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कितना राष्ट्रप्रेम कितनी राष्ट्रभक्ती
आलेख

कितना राष्ट्रप्रेम कितनी राष्ट्रभक्ती

********* विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक सीमा ये उस राष्ट्र का अस्तित्व, महत्व, और पहचान के लिये पर्याप्त नही होती। जमीन पर दिखने वाली इस सीमा रेखा के अंदर उस राष्ट्र के नागरिकों के अपने राष्ट्र के प्रति जो आदर, जो कर्तव्य, जो प्रेम और अपनत्व की भावनाएं अपने परिपक्व स्वरूप मे होती है, और यह सब जब राष्ट्र के नागरिकों के व्यवहार और आचरण मे प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होती है, तब हम इसे राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ती कह सकते है। राष्ट्र के स्थायित्व और सर्वांगीण उन्नती के लिए तथा भावनात्मक रूप से राष्ट्र को एक सूत्र मे पिरोये रखने के लिए इसी राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ती की नितांत आवश्यकता होती है। - इतिहास साक्षी है कि राष्ट्रप्रेम के अभाव मे भारत का विभाजन हुआ। आगे संयुक्त पाकिस्तान मे भी नागरिकों के राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ती की भावनाओं का ऱ्हास होने के कारण ...
दीप बनकर
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दीप बनकर

********** डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर दीप बनकर दिवाली मनायें सभी। छोड़ खामोशी बाहर आयें कभी। है सफाई ज़रूरी ,,,,मग़र ध्यान दो। खाली हाथों को भी कोई काम दो। दौर मंदी का है,तेज ना हम चलें। साथ लेकर सभी को मिलकर बढ़ें। छोड़ दें हम पतली प्लास्टिक पन्नियाँ। इस बार बाटें,,,,,,,, धान गुड़ धनियाँ। मिलावट नहीं,,,,,,,,, शुद्ध आहार हो। पुरातन भारत का,,,,,,,,,,, बाज़ार हो। रूप चौदस पर मिट्टी और उबटन रहे। चौथ करबे की चमके,न विघटन रहे। नृत्य घर घर में हों और भजन श्याम के। मोहब्बत बिना,,,,,,,दीप किस काम के।   परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) आपका मूल निवास फ़र्रुख़ाबाद उ.प्र. है आपकी शिक्षा कानपुर में ग्रहण की व् आप गत ३६ वर्ष से इंदौर में निवास कर रहे हैं आप मंचीय कवि, लेखक, अधिमान्य पत्रकार और संभावना क्लब के अध्यक्ष हैं, महाप्रबंधक मार्केटिंग सोमैया ग्रुप एवं अवध समाज साहित्यक संगठन के उपाध्यक्ष...
मेरी राह देखना तुम
कविता

मेरी राह देखना तुम

********** रेशमा त्रिपाठी  प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश जाते-जाते कह गए, मेरी राह देखना तुम तुमको ही पूरा माना है, तुम ही मेरे मन में हो तुम मेरे हर क्षण में हो ,तुम मेरी सांसों में हो तुम ही प्राणप्रिया हो मेरी, यही याद कर राह देखना तुम जाते जाते कह गए, मेरी राह देखना तुम। तुम्हीं भाग्य गए हो, तुम्हीं कर्म हो तुम्हीं बुद्धि हो, तुम्हीं सिद्धि हो तुम्हीं हो मेरे, सुख-दुख की रानी तुम्हीं मेरे सपनों की, शहजादी यादों में भी गर्व कर, मेरी राह देखना तुम जाते जाते कह गए, मेरी राह देखना तुम। जानती हूॅ॑ न लौटेंगे कभी, हृदय उनका निष्ठुर हुआ हैं त्याग कर मेरा समर्पंण तो, मातृभूमि को किया हैं प्रेम में त्याग एक का, दूसरे पर स्वयं बलिदान हो गए रोता हुआ छोड़ कर मुझे, स्वयं जाते-जाते कह गए आएंगे हर रोज सपनों में तेरे, मेरी राह देखना तुम जाते-जाते कह गए, मेरी राह देखना तुम।। . परिचय :- नाम : रेशमा ...
माँ है जो मकान को घर करती है
कविता

