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कर्ण का पश्चाताप
कविता

कर्ण का पश्चाताप

रचयिता : श्रीमती पिंकी तिवारी =============================== कर्ण का पश्चाताप ममता की शाख से टूटा हुआ एक पर्ण हूँ, 'वसुसेन' भी, 'राधेय' भी, मैं सूर्यपुत्र कर्ण हूँ। सन्तभक्त एक स्त्री को ऋषि दुर्वासा का वरदान मिला, जिज्ञासावश शुद्ध संकल्प से मुझको प्रादुर्भाव मिला। लोकलाज वश निष्ठुर ममता मुझको ना अपना पाई, शापित शैशव करके मेरा गंगा में अर्पण कर आई। मिले अधिरथ राधा मैया, मुझको 'वसुसेन' नाम दिया, पितृ-प्रेम और ममता से, मृत जीवन को मेरे प्राण दिया । दिव्य देह संग उपहार मिले, मुझको स्वर्ण कवच कुण्डल, आकर्षित करता था प्रतिपल, सूर्यदेव का आभामंडल । विद्यार्जन की अभिलाषा से मैं, पहुँचा गुरु द्रोण के पास, लेकिन क्षत्रिय ना होने से पूरी हुई न मेरी आस । पर आशा न खोई मैंने, परशुराम के पास गया, झूठ बोलकर "मैं ब्राह्मण हूँ" विद्या का उपहार लिया । लेकिन विधान विधि का, इतना भी नहीं ...
नारी
कविता

नारी

रचयिता : कुमुद के.सी.दुबे ================================== नारी उलाहने पैदा होते ही सहकर बडी होती सहती रहती ता उम्र पुत्री के रूप मे बहू के रूप में सहना और जीना देखकर देखते देखते काश सहना आ जाये सभी को और सहज हो जाय जीवन् लेखिका परिचय :-  कुमुद के.सी.दुबे जन्म- ९ अगस्त १९५८ - जबलपुर शिक्षा- स्नातक सम्प्रति एवं परिचय- वाणिज्यिककर विभाग से ३१ अगस्त २०१८ को स्वैच्छिक सेवानिवृत। विभिन्न सामाजिक पत्र पत्रिकाओं में लेख, कविता एवं लघुकथा का प्रकाशन। कहानी लेखन मे भी रुची। इन्दौर से प्रकाशित श्री श्रीगौड नवचेतना संवाद पत्रिका में पाकशास्त्र (रेसिपी) के स्थायी कालम की लेखिका। विदेश प्रवास- अमेरिका, इंग्लैण्ड एवं फ्रांस (सन् २०१० से अभी तक)। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्...
पागल – कहानी
कहानी

पागल – कहानी

रचयिता : जितेंद्र शिवहरे =============================== पागल स्मिता और उसकी सहेली निशा आज हाॅस्पीटल की ड्यूटी पूरी कर शहर के मेघदूत उपवन में कुछ पल सुस्ताने आई थी। सायं चार-पांच बजे का वक्त हो रहा था। दोनों सहेलियां शहर के भण्डारी हाॅस्पीटल में नर्सिंग का कोर्स कर रही है और अन्य शहर से होकर इसी हाॅस्पीटल के हाॅस्टल में रहती है। उवपन में बैठने के लिए समुचित स्थान तलाशती उनकी आंखे एक कोने में रखी छायादार बेंच पर पड़ी। बेंच पर पुर्व से ही एक युवक बैठा था। उसके हाथों में एक किताब थी। वह उसे ही पढ़ रहा था। बेंच पर अभी दो व्यक्ति और बैठ सकते थे। धुप की तपन के बीच स्मिता और निशा ने बिना वक्त गंवाये उस बेंच की ओर पैदल ही दौड़ लगा दी। मई का महिना चल रहा था। चारों ओर तपन ही तपन थी। गार्डन में छायादार पेड़ शीतल हवा बरसा रहे थे। गार्डन की जमीन पर माली द्वारा अभी-अभी छिड़काव किये गये पानी की ठण्...
वास्तविक मुद्दों को गुमराह कर “आरोप-प्रत्यारोप” की राजनीति
आलेख

