कोई हमसफ़र होता तो बहुत खूबसूरत ये जीवन का सफर होता . लेखिका परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्र...
बाराती
कविता

बाराती

********** संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) पहाड़ो पर टेसू रंग बिखर जाते लगता पहाड़ ने बांध रखा हो सेहरा| घर के आँगन में टेसू का मन नहीं लगता उसे सदैव सुहाती पहाड़ की आबों हवा। मेहंदी की बागड़ से आती महक लगता कोई रचा रहा हो मेहंदी। पीली सरसों की बग़िया लगता जैसे शादी के लिए बगिया के हाथ कर दिए हो पीले। भवरें -कोयल गा रहे स्वागत गीत दिखता प्रकृति भी रचाती विवाह। उगते फूल आमों पर आती बहारें आमों की घनी छाँव तले जीव बना लेते शादी का पांडाल ये ही तो है असल में प्रकृति के बाराती। नदियां कल कल कर उन्हें लोक गीत सुनाती एक तरफ पगडंडियों से निकल रही इंसानों की बारात। सूरज मुस्काया धरती के कानों में धीमे से कहा- लो आ गई एक और बारात आमों के वृक्ष तले। . परिचय :- नाम :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ - मई -१९६२ (उज्जैन ) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन ...
ग्राम आम्बाचन्दन में भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ
साहित्यिक

ग्राम आम्बाचन्दन में भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ

महू : ग्राम आम्बाचन्दन में  नवरात्रि पर भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। उक्त आयोजन अखिल भारतीय साहित्य परिषद महू और दुर्गा उत्सव समिति के संयुक्त तत्वाधान में हुआ। खचाखच भरे माता के दरबार में कवि धीरेन्द्र जोशी ने कार्यक्रम का चुटीला मुग्ध करने वाला संचालन किया। कवि सम्मेलन में ग्राम सरपंच जितेन्द्र पाटीदार और चोरडिया सरपंच  अशोक आंजना अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। देर रात तक चले कवि सम्मेलन को उपस्थित श्रोताओं ने करतल ध्वनियों से सराहा। कवि सम्मेलन में देशभक्ति, पर्यावरण,बेटी बचाओ,श्रंगार आदि विषयों के साथ जहाँ चिंतन पर मजबूर किया वहीं हास्य रस ने सबको हँसाया-गुदगुदाया । इस कविसम्मेलन ने श्रोताओं के मन पर अमिट छाप छोड़ी। सहभागी कवि गण थे - विनोद गुर्जर धीरेन्द्र जोशी भगवान दास तरंग सुरेशचंद्र अस्थाना बिंदु पंचोली यश कौशल सत्या ठक्कर पायल परदेसी कु देवांशी इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध किया के बि...
क्यों बेटी हुई तो मातम छाया…
कविता

क्यों बेटी हुई तो मातम छाया…

************ शुभम् पोद्दार समस्तीपुर (बिहार) क्यों बेटी हुई तो मातम छाया, गर्भ में ही इसका खून बहाया, दुनिया में लाने से पहले इसे दुनिया से दूर कराया, आखिर दोस उसका है क्या? ईश्वर के दिए उपहार को हमने क्यों ठुकराया, क्यों दो घर की रोशनी को हमने गर्भ में ही मरवाया? जग जननी है यह जग कल्याणी भी, प्रेम के सागर तले स्नेह का गागर है यह, खुले आसमान का उड़ता हुआ बादल है यह, तपती हुई सूरज तले छांव का चादर है यह इसे भी जीवन का वर तो दो, अरे इसे भी अपने जीवन जीने का मौका तो दो... . परिचय :-  शुभम् पोद्दार समस्तीपुर (बिहार) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर...
मोहब्बत
कविता

मोहब्बत

************ सौरभ कुमार ठाकुर जब आपने कह दिया है तो क्यों रुकेंगे किसी के सामने हम अब क्यों झुकेंगे। मोहब्बत किया है हमने, कोई चोरी नही मरे सारी दुनिया परन्तु हम क्यों मरेंगे। दिल में उसे बसाया है सच में सौरभ भूलें सारी दुनिया पर उसे नही भूलेंगे डर नही किसी का भी अब मोहब्बत में मोहब्बत किया है तो पूरा करके छोड़ेंगे। वायदा किया है उससे सातों जनम का तो साथ ही जिएंगे और साथ ही मरेंगे। हम वो मौसम नही की साल में एकबार आए अब किया है मोहब्बत तो हरसंभव निभाएँगे। . परिचय :- नाम- सौरभ कुमार ठाकुर पिता - राम विनोद ठाकुर माता - कामिनी देवी पता - रतनपुरा, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) पेशा - १० वीं का छात्र और बाल कवि एवं लेखक जन्मदिन -१७ मार्च २००५ देश के लोकप्रिय अखबारों एवं पत्रिकाओं में अभी तक लगभग ५० रचनाएँ प्रकाशित सम्मान-हिंदी साहित्य मंच द्वारा अनेकों प्रतियोगिताओं में सम्मान पत...
किसान हैं जवान हैं
कविता