माँ है जो मकान को घर करती है

********** जयंत मेहरा उज्जैन (म.प्र) मुझसे ज्यादा मेरी फिकर करती है वो माँ है जो उस मकान को घर करती है धूप मे जब जब में निकलता हु पलकों की छाव मेरे सर करती है वो माँ है जो उस मकान को घर करती है कभी गिरने नही देती मुझे कहीं उसकी दुआ इतना लंबा तय, सफर करती है वो माँ है जो उस मकान को घर करती है जब जब भी कभी बिमार होता हूं उसकी यादों की दवा हि बस मुझ पर असर करती है वो माँ है जो उस मकान को घर करती है लोग चेहरों पर नक़ाब लिए रखते हैं सभी के सारे हिसाब लिए रखते हैं में मेरी तकदीर लिए चलता हूं ज्यादा कुछ नहीं, माँ कि तसवीर लिए चलता हूं उसकी दुआ मेरे साथ साथ सारे, सफर करती है वो माँ है जो उस मकान को घर करती है . परिचय :- नाम : जयंत मेहरा जन्म : ०६.१२.१९९४ पिता : श्री दिलीप मेहरा माता : श्रीमती रुक्मणी मेहरा निवासी : उज्जैन (म.प्र) सम्प्रति : वर्तमान में कनिष्क कार्यपालक अधिकारी (इंजीनि...
तुम लौट आओगे
कविता

तुम लौट आओगे

********** ज्योति शुक्ला औरैया (उत्तर प्रदेश) ग़म जुदाई के सताएंगे तो तुम लौट आओगे आंख में अश्क आएंगे तो तुम लौट आओगे टूटी नाव के सहारे ना लग पाओगे पार तुम तो लहर संग तूफान आएंगे तो तुम लौट आओगे याद रखना कोई आसान नहीं है जमाने में दर्दे दिल रोज़ सताएंगे तो तुम लौट आओगे। पूंछ-पूंछ कर मेरे बारे में तुम से जमाने के लोग बागवां दिल का जलाएंगे तो तुम लौट आओगे। मुझ से खफा हो के जाने वाले रखना याद ख्वाब मेरे जब आएंगे तो तुम लौट आओगे। . परिचय :- कवयित्री ज्योति शुक्ला का जन्म १५ जुलाई सन् १९८८ को जिला औरैया उत्तर प्रदेश में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा औरैया एवं उच्च शिक्षा कानपुर विश्व विद्यालय से प्राप्त किया। ज्योति शुक्ला एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही वर्तमान समय में चिकित्सा क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही हैं।समाजिक विद्रुपताओं, सामाजिक विसंगतियों, मानवीय संवेदना से परिपूर्ण काव्य लेखन के...
युवा प्रतिभा खोज कार्यक्रम का आयोजन।
साहित्य समाचार

युवा प्रतिभा खोज कार्यक्रम का आयोजन।

रीवा : द खबरदार टीम के आयोजकत्व में और विंध्य कवि दरबार के संयोजन में २ अक्टूबर  को गांधी जी की १५०वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में शिक्षा इंटरनेशनल स्कूल बोदाबाग रीवा में एक अद्वितीय और ऐतिहासिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। जिसमें रीवा से ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश के सैकड़ों नवोदित कवियों ने भाग लिया और काव्यपाठ किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे नवोदित रचनाकारों को सामने लाना है जो कि कविता, कहानी आदि लिखते तो हैं किंतु कभी उन्हें ऐसा मंच नहीं मिलता जहाँ वो अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें। विंध्य कवि दरबार ने ऐसे ही कलाकारों को खोजकर उनकी प्रतिभा को निखारने और उचित स्थान दिलाने का बीड़ा उठाया है। . . इस कार्यक्रम के प्रारंभ में रीवा जिले के दो वीर से.नि. सैनिकों ए. के. पांडेय एवं पुष्पेन्द्र कुमार शर्मा, दो शिक्षकों डा. के.के. मिश्रा एवं बी.डी. मिश्रा सहित विभिन्न क्षेत्रो...
तेरी सोहबत का असर
कविता

