Friday, March 6राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

गद्य

लेखकों की पिकनिक
व्यंग्य

लेखकों की पिकनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार पुस्तक मेले में किताबों की नहीं, लेखकों की पिकनिक तय हुई। निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया प्रगतिशील, प्रगतिवादी, प्रतिक्रियावादी, विवादप्रिय, सर्ववादी और सर्वनाशवादी सभी लेखक संघों ने मिलकर ठाना कि जब साल भर साहित्य में एक-दूसरे को स्वाद चखाते ही रहते हैं, तो क्यों न एक दिन सचमुच स्वाद खुद भी चखा जाए। अध्यक्षता का भार स्वाभाविक रूप से परम श्रद्धेय परसादी लाल जी ‘जुगाड़ी’ को सौंपा गया जो एक साथ परजीवी, बहुजीवी, बुद्धिजीवी, आलोचक, समीक्षक और विमोचक हैं। पहले उन्होंने अपनी मरणासन्न व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार किया, पर प्रथम श्रेणी यात्रा-भत्ते की अग्रिम राशि ने उनमें तुरंत साहित्यिक प्राण फूँक दिए। नियम तय हुआ हर लेखक घर से बना खाना लाएगा। खुद न बना सके तो किसी और का उठा लाए, ...
वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)
व्यंग्य

वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** मेष राशि : हर साल की तरह २०२६ भी तुम से मजे ही लेकर जाएगा...अमीर बनने का सपना तुम्हारा केवल सपना ही रह जाएगा। तुम बस आमिर खान की फिल्में देखो, आमिर खान भी इसी लिए फ्लॉप हो रहा है क्योंकि तुम्हारे जैसे पनौती दर्शक हैं उसके ....प्रेम संबंधों के मामलो में लकी रहोगे कोई रुचि ही नहीं लेगी तो ब्रेकअप का भी दूर दूर तक आसार नहीं है...खैर तुम्हारी वाली ऐसा होने भी नहीं देगी....सबको तुम्हारी बहन बना देगी....स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना, शनि की तीसरी दृष्टि के कारण किसी कन्या पर दृष्टिपात करते हुए धरे पकड़े जाओगे और बुरी तरह जुतियाए भी जा सकते हो.!! वृषभ राशि : जैसी राशि वैसे ही बैल जैसी पर्सनालिटी है और बुद्धि भी। कर्म करने जाते हो और कांड करके आते हो। अच्छा बनने के प्रयास में हमेशा गोबर कर आते हो...आर्थिक स्थिति में सुधार के आस...
विजय दिवस
आलेख

विजय दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर साल १६ दिसंबर को मनाया जाने वाला विजय दिवस, भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह १९७१ के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की पाकिस्तान पर विजय का प्रतीक है। यह एक ऐतिहासिक संघर्ष था जिसने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि की। यह दिन हमारे उन सैनिकों के बलिदान और वीरता का स्मरण करता है जिन्होंने आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक विजयों में से एक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में ३० लाख से अधिक लोगों की जान गई और १०० लाख बांग्लादेशी निर्वासित हो गए।26 मार्च को बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, और इसी दिन से इस युद्ध की भयावहता शुरू हुई थी। लगभग नौ महीने बाद, १६ दिसंबर को, अंततः सब कुछ समाप्त हो गया। पूर्वी और पश्चिमी पाकि...
कंजूस मक्खीचूस
व्यंग्य

कंजूस मक्खीचूस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अख़बार में ख़बर आई कि एक अमीर महिला को “दुनिया की सबसे कंजूस करोड़पति” घोषित किया गया है। करोड़ों की मालकिन, मगर खाने-पीने पर खर्च जैसे उसकी जान निकल जाए। कंजूस शब्द का अर्थ तो सब जानते हैं, पर कंजूसी का दर्शन वही समझे जिसने ऐसे जीवों को पास से देखा हो। मानो इनके डीएनए में ही ‘सेविंग’ का जीन बैठा हो। कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं- क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। इनका आदर्श वाक्य है- “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” गाँव में हमारे एक मास्टर साहब थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। अमीरी ऐसी कि सूद पर सोना गिरवी रखते, पर मिठाई सिर्फ़ दिवाली पर। एक किलो इमरती सालभर के लिए पर्याप्त। जैसे ही ...
मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश
आलेख

मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश

 दिव्याना कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ********************  मानवाधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष १० दिसंबर को विश्व भर में मनाया जाता है यह दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा १९४८ में अपनाई गई सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र की याद दिलाता है, जो सभी मनुष्यों को जन्मजात अधिकार प्रदान करता है ,जिसमें ३० अनुच्छेदों के माध्यम से जीवन, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद न्याय की शुरुआत: द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहताओं, जैसे होलोकॉस्ट और नरसंहार, ने वैश्विक स्तर पर न्याय की नई व्यवस्था की मांग को जन्म दिया। मित्र राष्ट्रों-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ ने १९४५ में नूर्नबर्ग में अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण (IMT) की स्थापना की, जो युद्ध अपराधियों को व्यक्तिगत रूप से दंडित करने का पहला मॉडल बना। इन मुकदमों ने १९४८ में संयुक्त राष्ट्र...
‘विमलांजलि’- संवेदनशील मन की जीवन-यात्रा का संग्रह
पुस्तक समीक्षा

‘विमलांजलि’- संवेदनशील मन की जीवन-यात्रा का संग्रह

समीक्षक- संजीव कुमार भटनागर यमराज मित्र सुधीर श्रीवास्तव की पाँचवीं पुस्तक ‘विमलांजलि’ एक विहंगम और व्यापक काव्य-संकलन है, जिसमें ३०९ पृष्ठों में २१७ रचनाओं का अनुपम संगम पाठकों के समक्ष उनकी बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा को गहनता से प्रस्तुत करता है। सरलता लिए आकर्षक मुखपृष्ठ के पश्चात सम्पादन और प्रकाशन विवरण, तथा अपनी सासू माँ और अपनी मातृकुल को समर्पण - यह दर्शाता है कि कवि के हृदय में मातृ शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा और भावनात्मक निष्ठा है। कवि अपनी “मन की बात” में मानवीय संवेदनाओं, मानव मूल्यों, रिश्तों में बढ़ती दूरियों और दम तोड़ती मर्यादाओं के कारण उत्पन्न असमंजस और चिंतन की पीड़ा को ईमानदारी से व्यक्त करते हैं। ममता प्रीति श्रीवास्तव की शुभकामनाओं और संक्षिप्त परिचय के साथ कृति का आरम्भ पाठक को जोड़ लेता है। माँ शारदे की वंदना, गणेश स्तुति और गुरु वंदन से प्रारम्भ होकर यात्रा आगे ...
टन टन टन
लघुकथा

टन टन टन

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** गुप्ता जी रोज़ की तरह आज भी अख़बार में घुसे थे, गुप्ता जी की आदत थी जब तक घड़ी ९:०० न बजाए, अखबार से चिपके ही रहते थे। आज भी घड़ी ने जैसे ही नौ बार पुकारा, गुप्ता जी झट तौलिया उठा, लपड़ धपड़ बाथरूम की ओर लपके। धड़ाम!!! अचानक आंगन से ज़ोरदार आवाज आई। रीना, जो किचिन में नाश्ता और टिफिन की जुगलबंदी में लगी थी, घबराकर दौड़ी। बाहर आकर जो नज़ारा देखा तो हँसी रोकना मुश्किल हो गया। आंगन में गुप्ता जी बड़े शाही अंदाज़ में फ़िसले पड़े थे। उनका भारी-भरकम शरीर, टेढ़ा-मेढ़ा होकर जमीन पर ऐसा पसरा था मानो किसी मूर्तिकार का बड़ा सा अनगढ़ अधूरा शिल्प। रीना ने होंठ दबाकर हँसी छुपाई, फिर गंभीर आवाज़ में बोली - "क्या ढूँढ रहे हो गुप्ता जी? धरती के अंदर छिपा खज़ाना या बाथरूम का शॉर्टकट?" खिसियाते गुप्ता जी अब कराहते हुए बोले - "अरे रीना… ये फर्श बड़ा धो...
लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व
व्यंग्य

लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हमारे यहाँ त्योहारों के पीछे ज़रूर कोई कथा होती है- कभी देवता-पिशाच की लड़ाई, कभी रानी-पुत्र की करुणा। राखी की भी कई कथाएँ हैं, पर लोकतंत्र की एक कहानी ऐसी है जो इतिहास में दर्ज नहीं हुई- क्योंकि यह आज भी हर साल घट रही है। इसे कहते हैं- लोकतंत्र का रक्षा-बंधन। इस पावन पर्व की शुरुआत तब हुई जब स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार पहली बार अपनी शीतनिद्रा से बाहर निकला। जन्म तो इसका प्राचीन भारत में ही हो चुका था, पर तब यह एक दुबला-पतला, डरपोक-सा साँप का संपोला था। देवी-देवता, ऋषि-मुनि इसे कभी-कभार डाँटकर भगा देते। आज़ादी के बाद सत्ता के नए पालकों ने इसे देखा- काला, कलूटा, पर उपयोगी। बस, उठा लाए आस्तीन में। कालांतर में यह साँप अपने पालनहारों से भी ज़्यादा ताकतवर हो गया। पर भ्रष्टाचार अकेला नहीं थ...
छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार
आंचलिक बोली, आलेख

छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** जब हम गरीब मनखे ला इंसाफ अउ अधिकार दिलाय के बात करथन त सबले पहिली हमर मन म एकेच नाव आथे। वो नाव हरे वीर नारायण सिंह बिंझवार के जेन हर गरीब मनखे के जान बचाय बर अपन जान के बलिदान कर दिस। जमीदार होय के बाद भी साहूकार मन ले गरीब मनखे के भूख मिटाय बर आंदोलन करिस। १८५७ के स्वतंत्रता समर म छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी आय। वीर नारायण सिंह के जनम छत्तीसगढ के सोनखान गांव म बछर १७९५ म जमीदार परिवार म होइस। पिता के नाव रामसाय रिहिस। कहे जाथे कि पुरखा के सियान मन कर ३०० गांव के जमींदारी रिहिस। वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के रिहिस। पिता के परलोक सिधारे के बाद ३५ बछर म अपन पिता के जगह म बइठ के जमींदार बन गे। पर दुख ल अपन दुख जान के गांव के गरीब मनखे मन बर अब्बड़ दया धरम करय। बछर १८५६ म बिकट आकाल परिस। लोगन मन कर खाय प...
अद्भुत अनुभूति
संस्मरण

अद्भुत अनुभूति

माधवी तारे लंदन ******************** लंदन का बादलों से भरा कम या ज्यादा ग्रे रंग और उसमें उठ कर दिखने वाला गेरु और पीले रंग में मुस्कुराता हुआ लंदन का रॉयल अलबर्ट हॉल न केवल आर्किटेक्चर के तौर पर सर्वश्रेष्ठ कंसर्ट हॉल है बल्कि संगीत सुनने के लिये भी बेहतरीन जगह है। करीब १५० साल पुराने इस हॉल में जाने का सौभाग्य मुझे २०२५ के नवंबर में मिला। बाहर से यह पांच मंजिला सभागृह जितना भव्य दिव्य दिख रहा था, अंदर उस भव्यता में और चार चांद लग रहे थे। ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था, लोगों की अनुशासनबद्धता और पूरा माहौल अद्भुत ही था। पांच हजार से ज्यादा लोगों के बैठने की व्यवस्था यहां है और अधिकतर यहां भारतीय महिलासंगीतकारों और गायकों के कार्यक्रम होते हैं। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और रफी साहब, स्व, मुकेश आदि के यहां अनेक कार्यक्रम हुए हैं। और मुझे यहां शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम देखने का सौभाग्य प्रा...
कुहासे को चीरता गीत संग्रह ‘भर दो प्यार वतन में’
पुस्तक समीक्षा