वास्तविक मुद्दों को गुमराह कर “आरोप-प्रत्यारोप” की राजनीति

रचयिता : शिवांकित तिवारी "शिवा" ==================================== वास्तविक मुद्दों को गुमराह कर "आरोप-प्रत्यारोप" की राजनीति भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहाँ सभी वर्गों, जातियों एवं सम्प्रदायों से जुड़े लोगो को अपनी बात कहने और अपना पक्ष रखने की स्पष्ट रूप से स्वतंत्रता है। लेकिन, अगर हम भारत देश की वर्तमान राजनीति की बात करते है तो दिलो-दिमाग में बहुत ही नकरात्मक छवि सामने आती है क्योंकि आज की राजनीति का स्तर दिनोंदिन नीचे गिरता जा रहा है और वर्तमान राजनीतक छवि पूर्णतया दूषित होती जा रही है। राजनीति के इस गिरते हुये स्तर के कारण जनमानस की वास्तविक एवं मूलभूत आवश्यकतायें और प्रमुख मद्दे गायब होते जा रहे हैं। राजनीति के ठेकेदारों के द्वारा जनता को सिर्फ वायदों का लालच देकर ठगा जाता है और इस तरह उनके साथ सिर्फ और सिर्फ छलावा ही किया जाता है।राजनेता एक-दूसरे पर व्यक्तिग...
चंदन
कविता

चंदन

रचयिता : रीतु देवी ============================= चंदन लगाऊँ चंदन तुझे नित्य हे रघुवीर। बारम्बार करती अर्चना बना मुझे वतन वीर।। तुझ सा दृढ प्रतिज्ञ दृढनिश्चयी बन जाऊँ प्राण मातृभूमि सेवा में गवाऊँ लगाऊँ चंदन तुझे नित्य हे रघुवीर। शुभाशीष ले बढाऊँ मान शहीद राष्ट्र शूरवीर।। पद चिन्ह, दिव्य पथ पर चलकर राष्ट्र रक्षार्थ कदम बढाऊँ आगे बढकर लगाऊँ चंदन तुझे नित्य हे रघुवीर। तेरी भक्ति कर-कर के बनूँ प्रवीर।। माता-पिता,गुरूजनों चरणों शीश नवाऊँ तेरी महिमा हर पल गाऊँ लगाऊँ चंदन तुझे हे रघुवीर। सदा शरण देकर चरणों में बना धीर गंभीर।। लेखीका परिचय :-  नाम - रीतु देवी (शिक्षिका) मध्य विद्यालय करजापट्टी, केवटी दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप कर...
तुलसीदास जगत को भाए
कविता

तुलसीदास जगत को भाए

रचयिता : रशीद अहमद शेख ===================================================================================================================== तुलसीदास जगत को भाए! जब-जब झांकें मन के अन्दर, अनुभूति मानस पद गाए! तुलसीदास जगत को भाए! मर्यादा की सीमाओं में, सुन्दरता का शुभ निर्वाह! शब्द-शब्द से अमृत-वर्षा, भाषा का रसयुक्त प्रवाह! उर आह्लादित यही सुनाए! तुलसीदास जगत को भाए! विनयशील लहराता सागर, भक्ति भाव के ज्वार अनेक! केन्द्र बिन्दु श्रीरामचन्द्र पर, विविध रूप रसधार अनेक! मानस में क्या नहीं समाए! तुलसीदास जगत को भाए! आदर्शों के अगणित दीपक, विचलित को दिखलाते राह! सत्य-असत्य की विजय-पराजय, भक्तों में भरती उत्साह! क्षण-क्षण मुख पर यह पद आए! तुलसीदास जगत को भाए! लेखक परिचय :-  नाम ~ रशीद अहमद शेख साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्...
बाबुल का घर
कविता

बाबुल का घर

रचयिता : संजय वर्मा "दॄष्टि" ======================== निहारती रहती हूँ बाबुल का घर कितना प्यारा है मेरा बाबुल का घर आँगन ,सखी,गलियों के सहारे बाबुल का घर लोरी, गीत ,कहानियों से भरा बाबुल का घर | बज रही शहनाई रो रहा था बाबुल का घर रिश्तों के आंसू बता रहे ये था बाबुल का घर छूटा जा रहा था जेसे मुझसे बाबुल का घर लगने लगा जेसे मध्यांतर था बाबुल का घर | बाबुल से जिद्दी फरमाइशे करती थी बाबुल के घर हिचकियों का संकेत अब याद दिलाता बाबुल का घर सब आशियानों से कितना प्यारा मेरा बाबुल का घर रित की तरह तो जाना है एक दिन, छोड़ बाबुल का घर | परिचय :- नाम :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन ) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग ) प्रकाशन :- देश - विदेश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार...
मेरी माँ
कविता