तेरी सोहबत का असर

********** आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश बड़ी मुश्किल है ये प्यार की डगर आई नहीं तुम आने का वादा कर खुश रहने की ख्वाहिश भी बची नही ख़ुदा जाने क्यों उदासी है इस क़दर। प्यास जगाई तूने,उसमें झुलसता रहा मैं तुझे पता ही नही कहाँ खोई है तू मगर सबकी नजरों में खुश ही दिखता हूँ मैं ये सब तेरी ही सोहबत का है असर। अब ना भटको चुपचाप चली आओ तुम दिल में प्यार की अब भी है वही लहर।   लेखक परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तमान समय में कवि सम्मेलन मंचों व लेखन मे...
नजदीक
कविता

नजदीक

********** संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) यूँ लब थरथराने लगे तुम जो मेरे नजदीक आए महकती खुशबू जो महका गई तुम जो मेरे नजदीक आए नजरें ढूंढती रही हर दम तुम्हे तुम जो मेरे नजदीक आए प्रेम को बोल भी न बोल पाए तुम जो मेरे नजदीक आए इजहार तो हो न सका प्रेम का तुम जो मेरे नजदीक आए प्रेम के ढाई अक्षर हुए मौन तुम जो मेरे नजदीक आए कागज में अंकित शब्द खो से गए तुम जो मेरे नजदीक आए नींद भी अपना रास्ता भूल गई तुम जो मेरे नजदीक आए कोहरे में छुपा चेहरा जब देखा तुम जो मेरे नजदीक आए अंधेरों ने माँगा उजाला रौशनी देने तुम जो मेरे नजदीक आए प्रेम रोग की दवा देने तुम जो मेरे नजदीक आए . परिचय :- नाम :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ - मई -१९६२ (उज्जैन ) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग ) प्रकाशन :- देश - विदेश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाच...
नेह तुमसे लगाऐं
कविता

नेह तुमसे लगाऐं

********** विनोद सिंह गुर्जर महू (इंदौर) नेह तुमसे लगाऐं, तुम ना स्वीकारो? क्या अर्थ है, सब व्यर्थ है।।... असर अब कुछ हुआ है। दिखे खाई कुआ है। प्रीत में हार बैठे सब, खेला ऐसा जुआ है । हम दर्द से बिलखें, नजर तुम ना बुहारो? क्या अर्थ है, सब व्यर्थ है।।... अजब हलचल हुई थी। टाट, मल-मल हुई थी।। तुम्हारे प्रेम बंधन में, देह शतदल हुई थी।। आज दल-दल फंसे हैं, देखकर ना उबारो ? क्या अर्थ है, सब व्यर्थ है।।... भला अनुराग पाला। मन घुली हाय हाला।। अधेरों से हुयी यारी, लगे बैरी उजाला ।। तिमिर की स्याह में डूबे, दीप फिर भी ना जारो? क्या अर्थ है, सब व्यर्थ है।।... . परिचय :-   विनोद सिंह गुर्जर आर्मी महू में सेवारत होकर साहित्य सेवा में भी क्रिया शील हैं। आप अभा साहित्य परिषद मालवा प्रांत कार्यकारिणी सदस्य हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं के अलावा इंदौर आकाशवाणी केन्द्र से कई बार प्रसारण, कवि ...
मानव-मूल्य
लघुकथा