कुहासे को चीरता गीत संग्रह ‘भर दो प्यार वतन में’

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समीक्षक : सुधीर श्रीवास्तव (गोण्डा, उ.प्र.) मेरा मानना है कि मानव भाषा विकास के साथ ही गीत का जन्म हुआ होगा। गीत संप्रेषण की वह विधा है जो मानव मस्तिष्क में उपजे भावों को गेयता की परिधि में रखकर या फिर यूँ कह लें कि स्वर संवाद श्रृंखला में पिरोकर किसी अन्य तक पहुँचाने का उचित एवं प्रभावी तथा हृदयगम्य माध्यम है। गीत के जन्म का कोई सही समय साहित्य के क्षेत्र में निश्चित नहीं किया गया, किन्तु गीत मानव अभिव्यक्ति होने के कारण मानव भाषा विकास के साथ ही माना जाना उचित होगा। वर्तमान में गीत शैली बिना संगीत के अधूरी या फिर यूँ कह लें कि नीरस सी लगती है जिसके कारण गीत का महत्व संगीत के साथ ही बेहतर लगता है। ‌ जीवन के हर क्षेत्र में मानव की जिजीविषा, समर्पण, दायित्व बोध और ईमानदारी का का बड़ा योगदान होता है। जिसे इसका आत्मज्ञा...
टिकट विंडो की लाइन
संस्मरण

टिकट विंडो की लाइन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रेलवे स्टेशन की टिकट विंडो आजकल किसी आध्यात्मिक तप जैसा लगता है। अमृत योजना का थोड़ा-बहुत बजट खर्च कर चार खिड़कियाँ बना दी गई हैं, पर चारों के सामने उतनी ही लंबी लाइनें- मानो चार अलग-अलग धर्मपंथ हों और भक्त सभी जगह समान संख्या में हों। मैं बड़ी होशियारी से सबसे छोटी लाइन में लगा, और जैसे ही लगा-क़िस्मत मेरी गर्दन पकड़कर मुझ पर हंस रही हो जैसे। मेरी लाइन कछुए की चाल, और बाजू वाली लाइन खरगोश की मधुमक्खी-गति से फुर्र-फुर्र बढ़ती जा रही थी। खिड़की पर एक बुजुर्ग बाबू थे- शायद रिटायरमेंट के ठीक पहले के अंतिम बर्ष में। चश्मा उतारते, लगाते, की बोर्ड को किसी वेद-पाठ की तरह एक-एक अक्षर छूते। स्क्रीन पर अक्षर प्रकट होता तो उनके चेहरे की झुर्रियाँ भी खिल उठतीं- मानो तकनीकी उन्नयन का चमत्कार उन्हें ...
यमराज मेरा यार- हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह
पुस्तक समीक्षा

यमराज मेरा यार- हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समीक्षक : संजीव कुमार भटनागर सुधीर श्रीवास्तव द्वारा रचित काव्य संग्रह "यमराज मेरा यार" एक अनूठी साहित्यिक प्रस्तुति है, जो अपने शीर्षक से ही पाठकों की जिज्ञासा को जागृत कर देता है। आमतौर पर यमराज को मृत्यु, भय और संहार का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस संग्रह में यमराज एक अलग ही रूप में प्रस्तुत किए गए हैं – मानो वे कवि के सखा हों, जिनसे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर संवाद किया गया हो। सुधीर श्रीवास्तव की भाषा सहज, प्रवाहमयी और व्यंग्यात्मक चुटकी से भरपूर है। वे गहरी बातों को भी हल्के-फुल्के शब्दों में कहने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। कहीं-कहीं पर दार्शनिकता का भी पुट मिलता है, जो कविता को और अधिक प्रभावशाली बनाता है। "यमराज मेरा यार" संग्रह केवल मृत्यु और यमराज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन, समाज, राजनीति, नैतिकता औ...
अचानक एक दिन
कहानी

अचानक एक दिन

बृज गोयल मवाना रोड, (मेरठ) ******************** अरे! यह किसने इतनी ढिठाई से कमर में हाथ डाल दिया… ऋतु ने पलट कर देखा तो मनु खड़ी मुस्कुरा रही थी। ‘तौबा! मनु, तूने तो डरा ही दिया था, अचानक तू यहां कैसे दिखाई दे रही है।‘ 'यार तेरा हौसला देख रही थी। बहुत दिन बाद दिखाई दी ना, सुना था अकेले ही मस्ती मार रही है…’ ऋतु अपने मस्त अंदाज में बोले जा रही थी और मैं उसे अचंभित सी देख रही थी। वही जींस, शर्ट, बॉय कट बाल.. वही बोलने का लड़कों वाला अंदाज, कॉलेज में तो वह शरारत करने में बहुत मशहूर थी ही, पर अब शादी के बाद भी 10 साल में जरा नहीं बदली है। ‘क्यों मोटी, क्या गृहस्थी को तिलांजलि देकर मस्ती कर रही है..? मैंने मनु से पूछा- ‘क्यों यार, ऐसा तुझे मुझमें क्या दिखाई दिया… जो मुझे आवारा समझ रही है ?’ ‘नहीं रे आवारा नहीं, बस तुझे देख कर ऐसा लग रहा है जैसे तू घर के पचड़ों से दूर, ताजी सी, खिली...
ह्रदय परिवर्तन
लघुकथा

ह्रदय परिवर्तन

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** एक सिद्धिप्राप्त साधु अपनी कुटिया में सोये हुए थे। रात के बारह बज रहे थे।दरवाजे पर खट- खट की आवाज हुई। साधु जी ने कहा कौन हैं? व्यक्ति ने कहा- मैं चोर हूँ। साधु जी ने दरवाजा खोल दिया और कहा- तुम्हें जो लेना है ले लो। चोर जब कुटिया के अंदर आया तब उसे कुछ भी दिखाई नहीं देने लगा जबकि कुटिया में एक दीपक जल रहा था। चोर बाहर निकला और चला गया। उसका ह्रदय ऐसा परिवर्तित हुआ कि उसने चोरी करना ही छोड़ दिया। इसके बाद वह खेती करके जीविका चलाने लगा एवं प्रवचन देने लगा। परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.बी.एड. सम्प्रति : एस. बी. आई. से अवकाश प्राप्त प्रकाशन : मेरा भारत कहाँ खो गया (कविता संग्रह), विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। घोषणा पत्र : ...
शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार
व्यंग्य

शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रविवार! वो दिन जब देश के बहुसंख्यक पुरुष अपने शरीर रूपी वाहन की सर्विसिंग, डेंटिंग-पेंटिंग और फेस एलाइनमेंट की कोशिश करते हैं- और फिर थककर वापस उसी पुराने स्टार्टिंग ट्रबल वाले मोड में लौट जाते हैं। सुबह शीशे में झाँका तो माथे पर दो-चार सफ़ेद बाल ऐसे अठखेलियाँ करते मिले, जैसे मोहल्ले की गली में खड़ी बाइक को किसी मनचले ने ‘की-की’ करते हुए खरोंच मार दी हो। कभी जिन बालों को नजर न लगे, इसलिए बचपन में काजल का टीका लगाया जाता था- अब वही बाल इसलिए सफ़ेद हो रहे हैं कि किसी की नजर पड़ ही  जाए! कभी अपने बालों पर करते थे नाज़, अपना रंग जमाए रहते थे महफ़िलों में- और आज वही बाल अपना रंग बदल रहे हैं! सच कहें तो अब यह काया नामक गाड़ी, आर.टी.ओ. की अयोग्य वाहनों की सूची में और ज़िन्दगी के खेल में “एक्स...
इक तेरे भरोसे पे
पुस्तक समीक्षा

