अनुभव
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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कहा गया है
चलती का नाम है
जिंदगी
इंसान चलता है
ता-उम्र
पर... क्या
सब को मिलती है मंजिल....
इंसान
चलता है
कदम दर कदम
पर... मंज़िल दूर रहती है
खिसकती रहती है राहें
सिसकती रहती है डगर
न जाने कितने
चाहे-अनचाहे
आते हैं उतार-चढाव
जिंदगी की दुर्गम राहों में.....
कहीं उपस्थित है
उन्नत श्रृंग शिखर सी
विकट समस्यायें
कहीं उछल रहे हैं
दंश मारने को आतुर
फुँफकारते विपदा नाग
कभी
रजनी का स्याह तमस
कभी
आंनद ओतप्रोत
उर्जावान दीप्त दिवाकर
कहीं
खुशियों के
लहराते सागर.....
समेटे है
अपने आप में
ये सर्पीली राहें
पग पग कटींली राहें
कभी मिलते हैं
सुरभित उपवन तो
कहीं उगे हैं
सरल,गरल, तरल
सलिल सींचित कैक्टस
मिश्रित अहसास लिए
साथ साथ दौड़ती राहें
मगर... मंजिल से पहले
बहुत कुछ समझाती है
ये...


