किसान हैं जवान हैं

************ लोकेश अथक बदायूँ (उत्तर प्रदेेेश) ये हिंद के किसान हैं किसान है जवान है किसान के जवान है ये हिंद के जवान हैं इक रखते स्वाभिमान है एक देते खाद्यान है इक झोपड़ी मकान है एक बर्फ मे ही जान है ये हिंद के किसान हैं किसान है जवान है किसान के जवान है ये हिंद के जवान हैं इक देश आन बान है इक वीरता की शान है इक देश हित निसार है इक देश पे कुर्बान है ये हिंद के किसान हैं किसान है जवान है किसान के जवान है ये हिंद के जवान हैं इक सहते गर्म शीत है इक रहते शीत बीच है इक अन्न दे नवीन इक देश के नगीन है ये हिंद के किसान हैं किसान है जवान है किसान के जवान है ये हिंद के जवान हैं इक त्याग रैन शयन है सरहद पे रखते नयन है इक आपदाए सहते है सहते है कङबे बैन है इक मोह सारे त्याग हथेली पे रखते जान है ये हिंद के किसान हैं किसान है जवान है किसान के जवान है ये हिंद के जवान हैं . परिचय :- नाम - ...
कक्षा दसवीं के बाद सही विषय का चुनाव
आलेख

कक्षा दसवीं के बाद सही विषय का चुनाव

************ पूर्वा परमार राऊ, इंदौर अक्सर हमारे मित्र या परिचित हमसे पूछते हैं कि क्या दसवीं के बाद मैं अर्ट्स का चुनाव करूं या गणित ? क्या मैं इंजीनियर बनूं या डॉक्टर? क्या मै गायक बनकर पैसे कमा सकता हूं? क्या नृत्य मेरी आजीविका का साधन बन सकता है? ऐसे असमंजस से हर कोई गुजरता है। तो ऐसे में सही विषय का चुनाव आपके लिए आगे के रास्ते खोलता है और आपको अपने पसंदीदा नौकरी या व्यसाय चुनने में मदद करता है। इस स्तिथि में सबसे अहम भूमिका माता पिता की होती है। ज़रूरी यह है कि पालक अपने बच्चों से चर्चा करें उनका मत जानें क्युकिं ऐसे समय में जब हम दसवी की परीक्षा दे रहें हैं, हमें समझ नहीं आता कि हम किस ओर आगे बढ़ें? अब ऐसे वक्त में हमें यानि विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को क्या करना चाहिए? आप जानें कि आपके बालक कि रुचि किस विषय में है। उसके बाद उस दिशा में पढ़ रहे या कार्य कर रहे रिश्तेदा...
मातेश्वरी की स्तुति
कविता

मातेश्वरी की स्तुति

********** भारत भूषण पाठक धौनी (झारखंड) ॐ जय शैलपुत्री माता, मैया जय शैलपुत्री माता। मैया जी को निशदिन ध्याता,वो नर यश निश्चय पाता।। ॐ जय ब्रह्मचारिणी माता, मैया जय चन्द्रघण्टा माता।। जो नर तुमको ध्याता, है वो सर्वसिद्धि  पाता। कुष्माण्डा माता को जो भजता, सुख समृद्धि पाता।। माँ स्कंदमाता की कृपा, है जो नर पाता । जन्म-मरण से मुक्त होकर, मोक्ष वो पाता।। माँ कात्यायनी जी की स्तुति, जो कोई नर गाता। शोक संताप से वो मुक्त होकर, अन्त परम पद वो पाता।। कालरात्रि नाम लेकर, माँ का ध्यान है जो करता। भयमुक्त वो है होता, शत्रु मुक्त है वो होता।। महागौरी माँ की कृपा, अलौकिक सिद्धि है देती। सिद्धिदात्री माता का ध्यान जो करता, सकल सिद्धि  है वो पाता। माँ के इन नौ रूपों का जो नर ध्यान है करता। कील, कवच, अर्गला, कुञ्जिका मन से पढ़ता।। माँ की परम कृपा है वो पाता, अन्त माँ में ही वो मिलता।। . लेखक पर...
दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे
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दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे

********** दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे, यकीं नही था कि तुम मुझे दगा दोगे। खुदसे ज्यादा था भरोसा तुमपर, लगा तुम प्यार से गले लगा लोगे।। दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे यहां अपनो का क्या.... ना जगह अपनी, ना दुनिया अपनी, ना अपना गम है ना खुशियां अपनी। यही करता रहा में सोचकर गलती, मेरी वफ़ा का तुम सिला दोगे। दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे, यकीं नही था कि तुम मुझे दगा दोगे। मेरी यादों का क्या.... तुम किसी राह से गुज़रती थी, बनके खुशबू बड़ी महकती थी। मेरी नज़रो को क्या तुम भूल गई, क्या फिर कोई आरज़ू जगा दोगे। दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे, यकीं नही था कि तुम मुझे दगा दोगे। मेरी बातों का क्या.... मेरे उन दोस्तो को याद सब है, तुमको हमने यूं भुलाया कब है। मुझे अब दोस्तो ने भी छोड़ दिया, क्या अब इस बात का भी बयां लोगे। दिल्लगी तुम मेरी भुला दोगे, यकीं नही था कि तुम मुझे...
बेटी हूं
कविता

बेटी हूं

********** कुमार जितेन्द्र बाड़मेर (राजस्थान) हें! माँ में आपकी बेटी हूं, हें! माँ में खुश हूं, ईश्वर से दुआ करती हूं आप भी खुश रहे, ख़बर सुनी है मेरे कन्या होने की, आप सब मुझे अजन्मी को, जन्म लेने से रोकने वाले हो, मुझे तो एक पल विश्वास भी नहीं हुआ, भला मेरी माँ, ऎसा कैसे कर सकती है , हें! माँ बोलो ना बोलो ना, माँ - माँ मेने सुना सब झूठ है, ऎसा सुनकर में घबरा गई हूं, मेरे हाथ भी इतने नाजुक है, की तुम्हे रोक नहीं सकती, हें! माँ कैसे रोकू तुम्हें, दवाखाने जाने से, मेरे पग इतने छोटे, की धरा पर बैठ कर जिद करू, हें! माँ मुझे बाहर आने की बड़ी ललक है, हें! माँ मुझे आपके आगन को, नन्हें पैरो से गूंज उठाना है, हें! माँ में आपका खर्चा नहीं बढ़ाऊँगी, हें! माँ में बड़ी दीदी की, छोटी पड़ी पायजेब पहन लूंगी, बेटा होता तो पाल लेती तुम, फिर मुझमे क्या बुराई है, नहीं देना दहेज, मत डरना दुनिया से, बस मुझे...
मेरी मां
कविता

मेरी मां

********** उज्जवल मिश्र मुजफ्फरपुर बिहार उठता हूं ७:०० बजे मैं तुम ५:०० बजे जग जाती हो मेरी मां बचपन से आज तक मैं देख रहा हूं तुमको मां कितनी सुंदर कितनी प्यारी लगती हो तुम मेरी मां उठता हूं ७:०० बजे मैं तुम ५:०० बजे जग जाती मेरी मां सूरज को उगने से पहले चिड़िया को चहकने से पहले उठ जाती है मेरी मां करती योगा रोज सवेरे पूजा पाठ करती हर रोज नाश्ता में कभी आलू पराठे और चटनी बनाती हो तो कभी बनाती पूरी हलवा भुजिया भी बनाती हो सूरज को उगने से पहले चिड़िया को चहकने से पहले उठ जाती है मेरी मां कितनी सुंदर कितनी प्यारी लगती हो तुम मेरी मां समय से उठना समय से सोना यह बात बतलाती मेरी मां स्वस्थ रहोगे जीवन भर जो तुम अपनाएं मेरी बात सूरज को उगने से पहले चिड़िया को चहकने से पहले उठ जाती है मेरी मां मैं भी उठूंगा ५:०० बजे यह वादा करता हूं मेरी मां योगा करेंगे प्रतिदिन हम मंदिर साथ में जाएंगे आज से बदल...
दोस्त की पहचान
लघुकथा

दोस्त की पहचान

*********** केशी गुप्ता (दिल्ली) राम और श्याम दोनो बहुत ही गहरे मित्र थे .  उनकी मित्रता बचपन की थी, साथ खेले और साथ ही बड़े हुए . बारवीं की  परिक्षा खत्म हो चुकी थी .  विध्यालय की शिक्षा के पश्चात अब आगे विश्व विध्यालय में जाने का समय था .  अन्य विधायर्थियों की भातिं ये दोनों मित्र भी इसी चिंता में थे कि आगे क्या और कैसे किया जाए  . राम जहां  पढ़ाई में ठीक सा था तो श्याम सदैव कक्षा में अवल  स्थान प्राप्त करता था .   दोनो के परिवारों में रहन -सहन  की भी अन्तर था .  परन्तु इन सब अन्तर के बावजूद दोनों में अटूट मित्रता रही .  विध्यालय के परिणीम स्वरूप दोनों को अलग अलग विश्व विध्यालय में दाखिला मिला .  वह दोनो ही अपनी अपनी दिन चर्या और पढ़ाई में व्यस्त हो गए . अब वह कभी-कभार ही मिल पाते और  पिछले समय को याद करते . फिर एक दिन राम ने अपने जन्मदिन की पार्टि रखी और अपने सभी नए पूराने दोस्तो ते अम...