आशिक तू हमें
अख्तर अली शाह "अनन्त"
नीमच
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आशिक तू हमें, दिलको कू-ए-यार बना दे।
या रब तू अपने, इश्क का बीमार बना दे।।
ये सिर तेरे आगे ही झुके मालिके जहां।
तेरे ही आगे हाथ उठे मालिके जहां।।
दिल तेरी हम्दे पाक पढ़े मालिके जहां।
पग राहे हक में ही ये बढ़े मालिक जहां।।
यूँ हक की सल्तनत का पैरोकार बना दे।
या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।।
इंसाफ पर चलने की हमें राह बता दे।
मिलने की तमन्नाओं को तू अपना पतादे।।
तेरे हैं इस जहान को मौला तू जता दे।
खाते में फरिश्तों से कह के नाम खता दे।।
नबीयों का रसूलों का वफादार बना दे।
या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।।
माले हराम पेट में जाने नहीं पाए।
छल दिल में कभी पैर जमाने नहीं पाए।।
नफरत जेहन में भूल के आने नहीं आने नहीं पाए।
गुस्सा कभी भी सिर को उठाने नहीं पाए।।
यूँ जिंदगी में सब्र को साकार बना दे।
या रब तू अपने इश्क का बीमार बना दे।।
जो क...






















