लोकतंत्रीय तानाशाही
विश्वनाथ शिरढोणकर
इंदौर म.प्र.
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भीड़तंत्र की, 'लोकतंत्रीय तानाशाही' पढ़कर और सुनकर अनेक लोग हैरान हो सकते हैं और उन्हें यह विषय हास्यास्पद भी लग सकता हैं, परन्तु वस्तुस्थिति यह हैं कि हम लोकतंत्रीय तानाशाही की ओर बढ़ रहें हैं, जहाँ किन्ही चयनित या निर्वाचित कुछ ख़ास व्यक्तियों को व्यवस्था रूपी तंत्र निर्णय लेने के सारे अधिकार सौप देती हैंI एक दो व्यक्ति, चाहे घर हो या बाहर, या हो राष्ट्र में, योग्य निर्णय लेने की असीम एवं निष्पक्ष क्षमता नहीं रख सकते, बल्कि यह कहें कि सुचारू व्यवस्था के लिए और नित नयी समस्याओं के समाधान हेतु किसी एक या दो व्यक्तियों को योग्य और सक्षम निर्णय लेना संभव ही नहीं हो सकता I लोकतंत्रीय तानाशाही में सलाहकार भी एक वृत्त और उसकी परिधि की चकाचौंध से भ्रमित हो उन्हें योग्य सलाह देने का साहस ही नहीं जुटा पाते, क्योंकि उन्हें हमेशा यह भय सताता रहता ह...






