इक तेरे भरोसे पे

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव सरल, सहज, मृदुभाषी, बहुमुखी व्यक्तित्व की धनी कवयित्री मीनाक्षी सिंह की 'इक तेरे भरोसे पे' के रूप में तीसरा संग्रह है। इसके पूर्व आपका 'बातें जो कही नहीं गई' और 'निर्मल उड़ान' ने उनकी साहित्यिक पहचान को काफी हद तक स्थापित कर दिया है। ऐसे में प्रस्तुत संग्रह के प्रकाशन के बाद उनकी रचनाओं पर चर्चा परिचर्चा होना स्वाभाविक ही है। हालांकि मैं उनकी प्रथम पुस्तक की समीक्षा करते हुए जो महसूस किया था, वह काफी हद तक सफल भी मान सकता हूँ। खेल, समाज सेवा और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच साहित्य में समर्पण उनका जुनून ही कहना उचित होगा। जो उनके व्यक्तित्व को और निखार ही रहा है। प्रस्तुत काव्य संग्रह के प्रथम खंड-भक्ति भाव में पुस्तक के नामकरण वाली पहली रचना है, जिसमें उनकी अनंत सत्ता में आस्था, विश्वास...
अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल
आलेख

अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे वीर पुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। महात्मा गॉंधी ने जहाँ अहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाया, वहीं पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण कि परिकल्पना की। परन्तु इन सबके बीच एक ऐसे पुरुष का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है जिसने भारतीय रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत की अखंडता को स्थायी रूप प्रदान किया। वे थे सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें ससम्मान “लौह पुरुष” और “अखंड भारत के निर्माता” कहा जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर १८७५ को गुजरात के नडियाद नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता झवेरभाई एक साधारण कृषक थे और माता लाडबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। बचपन से ही वल्लभभाई में आत्मसम्मान, परिश्रम और दृढ़ संकल्प की भावना थी। उन्होंने...
ट्रकों का दर्शनशास्त्र: सड़क का पहलवान और प्रेम का दार्शनिक
व्यंग्य

ट्रकों का दर्शनशास्त्र: सड़क का पहलवान और प्रेम का दार्शनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** ट्रक का मिज़ाज हमेशा से दबंग, मजबूत और थोड़ा अहंकारी किस्म का माना गया है- सड़क नुमा अखाड़े का पहलवान, जो अपने वज़न और रफ्तार से किसी भी बाधा को कुचलने की क्षमता रखता है। लेकिन कभी-कभी यही पहलवान आपको दिला चुराने वाला ठग सा भी लग सकता है-जब सड़क किनारे खड़ा किसी नववधू की तरह सोलह श्रृंगार किए मुस्कुराता है,तो अच्छे खासे आदमिया भी दिल पिघल नहीं मेरा मतलब दहल जाए। मेहंदी जैसे पैटर्न से रंगे दरवाज़े, झालरों से सजे शीशे, गोटों और कढ़ाईदार पेंटिंग से लिपटी देह, और पीछे लटकता नज़रबट्टू- मानो हर कोना कह रहा हो, “देखो मुझे… मगर प्यार से।” यह ट्रक नहीं मित्र, सड़क पर खड़ी चलती-फिरती अमूर्त कलाकृति है, और उसके पीछे लिखा वाक्य- “बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला”- उसकी सौंदर्य रक्षा का संस्कार है। यह बा...
चिंतन-मनन कराती कविताओं का संग्रह है ‘हिमकिरीट’
पुस्तक समीक्षा