मेरी माँ

मेरी माँ रचयिता : शिवांकित तिवारी "शिवा" ==================================== इस धरा का  अद्वितीय अनुपम वरदान है माँ, जन्मदात्री जगतपूज्या जग में सबसे महान है माँ, नौ महीने कोख में रख वह शिशु को जन्म देती, अथक पीड़ा सहन कर भी वह किसी से कुछ न लेती, दया,ममता,स्नेह की माँ अद्भुत अप्रतिम तस्वीर है, कितने रूपों को जीती लिखतीं कितनी तकदीर है, माँ है तो ये दुनिया है माँ से सारा जहान है, माँ है तो सारे सपने है माँ से ही मुस्कान है, माँ अगर है तभी बच्चों के पूरे होते है अरमान, माँ से ही ये है जमाना माँ से है सारी पहचान, बच्चों की खातिर करती अपने सारे सपने कुर्बान है, सच में माँ सम जग में न दूजा कोई भगवान है, माँ है मिलती प्रेरणा और माँ से मिलता ज्ञान है, माँ से मिलती जिंदगी और जग में मिलता मान है, लिखता हूँ मैं माँ पर सदा और सदा लिखता रहूँगा, माँ ही मेरी है कलम और ...
क्षमा
लघुकथा

क्षमा

क्षमा रचयिता : विजयसिंह चौहान ===================================================================================================================== दो ढाई साल की उम्र, मगर बेहद समझदार जैसे परिपक्वता लेकर जन्म लिया हो ! प्यार से सभी उसे डिस्को कह कर बुलाते थे। समय पर खाना-पीना और अपने नित्य कर्म करना, डिस्को की समय पाबंदी को दर्शाता है। शाम को 6:00 बजे तक यदि वर्मा जी घर ना आए तो पूरा घर सिर पर उठा लेता। इतनी कम उम्र में सबका ध्यान रखना बार-बार घड़ी  देखना,  गुस्सा करना, सबको प्यार करना और इधर-उधर डोलते रहने के कारण ही घर के सब लोग उसे डिस्को कहकर पुकारते हैं। कल शाम की ही बात है, वर्मा जी के साथ डिस्को घूमने निकला चूंकि डिस्को कद काठी से मजबूत होने के कारण गली के कुत्तों से कहीं ज्यादा तगड़ा है। चहल कदमी के दौरान एक मरियल सा कुत्ता उसे देख-देख घूरने लगा। डिस्को चूकी वर्मा जी के ह...
पेट का सवाल
लघुकथा

पेट का सवाल

पेट का सवाल रचयिता : सतीश राठी ===================================================================================================================== ‘’क्यों बे ! बाप का माल समझ कर मिला रहा है क्या ?‘’ गिट्टी में  डामर मिलाने वाले लड़के के गाल पर थप्पड़ मारते हुए ठेकेदार चीखा| ‘’कम डामर से बैठक नहीं बन रही थी ठेकेदार जी ! सड़क अच्छी बने यही सोचकर डामर की मात्रा ठीक रखी थी|’’ मिमियाते हुए लड़का बोला| ‘’मेरे काम में बेटा तू नया आया है| इतना डामर डालकर तूने तो मेरी  ठेकेदारी बन्द करवा देनी है|‘’ फिर समझाते हुए बोला – ‘’ये जो डामर है, इसमें से बाबू, इंजीनियर, अधिकारी, मंत्री सबके हिस्से निकलते हैं बेटा ! ख़राब सड़क के दचके तो मेरे को भी लगते हैं|.. ..चल इसमें गिट्टी का  चूरा और डाल|” मन ही मन लागत का समीकरण बिठाते हुए ठेकेदार बोला| लड़का बुझे मन से ठेकेदार का कहा करने लगा| उसका उतरा हुआ चेहरा ...
आँखों का भ्रम 
कविता