मानव-मूल्य

********* डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी उदयपुर (राजस्थान) वह चित्रकार अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति को निहार रहा था। चित्र में गांधीजी के तीनों बंदरों  को विकासवाद के सिद्दांत के अनुसार बढ़ते क्रम में मानव बनाकर दिखाया गया था। उसके एक मित्र ने कक्ष में प्रवेश किया और चित्रकार को उस चित्र को निहारते देख उत्सुकता से पूछा, "यह क्या बनाया है?" चित्रकार ने मित्र का मुस्कुरा कर स्वागत किया फिर ठंडे, गर्वमिश्रित और दार्शनिक स्वर में उत्तर दिया, "इस तस्वीर में ये तीनों प्रकृति के साथ विकास करते हुए बंदर से इंसान बन गये हैं, अब इनमें इंसानों जैसी बुद्धि आ गयी है। ‘कहाँ’ चुप रहना है, ‘क्या’ नहीं सुनना है और ‘क्या’ नहीं देखना है, यह समझ आ गयी है। अच्छाई और बुराई की परख - पूर्वज बंदरों को ‘इस अदरक’ का स्वाद कहाँ मालूम था?" आँखें बंद कर कहते हुए चित्रकार की आवाज़ में बात के अंत तक दार्शनिकता और बढ़ गयी थी। "ओह! ...
आसमान के तारें
कविता

आसमान के तारें

********* कुमार संदीप ग्राम सिमरा, मुजफ्फरपुर (बिहार) आसमान के तारें हाँ जब देखता हूँ आसमां में टिमटिमाते हुये तारों को, ऐसा लगता है कि ये तारें सपरिवार स्नेह और प्रेम से रहते हैं मिलजुलकर एक साथ। आसमान के तारें हाँ जब देखता हूँ आसमां में, जुगनू की तरह तारों को चमकते ऐसा लगता है कि ये तारें एक साथ हँसते हैं मुस्कुराते हैं, तारों की चमक आँखों को देती है सुकून। आसमान के तारें हाँ जब देखता हूँ आसमां में, तारों को कुछ समय के लिए ओझल होते ऐसा लगता है कि ये तारें भी क्रंदन करते हैं दीन दुखी के दुःख देखकर, ये तारें देखते हैं आसमां से इंसानों के कुकर्मों को। आसमान के तारें हाँ जब देखता हूँ आसमां में असंख्य तारें, ऐसा लगता है कि ये तारें सभी एक जैसे ही हैं, इन तारों में इंसानों की तरह न तो रंग का भेदभाव है, न ही धर्म, जाती का बंधन। . लेखक परिचय :-  नाम : कुमार संदीप पिता : स्वर्गीय ब्रज ...
कौन है शत्रू राष्ट्रभाषा के ?
आलेख

कौन है शत्रू राष्ट्रभाषा के ?

********* विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. हमारे देश मे तामिलनाडू राज्य मे हिंदी भाषा के लिये कुछ असंवेदनशीलता देखने को मिलती है और वैसा हमे प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है परंतु यह भी सच हैं कि, तामिलनाडू राज्य मे उनकी मातृभाषा के लिये गौरव, सन्मान और अभिमान और आत्मीयता भी उन्हें अनुभव होती है I राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे मे तामिल जनता से और राज्य के राज्यकर्ताओ से अन्य भारतीयो का कितना भी मतभेद हो परंतु एक राष्ट्रभक्त होने के नाते हमे निश्चित ही तामिलों की भावनाओ का आदर भी करना चाहिये, और मातृभाषा के प्रती उनके लगाव के कारण हमे गौरवान्वित भी होना चाहियेI हमे इस हेतू निश्चित ही संतुष्ट भी होना चाहिये कि एक राज्य की भाषा (तमिल) को, संस्कृती को और अस्मिता को सहेजकर और सुरक्षित रखने के लिये वहां के लोग जी जान से जुटे है और भावनिक दृष्टी से अपनी मातृभाषा से भी जुडे हुए है परंतु राष्ट्रभाषा हिंद...
पुरानी हर ईमारत
ग़ज़ल