चिंतन-मनन कराती कविताओं का संग्रह है ‘हिमकिरीट’

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समीक्षक : सुधीर श्रीवास्तव (गोण्डा, उ.प्र.)  'हिमकिरीट' हिंदी काव्य संग्रह के प्रकाशन की योजना और संग्रह के हाथों में आने तक की प्रत्येक गतिविधि का मैं गवाह हूँ। संवेदनशील और सृजन के प्रति पूरी चैतन्यता का उदाहरण भूपेश प्रताप सिंह का प्रस्तुत संग्रह के रूप में सामने आया। कवि ने अपने संग्रह की रचनाओं में प्रकृति, संवेदना, अध्यात्म और मानव जीवन की जटिलताओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। 'हिमकिरीट' हिम यानी बर्फ, और किरीट यानी मुकुट-जो शीतलता, ऊँचाई और सौंदर्य के संयोजन का बिंब के रूप में जाना जाता है, उसे शीर्षक देना किसी बड़े का आदर करने जैसा है l प्रस्तुत संग्रह को पढ़ते समय आप महसूस करेंगे कि इसमें शब्द- चित्रों के माध्यम से भावनात्मक विचारों का अद्भुत संगम है, जिसका अनुभव आत्मचिंतन और अनुभूति करने को विवश...
काल के कपाल पर
व्यंग्य

काल के कपाल पर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कहते हैं, काल के कपाल पर पहले से ही हमारा भूत, वर्तमान और भविष्य अंकित होता है- हम बस वही जीते हैं जो ऊपर वाले ने लिख दिया है। पर कभी-कभी मन करता है कि इस ‘कॉस्मिक पांडुलिपि’ में एक-दो पंक्तियाँ अपनी मर्ज़ी की भी जोड़ दी जाएँ- कम-से-कम एक “फुटनोट” तो लेखक स्वयं भी लिख सके! मेरा मन तो बस इतना चाहता है कि जीवन के इस साहित्यिक कापी पर कहीं लिखा जाए- “यह लेखक किसी गुट का हिस्सा है।” क्योंकि बिना गुट के लेखक का हाल वैसा ही होता है जैसे गली में अकेली चलती अबला- हर किसी की नजर में ‘खतरा’। जबसे कहा है कि “मैं किसी गुट का नहीं”, तबसे मुझ पर शोध-प्रबंध शुरू हो गया है- कौन-से शब्दों से मेरी विचारधारा झलकती है, किस पंक्ति में कौन-सा खेमापन है। साहित्य में गुटबाज़ी आज मठों का नया धर्म है- जहाँ नए लेख...
मातृ प्रेम
लघुकथा

मातृ प्रेम

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** अमृत अपनी माँ से बेहद प्यार करता था। माँ को जरा भी कोई तकलीफ हो, वह चिंतित हो जाता था। उसकी माँ भी उसके व्यवहार से सदा खुश रहती थी। अमृत ज़ब पढ़ लिख कर अपने पैर पर खड़ा हो गया तब उसके घर वाले उसकी शादी के लिए लड़की देखने लगे पर अमृत उन्हें सदा मना ही करता रहा क्योंकि उसे डर था कहीं लड़की माँ के साथ दुर्व्यवहार न करने लगे। किन्तु बहुत समझाने बुझाने पर वह मान गया। कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा पर धीरे-धीरे लड़की ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। अमृत उसे बार-बार समझाता पर वह मानने के लिए तैयार ही न होती। एक दिन अमृत ने डाँट कर उसे कह ही दिया-देखो मैं तुम्हें छोड़ सकता हूं पर माँ को नहीं। इतना सुनना था कि वह सहम गयी और उस दिन से ठीक से रहने लगी। परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोल...
एआई का झोला-छाप क्लिनिक
व्यंग्य