आँखों का भ्रम 

आँखों का भ्रम रचयिता : शशांक शेखर ===================================================================================================================== ये ज़रूर तुम्हारी आँखों का भ्रम होगा भागता साया किसी और का देखा होगा राह तकते तकते बीत गयी उम्र आधी तुमने भी लाचार क़दमों को घसीटा होगा पूष की ठिठुरती रात सन्नाटे काँपते हाथ रात का साया अलाव के क़रीब बैठा होगा तुम्हें सोचते सोचते और ज़िंदगी से सिखते मेरी आँखों में सो कर सुबह जागा होगा इंसान हैं हम तो शिकायतें तो होंगी ही मेरी शख़्सियत में भी वफ़ा और जफ़ा होगा ज़िंदगी क्या है आँख से बहता हुआ बेरंग दरिया तुमने हथेली में थामा होता तो रंगीन होता अब जब नहीं हो तुम तो आहट की उम्मीद है इसी का नाम शशांक तमन्ना-ए-इश्क़ होगा   लेखक परिचय :- आपका नाम शशांक शेखर है आप ग्राम लहुरी कौड़िया ज़िला सिवान बिहार के निवासी हैं आपकी रुचि ...
एक फूल दो माली
लघुकथा

एक फूल दो माली

एक फूल दो माली अविनाश अग्निहोत्री ===================================================================================================================== रॉय साहब व उनकी पत्नी, एक सड़क दुर्घटना में अपने इकलौते बेटे व बहु को खो देने के बाद। उनकी आख़री निशानी अपने आठ वर्षीय पोते की परवरिश उसी लाड़ प्यार से कर रहे थे। जैसी कभी उन्होने अपने बेटे मधुर की करी थी। यह देख रॉय साहब के एक पुराने मित्र उन दोनों से बोले, आपके बेटे मधुर ने शादी के बाद आप दोनों से जैसा व्यवहार किया। ऐसा तो कोई सौतेला भी न करे। और उसकी पत्नी ने तो आप जैसे देवपुरुष व सीधी साधी भाभी को। दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगा। इस बुढ़ापे में,जेल तक के दर्शन करवा दिये। तब भला आप उनकी ही इस संतान को किस उम्मीद से इतने लाड़ प्यार से पाल रहे है। अपने मित्र की बात सुन, रॉय साहब गोद मे बैठे अपने पोते के सर पर हाँथ फेरते हुए। गम्भीर स्व...
मां के चरणों में
कविता

मां के चरणों में

किशनू झा "तूफान" ग्राम बानौली, (दतिया) ********************** झुक जाती हैं ताकत सारी, मातृशक्ति के शरणो में । ऐसा लगता स्वर्ग छुपा हो, मेरी मां के चरणों में । दुख दर्दो को सहकर मम्मी, हमको जीवन देती है। खून पसीना पसीना बहा बहाकर, मेहनत का धन देती हैं । सर्वश्रेष्ठ है ममता का रन्ग , दुनिया के सारे वर्णो में । ऐसा लगता स्वर्ग छुपा हो , मेरी मां के चरणों में आये कोई भी सन्कट , बच्चों को सदा बचाती है। गीले में सोकर के खुद , सूखे में उन्हें सुलाती है । रहें सुरक्षित हरदम बच्चे, मम्मी के आवरणो में। ऐसा लगता स्वर्ग छुपा हो , मेरी मां के चरणों में बचपन की वो यादें मा की, हमको बहुत सताती हैं , माँ का आँचल में सर हो, तो नींद स्वतः ही आती है। जल मन्दिर का हमें पिलाती , संग तुलसी के पर्णो में । ऐसा लगता स्वर्ग छुपा हो , मेरी मां के चरणों में लेखक परिचय : - न...
उम्र की कहानी
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उम्र की कहानी

उम्र की कहानी रचयिता : रामनारायण सोनी ===================================================================================================================== "उम्र की बीती कहानी याद फिर आयी कहीं से।" अतीत की कन्दराओं में उकेरे भित्तिचित्रों में भी कई आख्यान उभरते हैं। जिन में से कुछ हमने बनाए है कुछ कोई और चितर गया है। ये बोलते भी हैं जैसे बुन्देले हरबोलो के मुख से झाँसी का इतिहास फूट पड़ता है। इन आख्यानों में छुपे होती है कुछ रहस्य, कुछ स्मृतियाँ, कुछ अनुभूतियाँ। इनमें समाहित हैं जीवन से जुड़े यथार्थ, खट्टे-मीठे, कषाय-तिक्त और संगतियों-विसंगतियों के भिन्न भिन्न आस्वादन। इनका सम्मिश्रण भी एक अजीब केमिस्ट्री है। जहाँ धुआँ है वहाँ आग होगी ही, जहाँ उजास है वहाँ कहीं आस पास ही अन्धकार भी होगा। खूबसूरत गुलाब काँटों के बीच हैं। नागफ़नी के फूलों का सौंदर्य अनोखा होता है। नैसर्गिक गुण धर्मों से लप...
मातृत्व
लघुकथा