पुरानी हर ईमारत

********* विवेक सावरीकर मृदुल (कानपुर) पुरानी हर ईमारत ढहाई जाएगी तब स्मार्ट सिटी बसाई जाएगी सिनेप्लेक्स क्लब या मॉल होंगे झुग्गी बस्ती की जमीन जाएगी यादों का मलबा दबाया जायेगा और नई नेमप्लेट लगाई जाएगी एक ग़ज़ल भर नहीं मेरी संवेदना उम्मीद है दिल से सुनाई जाएगी वहीँ दफ़्न होगी 'मृदुल' की आरज़ू जहाँ से भी मिटटी उठाई जाएगी   लेखक परिचय :-  विवेक सावरीकर मृदुल जन्म :१९६५ (कानपुर) शिक्षा : एम.कॉम, एम.सी.जे.रूसी भाषा में एडवांस डिप्लोमा हिंदी काव्यसंग्रह : सृजनपथ २०१४ में प्रकाशित, मराठी काव्य संग्रह लयवलये, उपलब्धियां : वरिष्ठ मराठी कवि के रूप में दुबई में आयोजित मराठी साहित्य सम्मेलन में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व, वरिष्ठ कला समीक्षक, रंगकर्मी, टीवी प्रस्तोता, अभिनेता के रूप में सतत कार्य, हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में समान रूप से लेखन। संप्रति : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय ...
जाड़े की दस्तक
कविता

जाड़े की दस्तक

********** कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) जाड़े की धूप खिलने लगी है। जाड़े की धुँध उठने लगी है। छत पर रजाईयाँ सजने लगी है। आँगन में चटाईयाँ बिछ्ने लगी है। रंग बिरंगे फूल खिलने लगी है। तितली फूलों पर उड़ने लगी है। पत्तों पर ओस चमकने लगी है। सिंगरहार पेड़ों पर सजन लगी है। आँगन में आचार सूखने लगी है। दरवाजे दरीचे खलने लगे हैं। माँ भाभियाँ स्वेटर बुनने लगी हैं। शायद जाड़ें की दस्तक मिलने लगी है। . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूच...
राम
गीत

राम

********** सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल म.प्र. “कलियुग मेँ त्राता हैँ राम, सबके विधाता भी हैँ, राम, न पाओगे उन्हेँ मंदिर मेँ, हृदय तल मेँ बसे हैँ राम, जीवन की आपा धापी मेँ, एक सुगंधित बयार हैँ,राम, समझो, सभी, ये सत्य है, कि, नर भूपाल नहीँ हैँ, राम, पृथ्वी आकाश पाताल मेँ, अनादी और अनंत हैँ राम, पाप की गठरी, को भूलकर, भवसागर पार कराते हैँ, राम लेखक परिचय :-  नाम :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संकलन) में प्रकाशित, ३ गीत॰ मुक्तक लोक व्दारा, प्रकाशित पुस्तक गीत सिंदुरी हुये (गीत सँकलन) मेँ प्रकाशित हुये हैँ. संप्रति :- भारतीय स्टेट बैं...
छत की कवेलु में
कविता

छत की कवेलु में

********** जयंत मेहरा उज्जैन (म.प्र) "इन इमारतों में ये जो हाथ लगे हैं कई भुखे प्यासों के जज़्बात लगे है हर एक पत्थर में दर्द बहुत गहरा है किसी की मजबूरी और हालात लगे है जेब मे बच्चों की भूख रखी है कंधों पर माँ बाप के हाथ लगे है मिट्टी की चादर, चाँद का सिरहाना रख छत की कवेलु में अमरनाथ लगे हैं" परिचय :- नाम : जयंत मेहरा जन्म : ०६.१२.१९९४ पिता : श्री दिलीप मेहरा माता : श्रीमती रुक्मणी मेहरा निवासी : उज्जैन (म.प्र) सम्प्रति : वर्तमान में कनिष्क कार्यपालक अधिकारी (इंजीनियरिंग - सिविल डिपार्टमेंट) भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, सेलम हवाईअड्डे पर पदस्थ शिक्षा : बी.ई. (सिविल इंजीनियरिंग) २०१६, एम .टेक - (Geotechnical Engineering ) २०१८ भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर से आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंद...
हम जैसे पागल
ग़ज़ल