एआई का झोला-छाप क्लिनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** तकनीक गड़बड़झाला का एक झोल सामने आया है l अखबार में विज्ञापनों के मायाजाल में फंसी इस खबर पर नजर पडी l अख़बार में सुर्ख़ी बनी है - "ए आई नीम हकीमी..चैट जीपिटी से परामर्श लेकर खाने का नमक बदला ,खतरे में आई जान" ‘नीम हकीम खतरे जान’ अब महज़ नीम और हकीम के बीच का मामला नहीं रहा, क्योंकि चैट जीपिटी भी बाकायदा झोला-छाप डॉक्टरों की बिरादरी में शामिल हो चुका है। मरीजों का इलाज करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया है। वो दिन दूर नहीं जब मोहल्लों की दीवारों पर रंगीन पोस्टर चिपके मिलेंगे- “दाद, खाज, खुजली, भगन्दर, पायरिया ,पीलिया,पथरी ,बवासीर, नपुंसकता, नामर्दी- चैट जीपिटी से पक्का इलाज, गारंटी सहित!” अख़बार खोलते ही पंपलेट झड़ पड़ेंगे- “आपके शहर में ही खुला है चैट जी पि टी के क्लिनिक की टापरी l पहुँचे हुए ...
वजन
लघुकथा

वजन

माधवी तारे लंदन ******************** एयरपोर्ट के लाउंज में बैठे-बैठे दिमाग में अभी-अभी काउंटर पर एक यात्री और एयरलाइन स्टाफ के बीच हुआ वाद-विवाद घूम रहा था। यात्री का सामान बस एक किलो ज्यादा था और स्टाफ उसे बिना पैसे दिये लेने को तैयार नहीं था। यात्री अपनी परेशानी बड़ी शिद्दत के साथ बताने की कोशिश कर रहा था औऱ स्टाफ उसकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में लाउंज के टीवी पर एक समाचार दिखाया जाने लगा जिसमें यात्री के ज्यादा वजन पर टिकट की कीमत बढ़ाने पर रिपोर्ट आ रही थी। ज्यादा वजन, हमारे समाज में वैसे भी बहुत आलोचना का विषय रहा है, किसी भी मोटे व्यक्ति को तरह-तरह से जलील किया जाता है और उसका सरेआम मजाक भी उड़ाया जाता है। सारी दुनिया फिटनेस के पीछे लगी हुई है। सुबह का व्यायाम, जिम, डायट और भी न जाने क्या-क्या। बावजूद इसके दुनिया में मोटापा एक महामारी के रूप में फैल रहा है। समस्या क...
अब ए.आई. भी आई बन सकती है!
व्यंग्य

अब ए.आई. भी आई बन सकती है!

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सुबह अख़बार हाथ में लिया तो एक खबर ने मेरी चाय में डूबे हुए बिस्कुट को इतना शर्मिंदा किया की वो शर्म से गल कर डूब ही गया l खबर थी - "अब ए.आई. से पैदा होंगे बच्चे!" मतलब अब ‘प्यार में धोखा’ नहीं, सीधा ‘कोड की कोख में होगा गर्भधारण!’ कृत्रिम बुद्धि अब कृत्रिम बुद्धिपुत्र को जन्म देगी। इस दुनिया में हम क्यों आए... इसका कोई "नियर-टु-ट्रूथ" उत्तर हो सकता है तो यही कि शायद शादियाँ करने... और शादियाँ क्यों कराई जाती हैं? ताकि महिला ‘माँ’ यानी कि ‘आई’ बन सके। हमारे समाज में आज भी बिना ब्याही लड़की और बिना औलाद की स्त्री को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। शादी होते ही लड़के और लड़की दोनों के माँ-बाप इस आस में लग जाते हैं कि घर में किलकारियाँ गूंजें, बधाइयाँ गायी जाएँ। एक साल बीतते न बीते कि पडौसी ...