मातृत्व

मातृत्व रचयिता : कुमुद के.सी.दुबे ===================================================================================================================== अपनी बेच में टॉप करने के कारण आज काॅलेज के दिक्षांत समारोह में शिवांश का विशेष सम्मान होने वाला  था। परिवार  के सदस्यों को भी इस कार्यक्रम में आमन्त्रित किया गया था। शिवांश जब पाँच वर्ष का था तब मां ललिता का देहांत हो गया था। पिता संदीप ने रिश्तेदारों के दबाव में आकर अनमने मन से दूसरी शादी ‘सुजाता’ से कर ली थी। सुजाता भले ही सौतेली मां थी, लेकिन उसकी बदोलत ही आज शिवांश डाॅक्टर बन पाया था। संदीप को पी एम टी की परीक्षा की फीस भरने के लिये सुजाता ने ही मनाया था। शिवांश के माता पिता को भी आज के समारोह में सम्मान मिलना था। सुजाता सोच रही थी कि स्टेज पर बेटे शिवांश के साथ संदीप और स्वर्गीय ललिता का ही नाम पुकारा जायेगा। एकाएक उसके कानों में आ...
आज पुराने दोस्तों से मिलने को मन करता है…
कविता

आज पुराने दोस्तों से मिलने को मन करता है…

आज पुराने दोस्तों से मिलने को मन करता है... रचयिता : ईन्द्रजीत कुमार यादव ===================================================================================================================== आज पुराने दोस्तों से मिलने को मन करता है... कॉलेज के गलियारे में बैठ ठिठोली करना चाहता हुँ, बिना पूछे दोस्त की टिफिन को चट करने का मन करता है, बेवजह झगड़ कर फिर माफी मांगने को जी करता है, क्लास की पहली बेंच पे अधिकार जमाने को जी करता है। आज पुराने दोस्तों से मिलने को मन करता है... सब व्यस्त होंगे अपने दो पल की जिंदगी में, छोटा सा लमहा खरीद कर बाँट दूँ उन दोस्तों को, जिसमें सब एक साथ मिलकर खिलखिलाए, ऐसे वख्त को बांधने को जी करता है। आज पुराने दोस्तों से मिलने को जी करता है... क्रिकेट के मैदान में कि मैं आज खेलूँगा या नही, ऐसे कोने में रूठ कर खड़ा होने को जी चाहता है, मैच हारने पर एक दूसरे...
क्या है मेरा दोष ?
कविता

क्या है मेरा दोष ?

क्या है मेरा दोष ? रचयिता : मनोरमा जोशी ===================================================================================================================== व्यथा से परिपूर्ण, श्वेत वस्त्रों में बंधी, एक असहनीय दुःख को उर मे समेटे, जी रही संसार में बस एक याद के सहारे, बच्चों के खातिर, एक रोटी के लिए, रहती हूँ सहमी, सास के द्धारे, है बढ़ा कठिन पल, क्या था कल, और आज क्या हो गया सब कुछ तो जल गया, कुछ बाकी न रहा। रह गयी तो बस  एक वीरान सी जिंन्दगी। करता हैं समाज मुझसे घृणा, इसमें क्या हैं मेरा दोष ? इस समाज में मेरा कोई अस्तित्व नहीं ,कोई पहचान नहीं। क्या है मेरा दोष ? लेखिका का परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्य...
मां
लघुकथा

मां

मां रचयिता : लज्जा राम राघव "तरुण" ===================================================================================================================== जंगल में अपनी मां के साथ किलोल करते हुए हिरण शावक बहुत दूर चला गया था। हिरणी जितना उसका पीछा करती, वह उतना ही आगे बढ़ता जाता। अंत में वह एक ऐसे स्थान पर पहुंच गया जहां एक शेरनी आंखें बंद कर लेटी हुई थी तथा अपने शावकों को दूध पिला रही थी तथा ममता वश उन्हें चाटे भी जा रही थी। अबोध हिरण शावक को क्या पता था कि "शेर और हिरण का कोई मिल नहीं होता,..... यदि होता भी है तो...... "बस भूख और भोजन का!" जब हर ने उसका पीछा करते-करते वहां पहुंची तो यह दृश्य देख वह आतंकित हो उठी। हिरणी को समझते देर न लगी कि "अब तो उसके बच्चे की जीवन लीला कुछ ही क्षणों में समाप्त होने वाली है!" यह सोच कर वह अंदर तक हिल गई थी। ..... "परंतु.. कर भी क्या सकती थी?" अब वह...
जरा मरकर देखें
कविता