हम जैसे पागल

********** मोहम्मद सलीम रज़ा रीवा म.प्र. हम जैसे पागल बहुतेरे फिरते हैं आप भला क्यूँ बाल बिखेरे फिरते हैं काँधों पर ज़ुल्फ़ें ऐसे बल खाती हैं जैसे लेकर साँप सपेरे फिरते हैं चाँद -सितारे क्यूँ मुझसे पंगा लेकर मेरे पीछे डेरे - डेरे फिरते हैं खुशियां मुझको ढूँढ रही हैं गलियों में पर ग़म हैं की घेरे - घेरे फिरते हैं ना जाने कब उनके करम की बारिश हो और न जाने कब दिन मेरे फिरते है   परिचय :- नाम – मोहम्मद सलीम रज़ा शायरी नाम – सलीम रज़ा रीवा तख़ल्लुस – ”रज़ा” जन्म स्थान – मध्य प्रदेश का रीवा ज़िला जन्म दिन – १५.०७.१९७५ तालीम – उर्दू में स्नातक नौकरी – ब्रान्च मैनेजर लाइफ़ इन्सुरेंस रचना प्रकाशन – कई पत्र पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित रचना पाठ – आकाशवाणी में कई प्रकाशन, दूरदर्शन में रचना प्रसारण, कई मुशायरे एवं कवि गोष्ठी में रचना पाठ रचना विधा – गीत, ग़ज़ल, क़तआत, नात – ए – मुबारिक, हम्द उपलब्ध...
अच्छा होता मैं तेरी न होती
कविता

अच्छा होता मैं तेरी न होती

********** रेशमा त्रिपाठी  प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश तुम्हारे ही होठों की मुस्कान थी तुमने छीन लिया तुम्हारे ही ह्रदय की अनुराग थी तुमने द्वेष भर दिया तुम्हारी ही संवेदना थी तुमने वेदना से भर दिया तुम्हारे ही जिस्म की मधुशाला थी तुमने धिक्कार दिया तुम्हारे ही नयन की लव थी तुमने बुझा दिया तुम्हारी आत्मा थी तुमने अपमान किया क्या? दोष था मेरा जो इतना अपमान दिया जब– जब प्यार से पुकारा तो मुस्कुरा दिया जब हृदय से लगाया तो समर्पण भी कर दिया फिर क्यों? इतना वेदना से भर दिया आज धिक्कारती हूं खुद को क्यों? तुमसे प्यार किया क्यों? वह निष्ठुर अपमान सही अच्छा होता वैसी होती, जैसी तेरी संकल्पना थी तब तू शायद मेरा होता, औ मैं तेरी न होती रिश्ते भी फिर नीभ जाते इस तथाकथित समाज में।।" . परिचय :- नाम : रेशमा त्रिपाठी  निवासी : प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानिया...
हिम्मत
कविता

हिम्मत

************ सौरभ कुमार ठाकुर मुजफ्फरपुर, बिहार तुम कुछ कर सकते हो तुम आगे बढ़ सकते हो। तुममे है बहुत हिम्मत तुम जग को बदल सकते हो। तुम खुद से हिम्मत नही हारना। कभी खुद का भरोसा मत हारना। तुम झूठ का मार्ग छोड़ सच्चाई के रास्ते पर चलते रहना। मुसीबत बहुत आते हैं जीवन में बस डट कर सामना करना। तुम ही देश के भविष्य हो यह बात हमेशा याद रखना। आत्मविश्वास बनाए रखो तुम हर कार्य पूरा कर पाओगे अपनी प्रयास तुम जारी रखो एक दिन जरुर सफल हो जाओगे। तुम करना कुछ ऐसा की, सारी दुनिया तुम्हारे गुण गाए। तुम बनना ऐसा की महानों की, महानता भी कम पड़ जाए। तुम रखना हिम्मत इतना की, वीर योद्धा की तलवार भी झुक जाए। तुम बनना इतना सच्चा की हरीशचंद्र के बाद तुम्हारा नाम लिया जाए . परिचय :- नाम- सौरभ कुमार ठाकुर पिता - राम विनोद ठाकुर माता - कामिनी देवी पता - रतनपुरा, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) पेशा - १० वीं का ...
उड़नखटोला
लघुकथा