जरा मरकर देखें

जरा मरकर देखें रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' ===================================================================================================================== अब जरा मरकर देख लेने दे मुझे कैसा लगता है अहसास कर लेने दे मुझे मैं भी तो जानूँ इंशानियत क्या है, मरने की इजाजत जरा सी दे दे मुझे, बनकर हवा आसमान में उङ लेने दे मुझे, नए जीवन में पिछले जन्म की कुछ तो यादें पास रखने दे मुझे, उस स्वर्ग की खबरें कुछ तो नर्क में बताने दे मुझे अब जरा मरकर देख लेने दे मुझे... लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को नमन करता हूँ !! काव्य संग...
समंदर
कविता

समंदर

समंदर रचयिता : अर्चना मंडलोई ============================================================================================== क्या समां है, कि बन गया एक समंदर और। उभर आये जो आँसू तो ,पलको से बाँधा है, एक दरिया और। दोस्त मेरा जब सरे शाम रूठता है एक तूफान जनम लेता है ,मेरे अंदर और। घुटन फीक्र बेवक्त की आवाजे इसके अलावा होता नही अंदर मेरे कुछ और। सुबह की पहली किरण,बन जाए कब ख्वाब ये जिन्दगी का बसेरा है ,सहर कर ले रात भर और। तारीफ सुन जिन्दगी़ इठला गई ,मूझे देख कतरा सी गई , जिस नज़र से मैने उसे देखा,नजर आती गई दूर और। लेखिका परिचय : इंदौर निवासी अर्चना मंडलोई शिक्षिका हैं आप एम.ए. हिन्दी साहित्य एवं आप एम.फिल. पी.एच.डी रजीस्टर्ड हैं, आपने विभिन्न विधाओं में लेखन, सामाजिक पत्रिका का संपादन व मालवी नाट्य मंचन किया है, आप अनेक सामाजिक व साहित्यिक संस्थाओं में सदस्य हैं व सामाजिक गतिविधि...
प्यार जब पास होता है …
कविता

प्यार जब पास होता है …

प्यार जब पास होता है रचयिता : डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) ===================================================================================================================== यही तो स्वर्ग होता है,फूलों से करें बातें। दिन में काम हों ज्यादा,बातों में कटें रातें। तीरथ सब लगें फ़ीके,प्रकृति के पास जाते हों। गीत में मीत रहता हो,सुनकर कुछ सुनातें हों। अंतिम बार जब भगवन मांगेगा हिसाबों को। थोड़ी देर पढ़ लेना मेरी ,,,,,,उन किताबों को। मोहब्बत के बिना जीवन, का कोई सार ना होता। कुछ भी बन न पाता मैं, अगर ये प्यार ना होता। तुम्हारे मुस्कराने से,बस ये अहसास होता है। लिखता ही रहे बिजू,प्यार जब पास होता है।   परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) आपका मूल निवास फ़र्रुख़ाबाद उ.प्र. है आपकी शिक्षा कानपुर में ग्रहण की व् आप गत 36 वर्ष से इंदौर में निवास कर रहे हैं आप मंचीय कवि, लेखक, अधिमान्य ...
गीत
गीत

गीत

गीत रचयिता : मोहम्मद सलीम रज़ा ===================================================================================================================== हँस दे तो खिले कलियाँ गुलशन में बहार आए वो ज़ुल्फ़ जो लहराएँ मौसम में निखार आए oo मदहोश हुआ दिल क्यूँ बेचैन है क्यूँ आँखें रंगीन ज़माना क्यूँ महकी हुई क्यूँ सांसें हूँ दूर मय-ख़ाने से फिर भी क्यूँ ख़ुमार आए oo बुलबुल में चहक तुम से फूलों में महक तुम से तुम से ये बहारे हैं सूरज में चमक तुम से रुख़्सार पे कलियों के तुम से ही निखार आए oo बस इतनी गुज़ारिश है बस इतनी सी चाहत है जिन जिन पे इनायत है जिन जिन से मोहब्बत है उन चाहने वालो में मेरा भी शुमार आए oo गुलशन में बहारों की इक सेज लगाया है फूलों को सजाया है पलकों को बिछाया है ऐ बाद-ए-सबा कह दे अब जाने बहार आए oo मिल जाए कोई साथी हर ग़म को सुना डालें जीवन के हर इक लम्हें खुशिओ...
फर्क
लघुकथा