उड़नखटोला

********** नीरजा कृष्णा पटना 'ये रूपा अभी तक बिस्तर तोड़ रही है, नौ बज रहा है। इस तरह पड़े रह कर तो ये लड़की कभी भी जिम्मेदारी नहीं सीख पाएगी' ना चाहते हुए भी आनन्द बाबू की आवाज़ काफ़ी तल्ख हो गई। 'ज़रा धीमे बोलिए ना! बच्ची है, सब सीख जाएगी! कितनी प्यारी सुन्दर हैं अपनी रूपा! देख लेना, एक दिन कोई राजकुमार आकर मेरी फूल सी बच्ची को उड़नखटोले पर बैठा कर ले जाएगा" अब तो सहनशक्ति जवाब दे गई उनकी, "शीला! कौन से जमाने में रह रही हो? अब ना कोई राजकुमार आएगा, ना कोई उड़नखटोला आएगा, बेटा बेटी सब बराबर होते है, अच्छी शिक्षा दो, हर क्षेत्र में यथासंभव काबिल बनाओ...यही आज के युग की माँग है।" पति की बातें सुन कर वो बहुत सोच में पड़ गई .... 'क्या सचमुच उनकी प्यारी गुड़िया के लिए कोई राजकुमार उड़नखटोले पर नहीं आएगा? क्या सचमुच उनकी रूपा के असीम रूप का कोई मूल्य नहीं है? सोचते सोचते उनको ध्यान आ गया पडौस...
मेहरबाँ बनता गया
कविता

मेहरबाँ बनता गया

************ मुनीब मुज़फ्फ़रपुरी जिस ज़मीं पर पाँव रखा आस्माँ बनता गया जिस ने मेहनत की हमेशा कामरां बनता गया चाँद एक बादल के टुकरे में छुपा बैठा रहा दिल का मेरे दर्द सब दर्द ए निहाँ बनता गया सब के सब मानूस थे बारिश हवा या धूप हो उसने जिस को भी कहा सब साइबाँ बनता गया जो भी अपने थे मेरे सब छोड़ के जाने लगे सब से कट कट के मेरा अपना जहाँ बनता गया क्या हुनर थे मुझमे हाँ मैं जंग कैसे जीत ता खेल क़िस्मत का हमेशा मेहरबाँ बनता गया लेखक परिचय :- नाम: मुनीब मुजफ्फरपुरी उर्दू अंग्रेजी और हिंदी के कवि मिथिला विश्वविद्यालय में अध्ययनरत, (भूगोल के छात्र)। निवासी :- मुजफ्फरपुर कविता में पुरस्कार :- १: राष्ट्रीय साहित्य सम्मान २: सलीम जाफ़री अवार्ड ३: महादेवी वर्मा सम्मान ४: ख़ुसरो सम्मान ५: बाबा नागार्जुना अवार्ड ६: मुनीर नियाज़ी अवार्ड आने वाली किताबें :- १: माँ और मौसी (उर...
स्मृतिया
कविता

स्मृतिया

********** सुरेश चंद्र भंडारी धार म.प्र. आओ याद करे कुछ यादें खट्टी मीठी सी मनमौजी रीती इठलाती अलबेली जैसी।। जो तन मन जीवन अंतर्मन महकाती है, चुपके से कानो में कुछ कह जाती है।। यादें जब निकल चली गलियारों में, खिला हुआ बचपन चौतरफा राहो में। यादगार पल मिल जाते भावनाओ में, हकीकत गुजर जाती है उलाहनों में।। ये समय तो हरपल चलता रहता है उषा और संध्या में तो उगता ढलता है। मन भी तो पंख लगाकर उड़ जाता है, जो कुछ यूं ही पल दर पल छलता है।। वक्त जो बीत गया फिर नहीं आएगा, अतित तो स्मृतियों में ही रह जायेगा। मुड़कर देखोगे जब पीछे कह जायेगा। हाँ मन तो तब व्याकुल हो पछतायेगा।। हम स्मृतियों में यूँ क्यों खो जाते है, वर्तमान पर यूँ क्यों सिसक जाते है। भाग्य भरोसे यूँ क्यों स्वयं को भूल जाते है। प्रबल पुरुषार्थ पर यूँ क्यों रोते जाते है।। स्मृति के स्वर्णिम पल आंखे खोलो देखो, करो अंगीकार सुखद सलोने वर्त...
छाते में गुज़रे …
कविता

छाते में गुज़रे …

********** डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर म.प्र. छाते में गुज़रे दिनों की कहानी। सारा शहर, हो गया पानी पानी। जाती नहीं, है डटी कब से वर्षा। सूरज के दर्शन को, हर कोई तरसा। ज्यों ही कदम को बाहर निकालें। खुद, कपड़े और क्या क्या संभालें। छायी है काई, दीवालों और दर पे। कीचड़ दिखे है आंगन और घर पे। कहीं डोम गिरते, कहीं लोग मरते। अफ़सोस दिल से करें डरते डरते। हरक़त बढ़ाता ,,,,,,,, दुश्मन हरामी। कटोरे में भूचाल उसका सुनामी। मिटकर ,,मिटाने के नारे लगाता। पाक बेहूदा है,,,,, नहीं शरमाता। चुनावों में मस्ती,कहीं नज़र नहीं आवे। कोई, मम्मी, राहुल को, आंखें दिखावे। सुशासन दिखे ना, ना दिखे कोई रुतबा। डूब कर प्रलय बिच,,,,, करे तौबा तौबा। परेशां बिहारी,,,,,,,,, है परेशान जनता। बिगड़े सभी काम, हर कोई हाथ मलता। करो बंद टोंटी, अब न बरसाओ पानी। बिजू कहे,,,,,,,, जी हो गई बहुत हानी।   परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्...
मेरे पापा
बाल कविताएं

मेरे पापा

********** उज्जवल मिश्र मुजफ्फरपुर बिहार मेरे पापा बहुत है अच्छे अच्छी बात सिखलाते हैं सूरज को उगने से पहले प्रतिदिन उठ जाते हैं योगा प्राणायाम नित्य करते कराटे भी सिखलाते है ऑफिस जाते ९:०० बजे शाम ५:०० बजे घर आते हैं शाम का नाश्ता साथ में करते फिर पार्क में टहलने हम जाते हैं मेरे पापा बहुत है अच्छे अच्छी बात सीखलाते हैं मेरे पापा दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं वो मेरे अच्छे दोस्त भी हैं वो मेरे अच्छे पापा है! अच्छी पुस्तक लाकर देते अच्छी बात बताते हैं मेरे पापा बहुत है अच्छे मुझे बहुत प्यार है करते अच्छी बात सिखलाते हैं तभी तो दुनिया के वो सबसे अच्छे पापा कहलाते हैं मेरे पापा बहुत है अच्छे अच्छी बात से सिखलाते हैं! लेखक परिचय :- उज्जवल मिश्र मुजफ्फरपुर  बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंद...
वेणी वाली दुर्गा
लघुकथा

वेणी वाली दुर्गा

********** स्वाति जोशी पुणे देवी मंदिर के आहते में सजी छोटी सी दुकान पर स्मिता सामान ले रही थी। हार, फूल, नारियल,धूप, कपूर, प्रसाद सब ले लिया था, तभी वहाँ रखी लाल रंग की जरी बाॅर्डर की साडी पर उसकी नज़र पडी, कुछ कहने के लिये मुडी, तो देखा पति सतीश दुकान के बाहर कुछ दूरी पर मोबाईल में सिर गडाये खडा था। वहीं से आवाज़ देकर स्मिता ने पूछा, 'ये साडी भी ले लूं देवी माँ के लिये?' 'हाँ,हाँ ले लो’ सतीश ने सिर हिला कर सहमति दी। 'ये औरतें भी ना... एक तो नवरात्रि में भीड़-भाड़ में इनके साथ मंदिर चलो, और फिर, 'ये भी ले लूंँ?, वो भी ले लूँ?''... सतीश मन ही मन बुदबुदाया..मगर पत्नी से कुछ भी कहने के बजाय, हाँ कहना उसे ज्यादा आसान लगा। वैसे भी मंदिर में चारों तरफ लोग ही लोग थे, जहां जगह मिली वहाँ छोटी छोटी दुकानें भी लगा रखी थीं हार- फूल, नारियल वालों ने, कमाई का सीज़न था उनका! उपर से बारिश की चिक-चिक......