फर्क

फर्क रचयिता : सुषमा दुबे ===================================================================================================================== बेटी के साथ हुई ज्यादती कि रिपोर्ट लिखवाने पहुचे पिता -पुत्री से थानेदार ने उल जुलूल प्रश्न करना शुरू कर दिए। लड़की का पिता ने कई सवालों के जवाब में सर झुका लिया। फिर शुरू हुआ प्रवचन का सिलसिला, अरे आजकल कि लड़कियां मौज मस्ती के लिए लड़को से दोस्ती करती है, जब बात नहीं बनती इल्जाम लगा देती है............ कहकर एक लम्बा चौड़ा लेक्चर दे दिया। दोनों बाप-बेटी सर झुकाये उसकी बाते सुनते रहे। तभी थानेदार लड़की के पिता की और मुखातिब होकर बोला -"धिक्कार है तुम्हे जो ऐसी बेटी को जन्म दिया, इसकी जगह यदि मेरी बेटी होती तो तो मैं पुलिस थाने में आने कि जगह उसे आग लगा कर ख़त्म कर देता। अब तक चुपचाप सुनती रही लड़की ने मुहं खोला वह थानेदार से बोली -"सर एक बात पूछू...
आधुनिकता की चकाचौंध में संस्कारों का “अन्तिम-संस्कार”
आलेख

आधुनिकता की चकाचौंध में संस्कारों का “अन्तिम-संस्कार”

आधुनिकता की चकाचौंध में संस्कारों का "अन्तिम-संस्कार" रचयिता : शिवांकित तिवारी "शिवा" ===================================================================================================================== विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ सभी धर्मो को मानने वाले लोगों का बसेरा है एवं सभी जातियों व संप्रदायों के अनुयायी यहाँ निवासरत है। भारत देश प्राचीनकाल में 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था क्योंकि यहाँ पर निवासरत समस्त लोगो में एकता और एकजुटता के प्रमुख गुण सहजता से मिलते थे। लोगो के लिये उनके संस्कार और संस्कृति व सभ्यता सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जरूरी थे। उस समय लोगों में सामजिकता और सामंजस्यता के बड़े अद्भुत नजारें देखने को मिलतें थे। उस समय की लोगों के मन में दया, प्रेम एवं परोपकार के भाव बड़ी ख़ूबसूरती से विद्यमान होते थे। सभी एकजुट होकर एक दूसरे की मदद के लिये तत्परता से आगे आते...
गीतों चलन होता अमर 
आलेख

गीतों चलन होता अमर 

रचयिता : संजय वर्मा "दॄष्टि" ===================== गीत  की कल्पना, राग, संगीत के साथ गायन  की मधुरता  कानो  में मिश्री घोलती साथ ही साथ मन को प्रभावित भी करती है। गीतों का इतिहास भी काफी पुराना है। रागों के जरिए दीप का जलना, मेघ का बरसना आदि किवदंतियां प्रचलित रही है, वही गीतों  की राग, संगीत  जरिए  घराने भी बने है। गीतों का चलन तो आज भी बरक़रार है जिसके बिना फिल्में अधूरी सी लगती है। टी वी, रेडियों, सीडी, मोबाइल आइपॉड आदि अधूरे ही है। पहले गावं की चौपाल पर कंधे पर रेडियो टांगे लोग घूमते थे। घरों में महत्वपूर्ण स्थान होता का दर्जा प्राप्त था। कुछ घरों में टेबल पर या घर के आलीए में कपड़ा बिछाकर उस पर रेडियों फिर रेडियों के ऊपर भी कपड़ा ढकते थे जिस पर कशीदाकारी भी रहती थी। बिनाका -सिबाका गीत माला के श्रोता लोग दीवाने थे। रेडियों पर फरमाइश गीतों की दीवानगी होती जिससे कई प्रेमी - प्रे...